धार्मिक शिक्षा का स्वरुप - nature of religious education

धार्मिक शिक्षा का स्वरुप - nature of religious education


विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा देने पर सहमति बनने के उपरांत यह प्रश्न उठता है की धार्मिक शिक्षा का स्वरुप कैसा रहें? कुछ शिक्षाशास्त्रियों का यह मानना है कि धर्म सिखाया नहीं जाता वह अनुभव के द्वारा समझा जा सकता है। धार्मिक शिक्षा का स्वरूप निर्धारित करने से पूर्व हमें यह ध्यान में रखना है की विद्यालयों में विद्यालयों में विभिन्न धर्मो के विद्यार्थी प्रवेशित होते हैं। अपने विशिष्ट धर्मो में श्रद्धा रखनेवाले विद्यार्थियों के लिए किसी एक विशिष्ट धर्म की शिक्षा देना उचित नहीं है। हमें यह भी देखना है धार्मिक शिक्षा देते समय विद्यार्थियों के मन में अन्य धर्म के प्रति द्वेष निर्माण न हो। धार्मिक शिक्षा देते समय हमें सर्वधर्मसमभाव का दृष्टिकोण रखना आवश्यक है। अनेक विद्वानों का यह मत है कि सभी धर्मो के आदर्श मूलभूत तत्व. सभी धर्मो के विचारकों के आदर्श विचार, महान धर्म प्रवर्तकों के जीवन-चरित्र, समान आदर्श मूल्य आदि का समावेश धार्मिक शिक्षा में कराना उचित होगा।


विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा देने के संदर्भ में एक विचार प्रवाह यह है कि अन्य पाठ्यविषयों की भांति धार्मिक शिक्षा के लिए समय सारणी में स्वतंत्र कालांश रखना सही नहीं है। किन्तु विद्यालयों का समग्र वातावरण धार्मिक बनाना उच्च धार्मिक शिक्षा के लिए योग्य सिद्ध होगा। विद्यालय का वातावरण ऐसा बनाये कि विद्यार्थी अनुसरण कर सकें। कर्मी, शिक्षक, प्रधानाध्यापक आदि के आदर्श आचरण का अवलोकन कर धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा ग्रहण कर सकें। विद्यालयों मेधार्मिक एवं नैतिक शिक्षा पर आधारित विभिन्न गतिविधियों का आयोजन करना चाहिए। सभी धर्मो के आदर्श, मूल्य, नियम एवं तत्व आदि को व्यवहार में लाने के लिए प्रोत्साहित करनेवाली शिक्षा देना आवश्यक है। विद्यार्थियों अध्यात्मिक एवं नैतिक गुणों के प्रति आदर निर्माण करना चाहिए।

विद्यालयों की दिनचर्या में सर्वधर्म प्रार्थना, मौन चिंतन, सामाजिक एवं धार्मिक सलोखा निर्माण करनेवाली गतिविधियाँ, धार्मिक एवं नैतिक विचारकों का विचारमंथन, महान पुरुषों की जीवनगाथा, आदर्श एवं प्रेरनादायी पुस्तक एवं वचनों का पठन आदि सम्मिलित होने चाहिए। जिससे विद्यार्थियों में सर्वधर्म के प्रति आदर निर्माण किया जाएगा। 


मानव का निर्माण करने वाली शिक्षा वास्तव में धार्मिक शिक्षा कहलाती है। क्योंकि आज के वर्तमान युग में मानव को मानव बनाना शिक्षा की महत्वपूर्ण चुनौती है।