सामाजीकरण की पद्धतियाँ - methods of socialization
सामाजीकरण की पद्धतियाँ - methods of socialization
प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री ओटावे (Otteway) ने समाजीकरण की तीन प्रमुख पद्धतियाँ बताई हैं जो इस प्रकार हैं -
i. सामाजिक सीखना (Social Learning)
ii. सामाजिक उत्तरदायित्व (Social Loyalty),
iii. सामाजिक प्रशिक्षण (Social Training)
सामाजिक सीखना
समाज में रहकर बालक को समजीकृत करने की ज़िम्मेदारी उन व्यक्तियों पर होती है
जिनके संपर्क में बालक दिन-प्रतिदिन आता है। इसमें बालक के माँ बाप, मित्र व अध्यापक का स्थान प्रमुख है। प्रारम्भ से ही बालक परिवार के रीति-रिवाज व परम्पराएँ सीखता है और जैसे-जैसे वह बड़ा होता है. वह समाज के रीति-रिवाज व परम्पराएँ सीखने लगता है। माँ-बाप और अध्यापक बालक को यह इस कारण सीखते हैं जिसमें बालक का व्यवहार समाज के अनुरूप हो सके।
सामाजिक उत्तरदायित्व
ओटावे का मानना है कि बालक के अंदर उत्तरदायित्व कि भावना का विकास आयु के साथ-साथ होता है। जो व्यक्ति अपने उत्तरदायित्व समझ कर उनके अनुकूल स्वयं को ढालता है उसका सामाजिक दृष्टि से विकास अच्छा होता है।
अतः समाजीकरण हेतु यह आवश्यक है कि बालक के अंदर यह दृष्टिकोण उत्पन्न किया जाये कि वह अपनी ज़िम्मेदारी का वहाँ कर सके। सामाजिक प्रशिक्षण - सामाजिक प्रशिक्षण से बालक को प्रशिक्षित करने हेतु हम तीन विधियों का प्रयोग करते हैं जो निम्नलिखित हैं
a. पुरस्कार एवं दण्ड (Reward and Punishment)
b. उपदेशात्मक शिक्षण (Didactic Teaching)
c. अनुकरण विधि (Imitation Method) |
पुरस्कार एवं दण्ड- बालक को समाज के अनुकूल कार्य करने पर हम उसे दो तरह से पुरस्कार देते हैं।
प्रथम, भौतिक समग्रियाँ प्रदान करके (To give Material Goods)। इसमें हम बालक को रूपया, पैसा या कोई वस्तु देते हैं। द्वितीय सामाजिक स्वीकृति प्रदान करके (To give Social Approval)| इसमें हम बालक के समाजोपयोगी कार्यों के लिए उसकी प्रशंसा करते हैं। यह दोनों ही तरीके समाजीकरण के सकारात्मक साधन हैं जिनमें बालक को यह बता जाता है कि उसे पुरस्कार इस कारण मिल रहा है। चूंकि उसे इस बात की भी प्रेरणा दी जाती है कि भविष्य में वह अपने व्यवहार को समाज द्वारा वांछनीय नियमों पर आधारित करे।
समाजीकरण की दूसरी विधि दण्ड विधि है। बालक को दण्ड तब दिया जाता है जबकि उसका व्यवहार समाज के नियमों के प्रतिकूल होता है। दण्ड विधि नकारात्मक प्रेरणा देने का साधन है। व्यक्ति को दण्ड दो प्रकार से दिया जाता है।
प्रथम वैधानिक दण्ड ( Corporal Punishment) । इस प्रकार का दंड तब दिया जाता है जबकि व्यक्ति का व्यवहार वैधानिक दृष्टि से गलत होता है। द्वितीय प्रकार है सामाजिक दण्ड (Social Punishment) यह दण्ड तब दिया जाता है जब व्यक्ति का व्यवहार सामाजिक मूल्यों, मान्यताओं व परम्पराओं के विपरीत होता है। समाजशास्त्रियों की मान्यता है कि बालक को दण्ड बहुत अधिक नहीं देना चाहिए। जब उसका व्यवहार असहनीय हो जाए तभी समाजीकरण की इस विधि का प्रयोग किया जाना चाहिए। रिवाजों का उल्लेख व व्याख्या बालक के समक्ष बड़े लोगों द्वारा की जाती है।
उपदेशात्मक शिक्षण - यह वह विधि है जिसके द्वारा समाज की वांछनीय परम्पराओं मूल्यों एवं रीति से कहते हैं
तुम क्या करो'(What to do) अथवा 'तुम कैसे करो' (how to do it)। इसमें बालक को ‘क्या' व 'कैसे' के द्वारा समाज की नियमावली की जानकारी दी जाती है व उसके व्यवहार को समाज के अनुकूल बनाने का प्रयास किया जाता है।
अनुकरण विधि- इसमें बालक के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत किया जाता है और उस आदर्श का अनुपालन करने का उसे निर्देश दिया जाता है। जो भी आदर्श व्यक्ति है, वह बालक से कहता है, 'देखो मैं या अन्य इसे कैसे कर रहें है। अनुकरण करने को जब बालक से कहा जाता है तो उसे हम चैतन्य अनुकरण कहते हैं। परंतु कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बालक समाज के किसी भी व्यक्ति को अनजाने मे ही अपना आदर्श मानने लगता है व अनजाने में उसका अनुकरण करने लगता है। इस प्रकार के अनुकरण को अचैतन्य अनुकरण कहते हैं। अचैतन्य अनुकरण के लिए यह आवश्यक है कि बालक जिसे अपना आदर्श बनाए, वह समाज के आदर्शों के अनुकूल होना चाहिए।
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