मुस्लिम विवाह-विच्छेद - Muslim divorce
मुस्लिम विवाह-विच्छेद - Muslim divorce
चूंकि मुस्लिम विवाह एक संविदा है अतः इसे तोड़ना अर्थात् तलाक को मुस्लिम समाज में न्याय-संगत माना गया है। हिंदुओं की तरह मुसलमानों में विवाह कोई जन्म-जन्मांतर का संबंध नहीं होता है और ना ही यह कोई धार्मिक संस्कार होता है। मुस्लिमों में विवाह-विच्छेद को एक सरल घटना माना जाता है तथा यह प्रक्रिया संभवतः अन्य सभी समाजों की तुलना में अधिक छूट है। हालांकि व्यावहारिक जीवन में मुस्लिम विवाहों में भी काफी स्थिरता देखने को मिलती है। हालांकि यहाँ भी पुरुषों को महिलाओं की तुलना में अधिक स्वतंत्रता और अधिकार प्राप्त हैं। यदि पुरुष चाहे तो मात्र तलाक-तलाक के उच्चारण से भी स्त्री से तलाक ले सकता है, परंतु स्त्री को तलाक लेने के लिए पुरुष को दोषी साबित करवाना होगा।
मुस्लिम समाज में विवाह-विच्छेद का प्रथागत तरीका ही प्रचलित है, प्रमुख अधोलिखित हैं
1- तलाक
मुस्लिम क के अनुसार कोई भी पुरुष, जो बालिग हो और मानसिक तौर पर स्वस्थ हो, अपनी पत्नी से जब चाहे बिका किसी कारण का जिक्र किए तलाक ले सकता है।
तलाक लिखित अथवा अलिखित किसी भी रूप में हो सकता है। लिखित तलाक के लिए तलाकनामा की आवश्यकता पड़ती है, जबकि अलिखित तलाक के लिए तलाक का उच्चारण मात्र ही काफी है। यहाँ ध्यान देने की आवश्यकता है कि यदि तलाक-तलाक का उच्चारण नशे की हालत में किया जाता है तो भी तलाक वैध रहता है। यह उच्चारण पत्नी की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति से प्रभावित नहीं होता है। इस स्थिति में काजी के पास जाकर तलाकनामा देना होता है और तलाक संपन्न हो जाता है। तलाक यदि पत्नी की अनुपस्थिति में लिया जाता है तो उसका नाम भी उच्चरित किया जाना आवश्यक होता है, अन्यथा नहीं। मुसलमानों में लिखित तथा अलिखित तलाक के कुल तीन प्रकारों के बारे में वर्णन किया गया है -
i) तलाक-ए-अहसन
तलाक के इस स्वरूप में पत्नी के तुहर काल (मासिक धर्म के समय) के दौरान पति एक बार तलाक की घोषणा करता है तथा इद्दत की अवधि तक शारीरिक संबंध नहीं बनाता है। इसके बाद जैसे ही इद्दत की अवधि समाप्त होती है, उसकी समाप्ती के साथ ही विवाह संबंध भी समाप्त हो जाता है।
ii) तलाक-ए-हसन
इसमें पत्नी के तीन 'तुहर' काल तक पति एक बार तलाक की घोषणा दोहराता रहता है तथा तीन तुहरों की अवधि तक शारीरिक संबंध नहीं बनाता है। इसके बाद तीसरे तुहर पर पति पुनः तलाक की घोषणा को दोहराता है तथा इसके बाद यह तलाक पूर्ण हो जाता है।
iii) तलाक-उल-बिद्दत
यह तलाक का सबसे आसान तरीका है। इसमें पति को तुहर के समय केवल एक बार स्पष्ट तौर पर तलाक की घोषणा करनी होती है और तलाक को मान लिया जाता है। घोषणा करने के दौरान किसी भी गवाह की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ता है। कभी कभी एक ही तुहर में पति द्वारा तीन बार तलाक की घोषणा कुछ समय के अंतर कर कर देने से भी तलाक पूर्ण हो जाता है।
2- इला
इसमें पति कसम खाकर चार महीने तक पत्नी के साथ शारीरिक संबंध नहीं रखने की प्रतिज्ञा करता है, तो अवधि पूर्ण होने के पश्चात तलाक पूर्ण मान लिया जाता है। वहीं इसके विपरीत यदि पति इस अवधि के दौरान पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बना लेता है, तो यह इला टूट जाती है तथा विवाह संबंध बना रहता है।
3- जिहर
यह तलाक अदालत द्वारा कराया जाता है। 'जिहर' शब्द का अर्थ होता है गैर कानूनी तुलना द्वारा तलाक'। यदि पति अपनी पत्नी की तुलना किसी ऐसे संबंधी से करता है जिससे वैवाहिक संबंध रखना निषिद्ध है, तो यह तुलना कुरान शरीफ द्वारा ठीक नहीं समझी जाती है और इसके बाद पत्नी अपने पति से प्रायश्चित करने को कहती है। प्रायश्चित न करने पर पत्नी अदालत से तलाक की मांग कर सकती है।
4 खुला
तलाक के इस स्वरूप में पत्नी द्वारा पति से तलाक की मांग की जाती है तथा उसे इस तलाक के एवज में पति को कुछ प्रतिफल देना पड़ता है। इस प्रतिफल में वह मेहर' की रकम वापस कर सकती है अथवा किसी अन्य रूप में क्षतिपूर्ति पेश कर सकती है। पति को प्रतिफल देने के पश्चात पत्नी विवाह बंधन से मुक्त हो जाती है।
5- मुबारत
यह पति और पत्नी दोनों की आपसी सहमति से किया जाता है। तलाक के इस प्रकार में किसी प्रकार के प्रतिफल की संकल्पना नहीं है।
6- लियान
इसमें पति अपनी पत्नी पर व्यभिचार और चरित्रहीन होने का आरोप लगता है और पति द्वारा आरोप वापस न लेने की दशा में पत्नी चाहे तो अदालत में तलाक के लिए अर्जी दे सकती है तथा तलाक ले सकती है।
ऐसी दशा में यदि पति द्वारा लगाया गया आरोप वापस ले लिया जाता है तो मुकदमा समाप्त हो जाता है।
7- तलाक-ए-तफ़वीज
इसमें तलाक की मांग पत्नी द्वारा की जाती है तथा यह मांग पत्नी द्वारा विवाह के समय प्राप्त अधिकारों के आधार पर की जाती है।
वार्तालाप में शामिल हों