मिडिल रेंज सिद्धांत और प्रकार्यवादी विश्लेषण - Middle Range Theory and Functionalist Analysis
मिडिल रेंज सिद्धांत और प्रकार्यवादी विश्लेषण - Middle Range Theory and Functionalist Analysis
मर्टन के अनुसार दैनिक से संबंधित समस्याओं पर आधारित मिडिल रेंज सिद्धांतों को निर्मित करके उन्हें अतिव्यापक सिद्धांतों के आलोक में देखना बेहतर होगा। उदाहरण सहित अपनी इस बात को स्पष्ट करते हुए मर्टन कहते हैं कि सामाजिक विघटन की व्यापक प्रक्रिया (जिस पर अनेक सिद्धांतकारों ने विचार प्रस्तुत किए हैं) के अंतर्गत रखकर आदर्शशून्यता (Social anomic) के सिद्धांत की जाँच पड़ताल की जा सकती है। ऐसा करने की पद्धति भी मर्टन ने प्रकार्यात्मक शब्द रूपावली (Functional paradigms) द्वारा बताया है। सामाजिक प्रक्रिया में जरूरी अथवा आवश्यक तथा गैरजरूरी अथवा अनाश्यक का अंतर करते हुए मर्टन ने मिडिल रेंज सिद्धांत के निर्माण का प्रयास किया है।
प्रकार्यवाद की निम्नलिखित तीन स्थापनाओं में मर्टन ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। सामाजिक व्यवस्था की प्रकार्यात्मक एकता (The functional unity of social System) व्यवस्था में व्याप्त विविधता और विघटनकारी (शक्तियों) तत्वों का विश्लेषण संभव नहीं हो पाएगा। मर्टन मानते हैं
कि सामाजिक व्यवस्था में एकता को देखना ही है तो उसे तथ्यगत प्रमाणों के आधार पर देखा जा सकता है।
सामाजिक घटनाओं की प्रकार्यात्मक सार्वभौमिकता (The functional universality व social items) - मर्टन इस बात से पूर्णतया असहमत है कि समाज की सभी घटनाएँ व्यवस्था की एकता हेतु आवश्यक है। मर्टन दो बातों पर विशेष बल देते हैं। प्रथम यह कि घटनाएँ प्रकार्यात्मक (Functions) तथा अप्रकार्यात्मक (Manifest) और अप्रकट (latent) दोनों ही प्रकार के होते हैं।
सामाजिक व्यवस्था हेतु प्रकार्यात्मक घटनाओं की अनिवार्यता (The indispensability व functional items for social system) मर्टन के अनुसार किसी सामाजिक व्यवस्था हेतु अनिवार्य आवश्यकताएँ कौन-कौन सी है? इसे तथ्यों के आधार पर ही स्पष्ट किया जा सकता है।
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