संस्कृति का नव-उद्विकासवादी सिद्धांत - neo-evolutionary theory of culture

 संस्कृति का नव-उद्विकासवादी सिद्धांत - neo-evolutionary theory of culture


जूलियन एच. स्टीवर्ड (1955) ने अपनी पुस्तक थ्योरी ऑफ कल्चरल चेंज' में सांस्कृतिक उद्विकास की बात की है। उन्होंने सांस्कृतिक उद्विकास को तीन श्रेणी में बाटा है- एकरेखीय उद्विकास, सार्वभौमिक उद्विकास एवं बहुरेखीय उद्विकास। स्टीवर्ड ने विश्व की विभिन्न संस्कृतियों को इन उद्विकासीय श्रेणियों में रखा है। इसके साथ ही साथ उन्होंने सांस्कृतिक पारिस्थितिकी की भी चर्चा की है। उनका मानना था कि विश्व की जितनी भी संस्कृतियां हैं, उनका स्थानीय पारिस्थितिकी से विशेष संबंध होता है। स्थानीय पारिस्थितिकी के आधार पर विभिन्न संस्कृतियों में विभिन्न भौतिक उपकरणों का समावेश होता है। इसके लिए उन्होंने मानव एवं उनके आवास के बीच के अंतर्संबंध को दर्शाया है। उनका मानना था कि मनुष्य अपने आवास का निर्माण सांस्कृतिक पारिस्थितिकी के अंतर्गत करता है। उन्होंने विज्ञान एवं पर्यावरण के बीच अंतर संबंधों के विश्लेषण पर विशेष जोर दिया है। उन्होंने कला को भी सांस्कृतिक पारिस्थितिकी के अंतर्गत रखा है। मानव के अंतर्ज्ञान से निर्मित कला किसी समाज की एक अद्भुत और अमूल्य धरोहर होती है, जो उस समाज की विशेष संस्कृति का प्रतीक होती है। नवउद्विकासवादी लेस्ली वाइट (1949-1959) ने भी संस्कृति को विभिन्न स्वरूपों में बताया है।

उन्होंने सांस्कृतिक व्यवस्था के तीन अंग बताए हैं- शिल्प-आर्थिक, सामाजिक एवं सैद्धांतिक। इस प्रकार वाइट के अनुसार संस्कृति मुख्य रूप से एक यंत्रावली है, जिसके द्वारा ऊर्जा का व्यवहार मानव सेवा के लिए विभिन्न कार्यों में होता है। इनके अनुसार संस्कृति प्रतीक पर आधारित वस्तुओं एवं घटनाओं का दैहिकेतर सांसारिक सातत्य है। विशेष एवं प्रत्यक्ष रूप से संस्कृति का निर्माण औजार, बर्तन, वस्त्र, आभूषण, रीति-रिवाज, संस्था, विश्वास, संस्कार, खेल-कूद, कला, भाषा इत्यादि से हुआ है। वाइट ने संस्कृति के निर्माणकारी कारकों की चर्चा की है, लेकिन इन कारकों का मानव के साथ अंतः संबंध एवं मानव के अभिज्ञानता के संबंध में चर्चा नहीं की है। वाइट ने सांस्कृतिक विकास को प्रदर्शित करने वाले सूत्र का निर्माण भी किया है, जिसका संबंध शिल्प विज्ञान एवं ऊर्जा से है। उनका मानना था कि व्यक्ति जितना अधिक कुशल और सक्षम होगा उसकी संस्कृति उतनी ही विकासशील होगी। इस सूत्र के अनुसार • एक व्यक्ति में अपने समाज में उच्च स्थान प्राप्त करने की क्षमता होती है। जैसे-जैसे प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष ऊर्जा अधिग्रहण एवं प्रयोग की क्षमता बढ़ती जाती है या ऊर्जा नियंत्रण के साधन संबंधित क्षमता या अर्थव्यवस्था में या दोनों में वृद्धि होती जाती है, वैसे-वैसे संस्कृति का विकास होता जाता है। यही वाइट का ऊर्जा-शिल्प मॉडल था, जिसमें कला का क्षेत्र अनछुआ रह गया था।