दुष्प्रकार्य के संबंध में मर्टन का दृष्टिकोण - Merton's view of dysfunction
दुष्प्रकार्य के संबंध में मर्टन का दृष्टिकोण - Merton's view of dysfunction
मर्टन ने इस तथ्य को स्वीकार नहीं किया कि सामाजिक संरचना की सभी इकाइयाँ मात्र सकारात्मक प्रकार्य ही करती हैं तथा सामाजिक संरचनाएं हमेशा व्यवस्था को बनाए रखने में अपना योगदान करती हैं। मर्टन की दृष्टि में ऐसा संभव है कि कुछ इकाइयाँ प्रकार्य के स्थान पर दुष्प्रकार्य करें। दूसरे शब्दों में कुछ शकइयाँ सामाजिक संरचना एवं व्यवस्था को संगठित न करने का प्रयास करती हैं। मर्टन के अनुसार कुछ इकाइयाँ प्रकार्यत्मक होती हैं, तो कुछ आंशिक रूप से दुष्प्रकार्यात्मक, कुछ अप्रकार्यात्मक और कुछ पूर्णरूपेण दुष्प्रकार्यात्मक भी। यह स्पष्ट है कि संरचना की अप्रकार्यात्मक होते हुए भी सामाजिक संरचना में बनी रहें। इस तरह स्पष्ट है कि सभी इकाइयों के प्रकार्य सामाजिक संचना एवं व्यवस्था के अस्तित्व तथा निनंतरता के लिए अनिवार्य नहीं होते। कुछ इकइयाँ दुष्प्रकार्य के संबंध में मर्टन का विचार है कि इसके द्वारा सामाजिक एकता को खतरा पैदा होता है और इससे समाज में सामाजिक परिवर्तन की प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलता है। दूसरे शब्दों में मटन के दुष्प्रकार्या द्वारा सामाजिक परिवर्तन बढ़ावा मिलता है।
दुर्खीम की भाँति मर्टन यह नहीं मानते कि धर्म हमेशा समाज की एकता में सकारात्मक योगदान देता है। धार्मिक आधार पर समाज में धर्म काफी द्वंद एवं निषेध पाया जाता है। यदि धर्म सजाम को जोड़ता है तो वह उतना ही दो समुदायों के बीच संबंध विच्छेद भी करता है। अतः यह कहना कि प्रकार्यवादी सिद्धांत से मात्र सामाजिक स्थिरता या नियंत्रण का ज्ञान होता है, ठीक नहीं है बल्कि इसके अंतर्गत दुष्प्रकार्य की अवधारणा है जिसके द्वारा सामाजिक परिवर्तन का ज्ञान होता है।
दुष्प्रकार्य भी प्रकार्य की भाँति दो प्रकार के होते हैं। प्रथम गोचर दुष्प्रकार्य तथा द्वितीय अगोचर दुष्प्रकार्य। धार्मिक आधार पर दो धार्मिक समुदायों के मध्य संघर्ष गोचर दुष्प्रकार्य है लेकिन इस संदर्भ का प्रभाव राष्ट्रीय अस्मिता पर पड़ता है तो यह अगोचर दुष्प्रकार्य है।
उपर्युक्त संपूर्ण विश्लेक्षण से स्पष्ट है कि प्रकार्य गतिविधि के वे परिणाम हैं जो अपने से संबद्ध व्यवस्था के साथ सामंजस्य या अनुमूलन स्थापित करते हैं। दुष्प्रकार्य उन गतिविधियों के परिणाम हैं
जो अपने से संबद्ध व्यवस्था के साथ अनुकूलन नहीं करते तथा इस प्रक्रिया के परिणाम व्यवस्था के लिए ये हानिकारक होते हैं। मर्टन का कहना है कि इकाइयों के कुछ प्रकार्य इच्छित तथा कुछ अनिश्चित होते हैं जिन्हें उसने क्रमशः गोचर एवं अगोचर प्रकार्य कहा है। गोचर प्रकार्य वे प्रकार्य है जो व्यवस्था के साथ अनुकूलन या सामंजस्य स्थापित करते हैं तथा ये व्यवस्था द्वारा निर्दिष्ट होते हैं। कुछ इकाइयाँ ऐसे प्रकार्यों को अन्जाम देती है जो अनिर्दिष्ट होते हैं, इन्हें अगोचर प्रकार्य कहा जाता है। ये न तो निर्दिष्ट होते होते हैं और न ही व्यवस्था द्वारा स्वीकृत। उदाहरण के लिए ताजिए के जुलूस का निर्दिष्ट प्रकार्य श्रद्धा एवं उपासन की अभिव्यक्ति है किंतु यदि उस जुलूस के कारण दंगे का होना अगोचर प्रकार्य हैं।
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