धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप - Nature of Secularism
धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप - Nature of Secularism
भारत एक प्रजातंत्र राष्ट्र होने के कारण आदर्श नागरिकता की शिक्षा प्रदान करना आवश्यक है। भारतीय संविधान के अनुसार धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में सभी धर्मो को समान मान्यता प्रदान है। नागरिकों में धर्मनिरपेक्षता का भाव विकसित करना अत्यंत जरुरी है। शिक्षा द्वारा यह कार्य प्रभावशाली ढंग किया जा सकता है। ऐनी बेसेन्ट के अनुसार, मानवता की शिक्षा देकर विश्व में एकता की भावना विकसित की जा सकती है। सभी धर्मो अंतर्निहित मानवतावादी दृष्टिकोण को अपनाकर मानवता की ओर आकर्षित करने के लिए धर्म निरपेक्षवादी दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह किया है।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के अनुसार धर्मनिरपेक्षता को अध्यात्मवादी अथवा धर्मविरोधी समझना नितांत भ्रामक है।
भारतीय संविधान में 1976 के 42 वे संशोधन के अनुसार संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता का स्वीकार किया गया। भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता एवं पंथनिरपेक्षता का अंगीकार किया है। भारतीय संविधान के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से किसी भी धर्म को अपनाने की स्वतंत्रता प्रदान करना ही धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है। भारतीय संविधान की धारा 15 एवं 16 धार्मिक भेदभाव अमान्य किया है। धारा 25 के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को धर्म के पालन की आझादी प्रदान करता है। धारा 23 के अनुसार राज्य द्वारा आर्थिक अनुदान प्राप्त शिक्षण संस्थाओं में से धार्मिक शिक्षा की अनिवार्यता अमान्य की गई है।
धारा 325, 350. 352 के अनुसार धर्म के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र की निर्मिती पर विरोध किया है। सारांश रूपसे कहा जा सकता है की भारतीय संविधान के विविध धाराओं में धर्मनिरपेक्षता के तत्व सम्मिलित है। धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ, एक ऐसा राज्य जिसमे सभी धर्मो से समान बर्ताव करे। राज्य धर्म के संदर्भ में पूर्णत: तटस्थ रहेगा एवं किसी धर्म में हस्तक्षेप न करते हुए सभी धर्मों को समान संरक्षण प्रदान करेगा। राज्य के नीति निर्धारण में सभी धर्मो सभी धर्मो समान महत्व देगा। राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा। संविधान की धारा25-28 में विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रदान की है। अर्थात भारतीय समाज को अपने धर्म में विश्वास एवं उपासना का स्वतंत्रता की अनुमति है।
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