भूस्वामित्व एवं सामाजिक संस्तरण के आधार पर - On the basis of landownership and social stratification
भूस्वामित्व एवं सामाजिक संस्तरण के आधार पर - On the basis of landownership and social stratification
(क) सामूहिक स्वामित्व वाले गांव- इस प्रकार के गांव में कृषकों का गांव की भूमि पर सामूहिक स्वामित्व होता है और उत्पादन को गांव के सभी परिवारों में बांटा जाता है।
(ख) सामूहिक किराएदारी ग्राम ऐसे ग्रामों में ग्रामवासी मिलकर गांव की समस्त भूमि को किराए पर लेकर कृषि करते हैं।
(ग) व्यक्तिगत स्वामित्व वाले गांव- ग्रामों में कृषि योग्य भूमि पर व्यक्तिगत स्वामित्व होता है। इसमें भू स्वामी, श्रमिक और जोता (किराए पर भूमि जोतने वाले) रहते हैं।
(घ) व्यक्तिगत किराएदारी ग्राम ऐसे ग्रामों में कृषि योग्य भूमि पर सामूहिक के स्थान पर व्यक्तिगत रूप से किराए पर लेकर कृषि की जाती है।
(च) बड़े भूस्वामी, कर्मचारी वाले गांव ऐसे ग्रामों में कृषि मजदूर किसी बड़े भूस्वामी के यहां मजदूरी करते हैं और स्थाई निवास बनाकर रहते हैं।
(छ) राज्य, नगर पालिका, धर्म संगठन एवं अन्य सार्वजनिक संस्थाओं के स्वामित्व की भूमि पर अन्न उत्पादन के लिए लगाए गए मजदूरों और कर्मचारियों का गांव।
(6) श्रीमती इरावती कर्वे ने निवास व्यवस्था के आधार पर गांव का वर्गीकरण किया है। गांव में बसे निवास स्थानों का स्वरूप क्या है? लोग किस प्रणाली से एक ग्राम में अपने निवास बनाते हैं तथा विभिन्न स्थानों के बीच परस्पर किस प्रकार के संबंधों हो? इन आधारों पर तीन प्रकार के गांव पाए जाते हैं -
(क) समूह या केंद्रित ग्राम (Grouped or Nucleated Village) इस प्रकार के गांव का निवास प्रतिमान एक स्थान पर केन्द्रित होता है। कम जनसंख्या होने से लोग एक स्थान पर घरों का झुंड बनाकर आते हैं और उनके खेत गांव के चारों ओर फैले होते हैं।
(ख) पंक्तिनुमा ग्राम (String Village) इस प्रकार के गांव किसी सड़क अथवा रास्ते के दोनों और एक लंबी कतार में बने होते हैं। भारत में कोनकन तट तथा समुद्री किनारे पर इसी प्रकार के गाँव पाए जाते हैं।
(ग) हैमलेट गांव या गुच्छेदार ग्राम (Cluster Village) इस प्रकार के गांव में विभिन्न रक्त संबंधी परिवार अपने खेतों के किनारे घर बनाकर रहते हैं। प्रत्येक हैमलेट कुछ परिवारों का समूह होता है और एक ग्राम में ऐसे कई समूह दिखने को मिलते हैं। निवासियों के घरों के बीच बहुत अंतर होता है तथा उनमें समाजिक घनिष्ठता की कमी भी पाई जाती हैं। इस प्रकार के गांव सतपुड़ा की पहाड़ियों में पाए जाते हैं।
(7) गिलीन और गिलीन का वर्गीकरण (Classification of Gillin and Gillin) गिलीन और गिलीन ने व्यवसायिक आधार पर ग्रामों को चार भागों में बांटा है
(क) कृषि व्यवसाय करने वाले गांव
(ख) कृषि नहीं करने वाले गांव
(ग) औद्योगिक ग्राम
(घ) उपनगरीय ग्राम
8. बेडन पावेल का वर्गीकरण (Classification of Baden Powell) बेडन पावेल ने भूमि व्यवस्था के आधार पर गांव को दो भागों में विभक्त किया है।
(क) रैयतवाड़ी ग्राम (Severalty Village)- इस प्रकार के गांव में एक ग्राम मुखिया होता है जो गांव की व्यवस्था और संचालन का कार्य करता है। यह वंशानुगत होता है और उसे विभिन्न सुविधाएं प्राप्त होती हैं। इस प्रकार के गांव बंगाल, बिहार, केंद्रीय भारत, पश्चिमी एवं दक्षिण भारत में पाए जाते हैं।
(ख) संयुक्त ग्राम (Joint Village) इस प्रकार के गांव में कोई मुखिया नहीं होता है वरन कृषि व्यवस्था सहयोगी एवं सामूहिक होती है। गांव की सारी भूमि पर सभी गांव वालों का सामूहिक स्वामित्व होता है। उत्पादन, विनिमय और वितरण भी सामूहिक होता है।
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