विवाह में आधुनिक परिवर्तन - Modern Changes in Marriage

विवाह में आधुनिक परिवर्तन - Modern Changes in Marriage


सभी समाजों में आज विवाह संस्था नए परिवेश ग्रहण कर रही है। यह सच है कि कुछ समाजों में विवाह के रूप में होने वाला परिवर्तन अपेक्षाकृत कम है। जबकि कुछ समाजों में विवाह से संबंधित मान्यताएँ निषेध और आधारभूत सिद्धांत पूर्णतया बदल चुके हैं। वर्तमान युग में विवाह के सभी नए परिवेशों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। विवाह का पहला परिवेश वह है जो रोमांटिक प्रेम की आधुनिक सत्ता के कारण हमारे सामने आया है। जो सामाजिक वर्तमान शिक्षा और औद्योगीकरण का परिणाम है। विवाह का तीसरा स्वररूप वह है जो सामाजिक अधिनियमों में क्रान्तिकारी परिवर्तन होने के कारण व्यक्तियों को अपने विचारों में बराबर परिवर्तन करने की प्रेरणा दे रहा है। रोमांटिक प्रेम की आधुनिक सत्तान ने वैवाहिक संबंधोंकी स्थिरता को सबसे अधिक प्रभावित किया है। यदि हम भारतीय समाज का उदाहरण लें तो ज्ञात होगा कि यह स्थिति हमारे वैवाहिक और पारिवारिक जीवन को प्रभावित करने में सबसे अधिक महत्वपूर्ण रही है।

रोमांटिक प्रेम एक विशेष विचारधारा है जो विवाह को एक संयोग न मानकर उसे स्त्री-पुरूष का सुविधापूर्ण बंधन मानती है। इस विचारधारा के कारण विवाह से पहले ही स्त्री और पुरूष एक दूसरे के घनिष्ठ संपर्क में आना बुरा नहीं समझते बल्कि कभी-कभी तो विवाह से पूर्व के संबंधों को सुखी पारिवारिक जीवन का आधार तक मान लिया जाता है। स्पष्ट है कि इस विचारधारा से प्रभावित विवाहों में जाति सम्प्रदाय अथवा परिवार की कुलीनता आदि को अधिक महत्व नहीं दिया जाता। कभी-कभी तो भिन्न धर्मों के व्यक्ति भी प्रेम संबंधों के कारण विवाह कर लेना अच्छा समझते हैं। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि रोमांस से प्रभावित विवाह अथवा दूसरे शब्दों में प्रेम विवाह को हम अनैतिक अथवा अनुचित कह दें। इससे इतना अवश्य स्पष्ट होता है कि ऐसे विवाहों के कारण हमारी परम्परागत सांस्कृतिक विशेषताओं और सामाजिक मूल्यों के सामने गम्भीर समस्यात उत्पन्न हो जाती है। ऐसे विवाह व्यक्तिवादिता और एकांकी परिवार को प्रोत्साहन देते हैं जिससे संयक्त परिवार व्यवस्था को बनाए रखना कठिन हो जाता है। प्रेम विवाह वास्तव में दो व्यक्तियों का संबंध है दो परिवारों का नहीं।

वास्तविकता यह है कि प्रेम भावना अपने आप में एक उद्वेग है जिसमें तर्क और विवेक का अधिक महत्व नहीं होता। इस भावना से प्रभावित परिवार भी साधारणतया अधिक स्थायी जीवन व्यतीत नहीं कर पाते। इसका एक कारण तो यह है कि प्रेम विवाह के अंतर्गत दोनों पक्ष अपने-अपने अधिकारों का दावा अधिक करने हैं जबकि उनमें कर्तव्य का बोध बहुत कम होता है। दूसरा कारण यह है कि वैवाहिक जीवन की अपनी कुछ प्रमुख आवश्यकताएँ होती हैं जिनको पूरा करने के लिए पारस्परिक सहानुभूति और त्याय की आवश्यकता होती है। रोमांटिक प्रेम में इस प्रकार पारिवारिक त्याग कठिनता से ही पाया जाता है। यदि विभिन्न समाजों में सांख्यिकी एकत्रित की जाय तो मालूम होगा कि जिन समाजों में रोमांटिक प्रेम के द्वारा विवाह जितनी अधिक मात्रा में होते हैं वहाँ विवाह-विच्छेद की संख्या भी उतनी ही अधिक होती है। इसका मुख्य कारण यह है कि रोमांटिक प्रेम के अन्तर्गत पति और पत्नी की स्थिति विवाह से पहले और विवाह के बाद बिल्कुल भिन्न-भिन्नी हो जाती है। इतनी भिन्न कि कभी-कभी इसका अनुमान लगाना भी कठिन होता है। स्वभाविक है कि इससे वैवाहिक संबंधों की स्थिरता ही कम नहीं होती बल्कि बच्चों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।


