असहभागी प्रेक्षण - Nonparticipant Observation
असहभागी प्रेक्षण - Nonparticipant Observation
असहभागी प्रेक्षण द्वारा भी समाज मनोवैज्ञानिकों ने भिन्न-भिन्न तरह के सामाजिक अंतर क्रियाओं का अध्ययन किया है। असहभागी प्रेक्षण वह विधि है जिसमें प्रेक्षक किसी भी सामाजिक व्यवहार का परीक्षण स्वभाविक परिस्थिति में करता है परंतु परीक्षण किए जाने वाले व्यवहार और क्रियाओं को करने में वह हाथ नहीं बटाता है। इस तरह का परीक्षण संगठित या संरक्षित होता है। फल स्वरुप, प्रेक्षक पहले से इस बात की पूरी योजना कर लेता है कि स्वाभाविक परिस्थिति का स्वरूप कैसा होगा, प्रेक्षकों की उपस्थिति से उत्पन्न होने वाले समस्याओं का समाधान कैसे किया जा सकता है. आंकड़ों में कहां तक सादृश्यमूलता होगी, आदि। इस तरह से हम देखते हैं कि असहभागी प्रेक्षण सहभागी प्रेक्षण से भिन्न है इन दोनों में प्रमुख में विभिन्नता निम्नांकित है -
(i) यद्यपि सहभागी प्रेक्षण तथा असहभागी प्रेक्षण दोनों ही स्वाभाविक परिस्थितियों में ही किए जाते हैं, फिर भी पहले तरह के परीक्षण में प्रेक्षक व्यक्तियों की क्रियाओं के साथ सक्रिय भाग लेता है
जबकि दूसरे तरह के प्रेक्षण में वह ऐसी क्रियाओं के साथ भाग नहीं लेता है। निष्क्रिय रूप से वह इन क्रियाओं का मात्र परीक्षण करता है।
(ii) सहभागी प्रेक्षण में प्रेक्षक का परिचय प्रायः छिपा रहता है परंतु असहभागी प्रेक्षण में प्रेक्षक प्रायः व्यक्तियों के समूह के बीच बैठकर उनके व्यवहारों का प्रेक्षण करता है, अतः उनका परिचय छिपा रहने का प्रश्न ही नहीं उठता है।
(iii) सहभागी प्रेक्षण और संगठित किया और संरक्षित होता है जबकि असहभागी प्रेक्षण संगठित या संरचित होता है।
असहभागी प्रेक्षण के कुछ गुण तथा दोष है। इसके प्रमुख गुण निम्नांकित है
(i) असहभागी प्रेक्षण चुंकि संरचित या संगठित होता है, इसलिए इससे प्राप्त आंकड़े अधिक विश्वसनीय
निरुपक अलीगढ़ तथा निर्भर योग्य होते हैं। संरचित होने से प्रेक्षक पर चढ़ के भिन्न-भिन्न पहलुओं के बारे में अच्छी तरह से सोच विचार करता है और उससे संबंधित सभी प्रक्रियाओं के बारे में पहले से एक निर्णय कर रखता है।
(ii) असहभागी प्रेक्षण में प्रेक्षक सामाजिक व्यवहार के किसी विशेष पहलू पर अधिक ध्यान दे पाता है तथा उससे संबंधित जांच प्रश्नों का समाधान ढूंढने के लिए उसे अधिक से अधिक अवसर भी मिलता है। इसलिए कुछ समाज में वैज्ञानिकों ने इसे सहभागी प्रेक्षण की तुलना में अधिक वैज्ञानिक माना है। असहभागी प्रेक्षण के प्रमुख अवगुण निम्नांकित हैं-
(i) असहभागी प्रेक्षण का सबसे बड़ा दोष जो कुछ समाज मनोवैज्ञानिकों ने बतलाया है, वह यह है कि इस तरह के परीक्षण में व्यक्तियों का व्यवहार जिसका परीक्षण किया जा रहा है, बिल्कुल स्वाभाविक नहीं होता है क्योंकि व्यक्तियों के मन में हमेशा यह बात रहती है कि उनके व्यवहार का प्रेक्षण किया जा रहा है।
(ii) कुछ समाज मनोवैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि जिस तरह सहभागी प्रेक्षण में परिस्थिति बिल्कुल स्वाभाविक होता है, उसी तरह की परिस्थिति असहभागी प्रेक्षण में नहीं हो पाता है। इस परिस्थिति में उपस्थित सभी व्यक्ति इस बात से काफी सचेत रहते हैं कि कोई अजूबा व्यक्ति उनके बीच है जो पता नहीं क्या क्या देख रहा है, सुन रहा है तथा समझ रहा है।
इस तरह से हम देखते हैं कि प्रेक्षण विधि का प्रयोग समाज मनोवैज्ञानिक सामाजिक व्यवहार के अध्ययन में सहभागी या असहभागी रूप में करते हैं। इस विधि की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि प्रेक्षक उचित विधि अपनाकर सामाजिक व्यवहार का अध्ययन करता है या नहीं। सामान्यतः समाज मनोवैज्ञानिक सहभागी प्रेक्षण का उपयोग उसी परिस्थिति में अधिक करते हैं जब वे किसी दूसरे स्रोत से आंकड़ों का संग्रहण नहीं कर सकते हैं।
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