प्रकार्य के संबंध में मर्टन के दृष्टिकोण - Merton's view of function
कार्य के संबंध में मर्टन के दृष्टिकोण - Merton's view of function
समाजशास्त्र में संरचनात्मक प्रकार्यवाद को वैज्ञानिक आधार प्रदान करने का श्रेय आ. के. मर्टन को दिया जाता है। मर्टन के प्रकार्यवादी विचारों पर मानवशास्त्री मेलीनास्की तथा रेडक्लिफ ब्राउन के विचारों का स्पष्ट प्रकभाव है। इस संदर्भ में गिडिंग्स का यह कथन उल्लेखनीय है कि ब्राउन एवं मेलोलास्की ने प्रकार्यवाद का प्रयोग जहाँ आदिम जातियों के लिए किया था वहीं आर. के. मर्टन ने इस सिद्धांत का प्रयोग विकसित एवं औद्योगिक समाज मेलीनास्की की तुलना में अधिक समृद्ध बताया है।
मर्टन ने पुराने प्रकार्यवादियों की आधारभूत मान्यताओं का उल्लेख करते हुए आलोचना की है। ये मान्यताएँ थीं रेडक्लिफ ब्राउन के प्रकार्यात्मक एकता के सिद्धांत के अनुसार एक सामाजिक व्यवस्था एक विशेष प्रकार की एकता रखती है, जिसे हम प्रकार्यात्मक एकता कह सकते हैं। मर्टन के अनुसार प्रकार्यात्मक विश्लेषण में इन बातों का पीक्षण आवश्यक है कि सांस्कृतिक तथ्य संपूर्ण व्यवस्था के लिए तथा समाज के प्रत्येक सदस्यों के लिए प्रकार्यात्मक होते हैं। मर्टन ने प्राकार्यात्मक विश्लेषण की इस मान्यता से असहमति प्रगट की तथा इसके तथ्यात्मक परीक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।
एकता की मात्रा भिन्न-भिन्न समाजों में तथा एक ही समाज में भिन्न-भिन्न समयों में एक जैसी नहीं रहती। एक ही समाज में सामाजिक रीति-रिवाज व भावनाएँ कुछ समूहों के लिए प्रकार्यात्मक हो सकती है और दूसरों के लिए अप्रकार्यात्मक मर्टन ने धर्म की प्रकार्यात्मक व्याख्या की आलोचना करते हुए कहा है कि धर्म का मूख्य प्रकार्य एकता स्थापित करना है। सामान्य मूल्य एवं लक्ष्य लोगों को एकता के सूत्र से बाँधे रहते हैं। मर्टन की दृष्टि में यह जरुरी नहीं है कि धर्म समाज में सदैव एकता ही स्थापित करें। कुछ सामाजिक संरचनाओं के लिए यह अप्रकार्यात्मक भी होता है।
सार्वभौमिक प्रकार्यात्मक के सिद्धांत की आलोचना करते हुए काहा कि परंपरा को जीवित रखना तो किसी न किसी मात्रा में प्रत्येक सांस्कृतिक तत्व का कार्य है। अतः इस प्रकार्य को किसी एक तत्व के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। इसका प्रकार्य यह भी हो सकता है कि व्यक्ति परंपरा का पालन समूह की अभिमति की रक्षा के लिए करता है। मर्टन का कथन है कि वास्तव में प्रचलित सांस्कृतिक तत्व उन समाजों या उपसमूहों के लिए प्रकार्यात्मक परिणामों का मूल शेष प्रकट करते हैं, जो दबाव से उन्हें बनाए रखते हैं।
मर्टन ने पुरानी मान्यताओं की कमियों को दूर करने के लिए कुछ नई मान्यताओं को रखा जो निम्नलिखित हैं
• प्रकार्यात्मक एकता प्रयोग सिद्ध होती है।
• सामाजिक रीतियाँ या घटनाएँ एक समूह के लिए प्रकार्यात्मक हो सकती हैं तो दूसरे के लिए दुष्प्रकार्यात्मक।
• सार्वभौमिक प्रकार्यावाद की अवधारणा में संशोधन आवश्यक है, क्योंकि एक समाज या समूह के प्रकायात्मक परिणाम दूसरे समाजों एवं समूहों पर लागू नहीं भी हो सकते।
• इस मान्यता में संशोधन की जरूरत है कि प्रकार्यात्मक रूप में समाज के सभी तत्व या इकाई नीतांत आवश्यक हैं। एक इकाई का एक में अधिक प्रकार्य हो सकते हैं तथा एक प्रकार्य की पूर्ति विकल्पों द्वारा भी संभव है। कुछ इकाइयों के एक से अधिक प्रकार्य हो हैं, जिसमें कुछ परिणाम दुष्प्रकार्यात्मक हो सकते हैं।
उपर्युक्त आलोचनाओं के बाद मर्टन ने प्रकार्य के पाँच प्रचलित अर्थों की चर्चा की है, जो इस प्रकार हैं
• सार्वजनिक उत्सव या समारोह के अर्थ में प्रकार्य,
• प्रस्थिति से संबंधित क्रियाओं के अर्थ में प्रकार्य,
• व्यवसाय के अर्थ में प्रकार्य,
• गणितीय अर्थ में प्रकार्य,
• प्रणिशास्त्रीय या सामाजिक प्रक्रियाओं के अर्थ में प्रकार्य
यद्यपि मर्टन ने उपयुक्त पाँच प्रकार के प्रकार्यों की चर्चा की है किंतु वह स्वयं प्रकार्य के इतने पर्यायों के विरूद्ध है। उनकी दृष्टि में हमें इस भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए कि प्रकार्य के सिर्फ यही पाँच अर्थ हैं। इन पाँच अर्थों के भिन्न प्रायः उद्देश्य, प्रेरणा, प्राथमिक हित, लक्ष्य आदि के अर्थ में प्रकार्य का प्रयोग किया जाता है। मर्टन ने प्रकार्य के आत्मगत अनुभवों के रूप में समझना गलत माना हैं। नके अनुसार दृष्टिगोचर वस्तुगत परिणाम को ही प्रकार्य कहा जाता है। उक्त पाँच अर्थों में मर्टन ने पाँचवे प्रकार्य के प्रति सहमति दिखलाई है। मटन के अनुसार प्रकार्य को प्रातीतिक अर्थ में समझना उचित नहीं है। प्रकार्य एक अवधारणा है जिसमें कई समानार्थी शब्द व्यवहार में लाये जाते हैं।
उपर्युक्त व्यख्या से स्पष्ट है कि प्रकार्य किसी तत्व की क्रिया का परिणाम है। संरचना के अस्तित्व के लिए क्रिया का परिणाम महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि मर्टन ने प्रकार्य को आतंरिक स्थिति नहीं माना है। मर्टन ने स्पष्ट लिखा है कि- “प्रकार्य प्रत्यक्ष वैषयिक परिणामों की ओर संकेत करता है, आतंरिक स्थितियों की ओर नहीं "
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