उपर्युक्तप विवेचन का तात्पर्य यह नहीं है कि प्रेम विवाह वैवाहिक संबंधों की स्थिरता की हमेशा प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं। वास्तविकता यह है कि ऐसे विवाहों के फलस्वपरूप पति और पत्नी को एक-दूसरे की भावनाओं को समझने और एक-दूसरे से अनुकूलन करने का सबसे अधिक अवसर मिलता है। साधारणतया ऐसे विवाहों में पति-पत्नी की योग्यता रूचि और आयु में अधिक अंतर नहीं होता। इसके फलस्वरूप समाज में वैवाहिक समस्याएँ पैदा नहीं हो पाती जिनका सामना हम पिछले सैकड़ों वर्षों से करते आ रहे हैं। इस दृष्टिकोण से रोमांटिक प्रेम से प्रभावित विवाह अक्सर वैवाहिक संबंधों की स्थिरता को बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध हुए हैं। शिक्षा और औद्योगीकरण के फलस्वरूप भी विवाह के रूप में आज क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। सर्वप्रथम अब कोई भी शिक्षित व्यक्ति विवाह को जन्म-जन्मांतर का एक अटूट धार्मिक बंधन नहीं समझता। आज जब कभी भी पति-पत्नि के बीच सहयोग पूर्णतया समाप्त हो जाता है तो विवाह-विच्छेद कर लेना अधार्मिक कार्य कहीं माना जाता। हमारे समाज में विवाह का प्रमुख उद्देश्य धार्मिक दायित्वों को पूरा करना अथवा पुत्र प्राप्ति आदि करना नहीं रह गया है।

इसके अतिरिक्त सामाजिक जीवन में यज्ञों श्राद्ध तथा तर्पण जैसी क्रियाओं के प्रति उदासीनता बढ़ने के कारण भी विवाह से संबंधित परंपरागत मनोवृत्ति बहुत तेजी से बदल रही है। शिक्षा संस्थाओं में सह-शिक्षा में वृद्धि होने तथा मनोवृत्तियों में परिवर्तन हो जाने से अंतरजातीय विवाहों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। वास्तविकता यह है कि हमारे समाज में स्वतंत्रता के बाद बनने वाले सामाजिक विधानों ने भी विवाह के रूप में महत्वपूर्ण परिवर्तन उत्पन्न किए हैं। इन विधानों के कारण केवल एक विवाह को ही मान्यता दी गयी तथा विधवाओं की सभी निर्योग्यताओं तथा जाति संबंधी बंधनों को कानून के द्वारा समाप्त कर दिया गया है। सामाजिक विधानों के सामने गोत्र, प्रवर अथवा सपिण्ड का कोई विशेष महत्व नहीं है। इन सब परिस्थितियों के फलस्वरूप विवाह से संबंधितपुरानी समस्या जरूर समाप्ति हो गयी है। लेकिन आज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि विवाह का धीरे-धीरे व्यापारीकरण हो रहा है। इस व्यापारीकरण का स्पष्ट रूप हमें दहेज प्रथा की बढ़ती हुई प्रवृत्ति के रूप में देखने को मिल रहा है। इन सब परिवर्तनों को देखते हुए हम यह सम्भावना कर सकते हैं कि भविष्य में विवाह के रूप में और भी अधिक क्रांतिकारी परिवर्तन हो जाएंगे।