वर्ण व्यवस्था के आधार - on the basis of alphabet
वर्ण व्यवस्था के आधार - on the basis of alphabet
वर्ण व्यवस्था के आधार के संबंध में मूल प्रश्न यह है कि यह जन्म पर आधारित थी अथवा गु व कर्म पर या फिर रंग या व्यवसाय पर। वर्ण व्यवस्था के आधार में संदर्भ में विभिन्न विद्वानों के मत निम्न है-
(1) मनोवैज्ञानिक :- वर्ण व्यवस्था का आधार मानव समाज में पाई जाने वाली चार प्रकार की मनोवृत्तियां है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र यह चार समाज अथवा वर्ग की प्रवृत्तियां नहीं बल्कि मानव की चार प्रवृत्तियां है। आत्मा के जीवन मात्र में जाने वाली चार दिशाएं हैं। आर्य संस्कृति के समाजशास्त्रियों ने सांख्य के मनोविज्ञान की तीन तत्वों सिद्धांत को लेकर समाज का विभाजन सात्विक, राजसिक, राजसिक - तामसिक और तामसिक इन चार वर्णों में किया था। इन्हीं चार प्रवृतियों को आधार मानकर समाज का ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र में विभाजन किया गया था। मानव समाज की प्रवृत्तियों का उसकी स्वाभाविक दिशायों का यह वर्गीकरण निम्न है
(अ) सात्विक प्रवृत्तिः सात्विक प्रवृत्ति वाला व्यक्ति जिसकी जीवन के प्रति आध्यात्मिक आस्था है, ब्राह्मण है।
(आ) सतोगुण और रजोगुण:- का सम्मिश्र क्षत्रिय प्रवृत्ति है। इसमें सतोगुण के साथ रजोगुण की भी प्रधानता है।
(इ) रजोगुण और तमोगुण:- मिलकर वैश्य प्रवृत्ति बनते हैं इसमें रजोगुण की अपेक्षा तमोगुण प्रधान है।
(ई) तामसिक प्रवृत्तियों:- तामसिक प्रवृति को शूद्र प्रवृत्ति कहा गया है।
(2) डॉ. के एम पणिक्कर के अनुसार वर्ण सदस्यता का आधार कर्म था न की जन्म वर्ण व्यवस्था का संबंध जन्म अथवा रक्त से नहीं है। इसका आधार मनुष्य का कार्य था। इसके अलावा वर्ण व्यवस्था प्रगतिशील है
जबकि जाति व्यवस्था नहीं। वर्ण व्यवस्था के अनुसार यदि कोई व्यक्ति अपने कर्तव्यों का संपादन नहीं करता था तो उसका वर्ण परिवर्तित हो जाता था। इस प्रकार वर्ण व्यवस्था कर्म सिद्धांत के अधिक निकट है। प्राचीन ग्रंथों से यह प्रमाणित होता है कि ब्राम्हण धर्म कार्यों के संपादन और अध्ययन के अतिरिक्त औषधि शास्त्र, शस्त्र निर्माण और प्रशासन संबंधी कार्यों में भी लगे हुए थे। वैदिक साहित्य में कहीं भी ऐसा उल्लेख नहीं मिलता जिससे यह कहा जा सके कि लोगों को जन्म के आधार पर व्यवसाय अनिवार्य था।
(3) डॉ. मोटवानी:- आधुनिक युग में भारतीय सामाजिक संगठन के मुख्य व्याख्याकर्ता डॉक्टर मोटवानी ने वर्ण व्यवस्था को समाजशास्त्रीय की परिभाषा में समूहों का समाजशास्त्र के रूप में परिभाषित किया है। इन के अनुसार" वैदिक ऋषि यों ने यह अनुभव कर लिया था कि सामान को बारंबार स्वयं आध्यात्मिक विप्लव से बचने का सबसे अच्छा और निश्चित तरीका यह था कि समाज की सभी सदस्यों को बिल्कुल स्पष्ट कार्य और सुविधाओं अथवा पुरस्कार के आधार पर अलग-अलग समूहों में विभाजित कर दिया जाए। इस विभाजन में निम्न चार वर्ण थे
(1) पहला वर्ण ब्राह्मण समूहों का था यह गुरू व अध्यापक हुआ करते थे और इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से हुई थी।
(2) दूसरा समूह क्षत्रियों का था। एक क्रियाशील व्यक्ति थे यह प्रजाति के रक्षक थे योद्धा व कानून निर्माता थे।
(3) तीसरा प्रमुख वैश्य का होता था। यह व्यवसायी हुआ करते थे और समाज में आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे।
(4) चौथा व अंतिम समुह शुद्रों का था। समाज में अन्य वर्णों की सेवा करना इनका मुख्य कार्य था।
(4) महात्मा गांधी के अनुसार वर्ण का अर्थ रंग व व्यवसाय दोनों से ही लिया गया है। वे वर्ण को वंशानुक्रम का नियम मानते हैं। उनका मत है कि एक व्यक्ति को अपने पिता से रंग एवं व्यवसाय दोनों ही वंशानुक्रम में प्राप्त होता है। अतः वर्ण का आधार जन्म है।
(5) बसंत कुमार चट्टोपाध्याय के अनुसार:- वर्ण का आधार जन्म है। यदि कर्म जीवन का आधार होता तो द्रोणाचार्य ब्राह्मण ना होकर क्षत्रिय होते क्योंकि वह कर्म से क्षत्रिय थे वह जन्म से ब्राह्मण थे।
(6) सत्यमित दुबे के अनुसार:- चारों वर्णों के निर्माण की पृष्ठभूमि तत्कालीन समाज की आवश्यकता थी।
(अ) पठन पाठन धार्मिक तथा बौद्धिक पूर्ति
(आ) सामाजिक व्यवसाय का संचालन एवं उसकी रक्षा
(इ) आर्थिक क्रियाओं की पूर्ति
(ई) अन्य वर्णों की सेवा
आधुनिक युग में समाजशास्त्र के सामने मौलिक प्रश्न यह है कि समाज के विभिन्न धरातल किस प्रकार बन जाते हैं। समाज में किस प्रकार उच्च और निम्न श्रेणियों का निर्माण होता है
इसकी व्याख्या परेटो ने अपने उदविकास और अवशेषों में, बेबर ने धर्म और अर्थव्यवस्था में, डेविस ने मानव समाज तथा पारसन्स ने "सामाजिक क्रिया की संरचना" आदि सिद्धांतों में व्यक्त किया है।
यहां हमें यह बात भली-भांति समझ लेनी चाहिए कि वर्ण व्यवस्था कोई वर्ण व्यवस्था नहीं है पूर्णता मानव रचित व्यवस्था है। विभिन्न तत्वों के आधार पर यह कहना उचित होगा कि यह व्यवस्था ना तो पूर्ण तथा गुण व कर्म पर आधारित थी और ना ही पूर्ण तथा जन्म पर प्रारंभ में इस व्यवस्था का आधार पुण्य कर्म था लेकिन धीरे-धीरे जन्म का महत्व बढ़ने लगा तथा समय के साथ-साथ अनुवांशिक होते गए।
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