गुणारोपण : स्वरूप एवं परिभाषा - Multiplication: Nature and definition
गुणारोपण : स्वरूप एवं परिभाषा - Multiplication: Nature and definition
कोई भी व्यक्ति किसी सामाजिक उद्दीपक या घटना का जिस रूप में प्रत्यक्षीकरण करता है. उसी के अनुकूल उसकी अनुक्रिया होती है। एक ही सामाजिक घटना के प्रति भिन्न-भिन्न व्यक्तियों की भिन्न भिन्न प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं, जिसका कारण यह है कि भिन्न-भिन्न व्यक्ति उस घटना का प्रत्यक्षीकरण विभिन्न प्रकार से करते हैं। अर्थात लोगों के समस्त सामाजिक व्यवहार वस्तुतः सामाजिक उद्दीपकों या घटनाओं के प्रत्यक्षीकरण से निर्धारित होते हैं। मनुष्य के सामाजिक परिवेश में तीन प्रकार के उद्दीपक सर्वाधिक महत्वपूर्ण है:
• दूसरा व्यक्ति।
• दूसरे व्यक्तियों द्वारा संपादित की जाने वाली क्रियाएं।
• वह व्यक्ति जो किसी दूसरे व्यक्ति तथा उसकी क्रियाओं का प्रेक्षण करता है। सामाजिक व्यवहारों के निर्धारण में इन तीनों उद्दीपकों के प्रत्यक्षीकरण की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। किसी स्थिति में किसी व्यक्ति का किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति कैसा व्यवहार होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि
• वह व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का प्रत्यक्षीकरण किस रूप में कर रहा है। (व्यक्ति प्रत्यक्षीकरण)
• व्यक्ति दूसरे व्यक्ति द्वारा की जाने वाली क्रियाओं का प्रत्यक्षीकरण किस रूप में कर रहा है।
व्यक्ति स्वयं अपना प्रत्यक्षीकरण किस रूप में रहा है। (आत्म प्रत्यक्षीकरण) जब भी कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के व्यवहारों का प्रत्यक्षीकरण करता है, तो उस समय उसको मात्र इतनी ही जानकारी नहीं होती है कि व्यक्ति ने किस प्रकार का कार्य किया। बल्कि वह स्वाभाविक रूप से व्यक्ति के व्यवहारों के कारण अथवा उसके मूल में निहित स्रोतों अथवा प्रेरकों का भी अनुमान कर लेता है। उदाहरण मान लीजिए कि कोई व्यक्ति आपके पास मदद मांगने के लिए आता है। वह कहता है कि मेरे इलाके में भूकंप आने से मेरी मकान क्षतिग्रस्त हो गई है। खाने-पीने और रहने की समस्या उत्पन्न हो गई है। कुछ आर्थिक मदद आपके द्वारा हो जाती तो बड़ा अच्छा रहता है। उस समय आप मात्र उसके बनावट और शारीरिक स्थिति तथा उसके द्वारा आर्थिक सहायता की मांग का ही प्रत्यक्षीकरण नहीं करते, बल्कि यह भी अनुमान लगाने का प्रयास करते हैं कि उसकी स्थिति वास्तविक है या वह दूसरों को ठगने के लिए वैसा रूप बनाया है, और पैसा कमाने के लिए भीख मांग रहा है। किसी व्यक्ति और उसके कार्य का प्रत्यक्षीकरण करते समय इसी प्रकार का अनुमान कर लेना ही गुणारोपण कहलाता है। फेल्डमैन (1985) के अनुसार, “दूसरे लोगों के व्यवहारों के कारणों को समझना और उसके संबंध में निर्णय देना गुणारोपण कहलाता है।
'' पिटस्ट्रेन तथा निकी हेस (1991) के अनुसार, “गुणारोपण, वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा किसी घटना या किसी व्यक्ति के व्यवहार को अनुमानों के द्वारा समझा जाता है तथा निर्णय लिया जाता है कि उस व्यक्ति या घटना में कोई विशेष गुण या विशेषता है।"
रेबर तथा रेबर (2001) ने गुणारोपण को परिभाषित करते हुए कहा कि यह वह प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने प्रति या दूसरों के प्रति एक विशेषता अथवा शीलगुण, संवेग इत्यादि को आरोपित करता है। अर्थात कहा जा सकता है कि अपने परिवेश में कार्य-कारण की संरचनाओं के संज्ञानात्मक समझदारी के लिए गुणारोपण सहायक होता है। इसमें एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के व्यवहार के कारण को समझने तथा उसके अनुकूल निर्णय देने का प्रयास करता है। साथ ही वह व्यक्ति अपने व्यवहार के कारण को समझने तथा उससे संगत निर्णय देने का प्रयास भी करता है। कोई भी व्यक्ति प्रयत्क्ष के कारण का अनुमान लगा लेते हैं। गुणारोपण को कारणता के प्रत्यक्षीकरण (Perception of Causality) के नाम से भी जाना जाता है।
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