वस्तुनिष्ठ और व्यक्तिनिष्ठ मानक - objective and subjective standards

वस्तुनिष्ठ और व्यक्तिनिष्ठ मानक - objective and subjective standards


किसी भी सामाजिक क्रिया को तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक वस्तुनिष्ठ एवं व्यक्तिनिष्ठ मानकों को ढंग से समझा न जाये। तार्किक क्रिया में वस्तुनिष्ठता और व्यक्तिनिष्ठता में गहन संबंध की बात पैरेटो ही नहीं उनके बाद के समाजशास्त्रियों ने भी की है। रेमण्ड एरों ने पैरेटो की जो व्याख्या रखी है उसमें वे इन दोनों प्रकार के मानको की चर्चा विस्तार से करते हैं। क्रिया कि ये दो अवधारणाएं (तार्किक एवं अतार्किक क्रियाओं को समझने के लिए अनिवार्य है कि इन मानकों को थोडा समझा जाये। जब व्यक्ति किसी क्रिया को करता है तब क्रिया के बारे में उसके मस्तिष्क में कुछ बातें होती हैं। व्यक्ति के मस्तिष्क में मनोभाव होते हैं। वह अचेतन अवस्था में भी अपने मस्तिष्क से कुछ न कुछ गतिविधि करता रहता है।) पैरेटो इसे मस्तिष्क की अवस्था (State of Mind) कहते हैं। जब पैरेटों व्यक्तिनिष्ठ मानकों की बात करते हैं तो इस संदर्भ में विचारकों के इस युग में एक बहुत बड़ा द्वन्द था। कुछ विचारक समाजशास्त्र को मनोविज्ञान से पृथक करना नहीं चाहते थे। बेबर ने जब क्रिया के आदर्श प्रारूप बनाये तब उन्होंने कहा कि क्रिया वह है

जो व्यक्ति स्वयं परिभाषित करता है। यहाँ उन्होंने मनोविज्ञान की भूमिका को रखा। पैरेटो जब व्यक्तिनिष्ठ क्रिया कि बात करते हैं तो स्पष्ट है कि उनके मस्तिष्क में व्यक्ति की क्रिया मानसिक अवस्था का विचार है।


व्यक्ति के सामने वस्तुनिष्ठ स्थिति भी होती हैं। वह वस्तुनिष्ठ से अपनी आँख नहीं मूँद सकता। पिछले दृष्टान्त की बात करें तो कहेंगे कि किसी भी व्यक्ति का करोड़पति बनने का सपना कोई गलत नहीं है। वस्तुनिष्ठता भी इसे स्वीकार करती है। समाज चाहता है कि लोग सम्पन्न रहे। लेकिन जब व्यक्तिनिश्ठ अपना मुँह वस्तुनिष्ठता से फेर लेता है तो समाज की व्यवस्था बिगड़ जाती है। अपराध व अपराधिक गतिविधियाँ किसी को भी समाज द्वारा मान्यता प्राप्त करोड़पति नहीं बनाती। पैरेटो कहते हैं कि तर्क संगत क्रिया तभी होगी जब इसमें व्यक्तिनिष्ठा और वस्तुनिष्ठा का समायोजन होगा।


रेमण्ड एराँ द्वारा दी गयी तालिका जो व्यक्तिनिष्ठा और वस्तुनिष्ठा का समायोजन बताती है, हम यहाँ देंगे


वस्तुनिष्ठा    नहीं    नहीं    हाँ     हाँ


व्यक्तिनिष्ठ   नहीं     हाँ     नहीं     हाँ


अब इस तालिका को थोड़ा समझते हैं। जहाँ और वस्तुनिष्ठा और व्यक्तिनिष्ठा (नहीं) (नहीं) श्रेणी है इसका मतलब है कि क्रिया तार्किक नहीं है। इसका मतलब हुआ कि ये न तो वास्तविकता में साधन लक्ष्यों से जुड़े है और न व्यक्ति के मस्तिष्क में इन साध्यों का समायोजन है। (नहीं) (नहीं) की श्रेणी वास्तव में काम में आती नहीं है। आदमी विवेकपूर्ण है वह सोचता है और इसलिए व्यवहारिक जीवन में (नहीं) (नहीं) की स्थिति नहीं आती।


अब हम दूसरी श्रेणी को लें। इसमें व्यक्ति के कार्यो को वस्तुनिष्ठा (नहीं) कहती है लेकिन व्यक्तिनिष्ठा के आधार पर (हाँ) कहता है। बढ़ते हुए समाज में आज जनसंख्या का एक बड़ा भाग वस्तुनिष्ठा की उपेक्षा करके हर चीज प्राप्त कर लेना चाहता है। वह बड़ा अफसर बनना चाहता है, अव्वल दर्जे का प्रोफेसर होना चाहता है। और इनकी प्राप्ति के लिए जिन साधनों को अपनाता है वस्तुनिष्ठा उन्हें मान्यता नहीं देती है। यह भी तर्कसंगत क्रिया नहीं है।


अब हम तीसरी श्रेणी को देखते हैं। यहाँ वस्तुनिष्ठा तो साध्य प्राप्त करने की स्वीकृति देती है लेकिन व्यक्ति इसकी सुविधा नहीं अपनाता या अपनाने में सक्षम नहीं है उदाहरण के तौर पर आदिवासियों को विकास योजना के अंतर्गत कोई विकास सुविधाएँ दी गयी हैं। यह वस्तुनिष्ठ है। लेकिन आदिवासी इसका साथ नहीं ले पाता।


तालिका की चौथी श्रेणी वह है जिसमें वस्तुनिष्ठ और व्यक्तिनिष्ठ दोनों में (हाँ-हाँ ( है। यानी यहाँ इन दोनों में समायोजन है। यह क्रिया तर्कसंगत क्रिया है।