अतार्किक क्रिया के अध्ययन की विधियाँ - Methods of Studying Irrational Verbs

अतार्किक क्रिया के अध्ययन की विधियाँ - Methods of Studying Irrational Verbs


पैरेटो अतार्किक क्रिया का भी अध्ययन वैज्ञानिक विधि से करना चाहते थे। उन्होंने जब समाजशास्त्र को परिभाषित किया था तभी कहा था कि वे तार्किक प्रायोगिक विधि को काम में लाएंगे। अतार्किक क्रिया के अध्ययन में उन्होंने सबसे पहले तर्क को लगाया है। उनका यह तर्क आगमनात्मक (Indiuctive) है। वे बृहद आनुभविक सामग्री को एकत्र करते हैं। यह सामग्री विभिन्न समाजों के इतिहास में बिखरी है। उनके अध्ययन का यह प्रायोगिक पहलू है जो तथ्य उन्होंने एकत्र किये हैं उनमें जो समान तथ्य हैं उन्हें व्यस्थित कर देते हैं। इन तथ्यों में कुछ तथ्य (Constant) स्थिर होते हैं और कुछ चर (Variable) तथ्यों को लेकर वे नियम बनाते हैं और ये नियम ही अतार्किक क्रिया के अध्यन में सहायक हाते हैं। इसे हम दृष्यान्त में रखेंगे समाज में हम लोगों को देखते हैं- नाम के लिए वे मोहन, सोहन और रोहन हैं। हम देखते हैं कि ये सब एक न एक दिन मर जाते हैं। यह सब मनुष्य हैं, और यह स्थिर तथ्य है कि मनुष्य मरणधर्मा है। यह समान रूप से इन्हीं तीन व्यक्तियों के अतिरिक्त सभी व्यक्तियों पर लागू होता है। इस भाँति इन आगमनात्मक नियम द्वारा ही वे अतार्किक क्रिया के अध्ययन के सिद्धांत को बनाते हैं। पारसंस ने पैरेटो के अतार्किक क्रिया के सिद्धांत की व्याख्या की है। उनकी व्याख्या में तीन तथ्य हैं- 


क. कर्ता यानि (Actor) : मस्तिष्क की अवस्था (State of Mind)


ख. गतिविधियाँ (Acts)


ग. मनोभावों की अभिव्यक्ति (Expresssions of Sentiments) 


इसकी व्याख्या करने से पहले निम्न चित्र द्वारा इसे प्रस्तुत किया जा सकता है। उपरोक्त त्रिभुज के आधार पर पैरेटो के अतार्किक क्रिया की व्याख्या की जा सकती है। इसमें जब हमें (क) की बात करते हैं तो हमारा तात्पर्य कर्ता से है। कर्ता की एक मानसिक दशा होती है, वह मस्तिष्क की एक अवस्था में होता है और जब वस्तुओं को देखता है तो वह अपने मस्तिष्क की दशा के आधार पर देखता है। (ख) की स्थिति है जब वह गतिविधियाँ करता है, काम करता है. हसता है. क्रोध करता है। (ग) की अवस्था वह है जब अपनी गतिविधियों में अपने मनोभावों की अभिव्यक्ति करता है।

इस चित्र में हम पाएंगे कि (क) और (ख) देखें जा सकते हैं। जिन्हें हम परम्परा, धार्मिक संस्कार, कर्मकाण्ड, गीत-संगीत आदि कहते हैं। वे ऐसी गतिविधियाँ हैं जो नग्न आँखों से देखी जा सकती है। आये दिन हम (ठ) व (बू) को देखते हैं यानी कर्ता के कार्यों और मनोभावों की अभिव्यक्ति को इन्द्रियों द्वारा समझते हैं। माता-पिता बच्चों की देखभाल करते हैं, उन्हें शिक्षा-दीक्षा देते हैं उनके परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाने के लिए व्रत, त्यौहार करते हैं, प्रार्थना करते हैं। ये सब गतिविधियों और मनोभावों की अभिव्यक्ति है यानि (ख) व (ग) है। इन्हें पैरेटो स्थूल रूप से दखा जाने वाला तथ्य कहते हैं। अतार्किक क्रिया का यह पहला पहलू है। दूसरा पहलू (क) है। (क) में क्या है यानी मानव में मस्तिष्क में क्या है इसे नग्न आँखों से या स्थूल रूप में नहीं देखा जा सकता है। यह तो कहा जा सकता है कि (ख) और (ग) जड़े हैं। मनोभाव, भाषा आदि क्रिया से जुड़े हुये हैं। लेकिन मस्तिष्क में क्या है. इसका यदि कोई अनुमान लगाया जा सकता है तो वह मानसिक अवस्था से है। यह मानसिक अवस्था वही है जो (ग) और (ग) द्वारा पैदा की गयी है। देखा जाये तो मानसिक अवस्था वाह्य क्रियाएँ, संवेग और मनोभाव ऐसे है जिन्हें देखा नहीं जा सकता है। इस तरह (क) (ख) और (ग) यानी मानसिक अवस्था. गतिविधियाँ और क्रियाकलाप और इनसे जुड़े हुए संवेग और मनोभाव अतार्किक क्रिया है। सूत्र रूप में इसे इस प्रकार परिभाषित करेंगे। अतार्किक क्रियात्रमानसिक अवस्था क्रियाकलाप संवेग और मनोभावों की अभिव्यक्ति त्रिभुज के ये तीनों कोण एक-दूसरे पर निर्भर है। मानसिक अवस्था क्रियाकलाप और मनोभावों की अभिव्यक्ति के बीच में कार्य-कारण ढूंढना बहुत कठिन है। सच्चाई यह है कि ये तीनों एक-दूसरे पर निर्भर है और अतार्किक क्रिया का सिद्धांत बनाते हैं। अतार्किक क्रियाओं का गणितशास्त्र की तरह दो और दो चार का संबंध नहीं होता है। मनोदशा ही अतार्किक क्रियाओं का मूल स्रोत है। कहीं भी पैरेटो ने अपने विश्लेष्ण में मनोविज्ञान को समाजशास्त्र से पृथक करके नहीं देखा। अतः इनके सिद्धान्तीकरण में अतार्किक क्रियाएँ समाजशास्त्रीय व मनोवैज्ञानिक दोनों है।