मानवाधिकार की आवश्यकता - need for human rights

 मानवाधिकार की आवश्यकता - need for human rights


मानवाधिकारों को सामान्यतः ऐसे अधिकारों के रूप में परिभाषित किया जाता है जिनका उपभोग करने और जिनकी रक्षा की अपेक्षा रखने का हक प्रत्येक मनुष्य को है। अतीत में सभी समाजों और संस्कृतियों ने कुछ ऐसे अधिकारों और सिद्धांतों की अवधारणा का विकास किया है जिनका आदर करना आवश्यक समझा गया है और जिनमें से कुछ को सार्वजनीन माना गया है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता में एक गहरी मानवतावादी परंपरा और सहिष्णुता की परंपरा तथा विविधता तथा अनेक रूपता के प्रति आदर की परंपरा रही है। भारतीय दर्शन परंपरा ने सार्वजानिक बधुत्व और तमाम विश्व को एक परिवार के रूप में देखने (वसुधैव कुटुम्ब कम) की अवधारणाओं को स्पष्ट किया। ये अवधाणाएं अनेक धार्मिक और समाज सुधार आंदोलनों में भी प्रबलतापूर्वक प्रतिबिंबित हुई। इसी प्रकार के विचार अन्य संस्कृतियों और सभ्यताओं में भी विकसित हुए। मावतावाद यूरोप में पुनर्जागरण (रिनासा) और ज्ञानोदय (इनलाटेनमेंट) का मूलमंत्र कहा जा सकता है।

उसने मनुष्य को सर्वोच्च शिखर पर प्रतिष्ठित किया, उसके तात्विक सामर्थ्य और गरिमा पर जोर दिया, उसकी असीम सृजनात्मगक संभावना में गहन आस्था व्यक्त की और व्यक्ति की स्वतंत्रता तथा व्यिक्त के अपरिहार्य अधिकारों की घोषणा की। मानवाधिकारों को मान्यता दिलाने की खातिर और राजनितिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक दमन के खिलाफ तथा अन्याय और असमानता के विरोध में किए गए संघर्ष सभी मानव समाजों के इतिहास का अभिन्न अंग रहे हैं। मानव जाति का सदस्य होने के नाते प्रत्येक मनुष्य जिन अधिकारों का उपयोग करने का हकदार है, इतिहास में उनकी अवधारणा के विकास में ये संघर्ष हमेशा निर्णायक रहे हैं और अब भी हैं, खास तौर पर उन अधिकारों का वास्तविक उपभोग करने में मानव अधिकारों की अवधारणा के विकास की प्रक्रिया में और अधिकारों के वास्तविक व्यवहार में आने में परस्पर विरोध पाए जाते रहे हैं।

सार्वजनीन बंधत्व की अवधारणा से व्यवहार में सामाजिक दमन में कोई विशेष कमी नहीं हुई। यूरोपीय-पूर्व संस्कृतियों के विध्वंस, इंसानों की तिजारत और विश्व के कई भागों के उपानिवेशीकरण की शुरूआत का भी काल था। उन्नीसवीं सदी में उदित समाजवादी आंदोलन के साथ मानवाधिकारों की विकासशील अवधारणा में एक नया तत्व जुड़ गया। इस आंदोलन का जोर वर्ग-आधारित शासन की समाप्ति तथा सामाजिक और आर्थिक समानता पर था। इसमें संदेह नहीं कि मानवाधिकारों की समकालीन अवधारणा तथा उसका सार्वजनीन स्वरूप एवं विश्वव्यापी स्वीकृति अतीत की समृद्ध विरासत पर आधारित है, परंतु उसे बीसवीं सदी के विशिष्ट ऐतिहासिक संदर्भ में देखना ही उचित होगा। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के लगभग पूरे दौर में हमें एक ओर तो विश्व के बहुत बड़े हिस्सों में औपनिवेशिक शासन का वर्चस्व, बहुत से देशों में सर्वसत्तावादी सरकारों का उदय, तथा कुछ देशों में बर्बर और आक्रमक फासीवादी शासन व्यवस्थाओं की स्थापना देखने को मिलती है और है दूसरी ओर उपनिवेशों में राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलनों तथा अनेक देशों में लोकतंत्र एवं सामाजिक प्रगति की हलचलों के दर्शन होते हैं। बीसवीं सदी में ही मानव इतिहास के दो सबसे विनाशकारी युद्ध हुए, और पहले युद्ध के बाद जो बीस वर्षों की शांति का अंतराल पड़ा वह भी द्वितीय विश्व युद्ध की तैयारी का दौर भर था।'