राष्ट्रवादी इतिहास लेखन: दूसरा चरण - Nationalist Historiography: Phase 2

राष्ट्रवादी इतिहास लेखन: दूसरा चरण - Nationalist Historiography: Phase 2


आर. जी. भंडारकर (1837-1925), रोमेशचंद्र दत्त (1848-1909), के.पी. जायसवाल (1881 1937), राधाकुमुद मुखर्जी (1880-1963), एच. सी. रायचौधरी (1892-1927), जी. एस. देसाई (1865 1959), जदुनाथ सरकार (1870-1958), सुरेन्द्रनाथ सेन (1890-1962), के. एम. पणिक्कर (1895-1963) व आर.सी. मजूमदार (1888-1980) जैसे राष्ट्रवादी इतिहासकारों का अधिकांश लेखन भारतीय स्त्री को आदर्श स्त्री, माँ, देवी, आदि के रूप में गौरवान्वित करता है। ए.एस. अल्तेकर की रचना 'द पॉजिशन ऑफ वीमन इन हिंदू सिविलाइजेशन' (1938) राष्ट्रवादी स्त्री इतिहास के रूमानीवाद का श्रेष्ठ उदाहरण है।


उमा चक्रवर्ती और कुमकुम रॉय जैसी स्त्रीवादी इतिहासकारों ने प्राचीन भारत में स्त्रियों पर राष्ट्रवादी इतिहास लेखन की सीमाओं और व्याख्याओं की समस्याओं को विस्तार से बताया है:-


• आजादी के आंदोलन की पृष्ठभूमि में यह रचनाएँ भारतीय स्त्री के संबंध में लिखी गई रचनाओं की प्रतिक्रिया स्वरूप आई। इस कारण इन रचनाओं में अतीत का गौरवगान एक सामान्य प्रवृत्ति है।


• प्राचीन भारत में स्त्रियों की पुत्री, पत्नी माता और विधवाओं की श्रेणियाँ थी । इतिहासकारों ने यह जरूरी नहीं समझा कि सगोत्रता से बाहर स्त्री की भूमिका का विश्लेषण किया जाए और एक वृहद समुदाय के संदर्भ में स्वायत्त भूमिका हो।


• राष्ट्रवादी इतिहास दृष्टि की एक प्रमुख समस्या आलोचनात्मक समझ की कमी है। जिन स्रोतों के आधार पर यह दृष्टि विकसित हुई वे ब्राह्ममणीय स्रोत थे। अन्य स्रोतों के प्रति इनमें उपेक्षा का भाव मौजूद है।


• इन रचनाओं में उच्च जाति की हिंदू स्त्री पर ही जोर दिया गया है, सामान्य स्त्री को पूरी तरह नज़र अंदाज़ किया गया है। अनेक इतिहासकार वेशभूषा, आभूषण, रस्मी अधिकारों आदि के वर्णन में डूबे हैं।


• प्राच्यविदों और बाद में नए शिक्षित मध्यवर्ग से आने वाले हिंदू राष्ट्रवादियों ने वैदिक युग को स्वर्ण युग कहा। प्राचीन भारत में स्त्रियों को ऊँचा स्थान प्रदान किया जाता था।

इस पुनर्निर्माण का परिणाम यह था कि भारतीय स्त्री की अवनति के लिए मुस्लिम शासन उत्तरदायी माना गया था। स्वर्ण युग के मिथक' की पुनर्खोज हिंदू राष्ट्रवादी पुरुष के लिए तात्कालिक स्त्री की अवनति अवस्था के भार से मुक्त होने का प्रयास थी। यह मिथक काफी प्रचलित रहा और काफी समय तक अकादमिक जगत में स्वीकारा गया। यह मिथक इन विद्वानों द्वारा प्राचीन समय में भारत में भारतीय स्त्री की उच्च स्थिति के बारे में बनाए गए साधारणीकरण पर आधारित था। ऐसा करते हुए वैदिक साहित्य में वर्णित केवल दो उदाहरण गार्गी और मैत्रेयी का उल्लेख किया गया।


उमा चक्रवर्ती और कुमकुम रॉय जैसी विदूषियों ने प्रविधि की समस्याओं को भी बताया है। उमा चक्रवर्ती वैदिक युग में ऐतिहासिक चुप्पी पर सवाल उठाती हैं। डॉ. चक्रवर्ती ने अल्तेकर दृष्टि से आगे जाकर स्त्री इतिहास को देखने की आवश्यकता पर जोर दिया। अल्तेकर ने प्राचीन भारत में स्त्रियों की ऊँची स्थिति के संबंध में काफी कम प्रमाण दिए हैं। इन सीमाओं के बावजूद भी राष्ट्रवादी इतिहासकारों के काम ने प्राचीन समय में भारतीय स्त्री के बारे में प्रचलित जन सामान्य बोध को गढ़ने में प्रभावी भूमिका अदा की। बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में हाल ही में स्त्रीवादी विद्वानों/विदूषियों ने अल्तेकर दृष्टि को चुनौती देना प्रारंभ किया है।