प्रेक्षण विधि - Observation Method

प्रेक्षण विधि - Observation Method


समाज मनोविज्ञान में प्रेक्षण विधि द्वारा भी सामाजिक व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। समाज मनोवैज्ञानिक जब अध्ययन किए जाने वाले चर में जोड़ तोड़ नहीं कर पाते, तो वे इस विधि का सहारा लेते हैं। एक समाज मनोवैज्ञानिक दुश्चिंता के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए प्रयोज्यो को एक ऐसी परिस्थिति में रखें जहां यह कहा जाए कि उनके पिता या मृत्यु हो गई है तो यह प्रयोगात्मक नैतिकता के विरुद्ध होगा। इसी तरह के अनेक ऐसे चर है जिन्हें छोड़ कर के उनके प्रभाव का अध्ययन नहीं किया जा सकता है। फलस्वरूप ऐसी परिस्थिति में दैनिक प्रेक्षण विधि का सहारा अक्सर लेते हैं। प्रेक्षण विधि में प्रेक्षक व्यक्तियों के व्यवहार ओं का प्रेक्षण प्रायः एक स्वाभाविक परिस्थिति में करता है। प्रश्न यह उठता है कि प्रेक्षण किसे कहते हैं ? "प्रेक्षण वह प्रक्रिया है जिसमें प्रेक्षक व्यक्तियों के व्यवहार ओ को एक खास समय तक कभी हल्का हस्तक्षेप करते हुए तथा कभी बिना किसी तरह के हस्तक्षेप किए ही देखता तथा सुनता है, उनका एक रिकॉर्ड तैयार करता है जिनकी बाद में विश्लेषणात्मक व्याख्या की जाती है।"


समाज मनोवैज्ञानिकों ने प्रेक्षण के कई प्रकार जैसे क्रमबद्ध प्रेक्षण तथा अक्रमबद्ध परीक्षण तथा असहभागी प्रेक्षण बतलाया है।


बिकमैन (1976) के अनुसार प्रेक्षण तीन पहलू निम्नांकित है -


(i) छिपाव की मात्रा ( Degree of concealment) किसी भी समाज मनोवैज्ञानिक को प्रेक्षण विधि द्वारा सामाजिक व्यवहार के अध्ययन करने में इस बात का निर्णय करना होता है कि प्रेक्षक का परिचय तथा अन्य व्यक्तियों से जिन का परीक्षण किया जाने वाला है. गुप्त रखा जाए या बता दिया जाए। 


(ii) प्रेक्षक की भूमिका ( Role of observor )- समाज मनोवैज्ञानिक को या शोधकर्ता को यह भी निर्णय करना होता है कि प्रेक्षक को अन्य व्यक्तियों जिनका परीक्षण किया जाने वाला है. अंतः क्रियाओं के साथ हस्तक्षेप करना चाहिए या नहीं।


(iii) प्रेक्षण प्रक्रिया में संगठन की मात्रा (Degree of structure in observational processes) - शोधकर्ता को यह भी निर्णय लेना पड़ता है कि प्रेक्षण का स्वरूप संगठित होगा या असंगठित होगा। असंगठित प्रेक्षण में प्रेक्षक के लिए अन्य व्यक्तियों जिनका परीक्षण किया जाने वाला है, के साथ हुए अनुभव द्वारा प्राप्त विचार ही काफी होते हैं। परंतु संगठित परीक्षण में व्यक्तियों के व्यवहार ओं की सार्थकता की जांच प्रेक्षक अन्य ढंग से भी करता है। रिस (1971) ने प्रेक्षण को वैज्ञानिक सूचनाएं उत्पन्न करने की क्षमता के आधार पर दो भागों में बांटा है अक्रमबद्ध प्रेक्षण तथा क्रमबद्ध प्रेक्षण


अक्रमबद्ध प्रेक्षण में प्रेक्षक व्यक्तियों के व्यवहारो का अध्ययन मात्र अपने दिन-प्रतिदिन के अनुभव के आधार पर कर लेता है। प्रेक्षण करने में वह ना तो कोई स्पष्ट नियम को ही अपनाता है और न ही किसी वैज्ञानिक तार्किक क्रम पर अपने प्रेक्षण को आधारित करता है। जैसे- शोधकर्ता बस में बैठे व्यक्तियों के भीड़ व्यवहार का अचानक प्रेक्षण करना शुरू कर देता है तो यह अक्रमबद्ध प्रेक्षण का एक उदाहरण होगा। इस तरह के परीक्षण का उपयोग समाज मनोविज्ञान में बहुत कम किया जाता है। प्रेक्षक द्वारा किए गए भूमिका के अनुसार समाज मनोवैज्ञानिकों ने प्रेक्षण विधि को दो भागों में बांटा है- सहभागी प्रेक्षण तथा असहभागी प्रेक्षण। समाज मनोविज्ञान इको द्वारा इन दोनों तरह की प्रेक्षण विधियों पर काफी बढ़ डाला गया है तथा सामाजिक व्यवहार के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन इन दोनों विधियों द्वारा खुलकर किया गया है। इन दोनों विधियों का वर्णन इस प्रकार है-

1. सहभागी प्रेक्षण
2. असहभागी प्रेक्षण