आश्रम व्यवस्था की उत्पत्ति - Origin of Ashram system

आश्रम व्यवस्था की उत्पत्ति - Origin of Ashram system


आश्रम व्यवस्था की उत्पत्ति के संबंध में निश्चित रूप से कुछ भी कहना संभव नहीं है। डॉ. अल्तेकर छांदोग्य उपनिषद 2/23,1 में स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि आश्रम व्यवस्था वैदिक काल की संस्कृति प्रतिभा का ही एक अंग थी। यद्यपि वैदिक साहित्य में आश्रम शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है। तथापि इतना आवश्यक ज्ञात होता है कि उस समय का इस योजना पर विचार आरंभ हो चुका था जीवन को विभिन्न अवसरों में बांटने का प्रयास शुरू हो गया था हलाकि अर्थवेद में मुनि शब्द का प्रयोग हुआ है। इन सभी तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि आश्रम व्यवस्था वैदिक नहीं उत्तर वैदिक कालीन व्यवस्था है।


आश्रम व्यवस्था के आरंभिक अवसर पर केवल 3 नामों का उल्लेख मिलता है। वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रम एक-दूसरे से मिले हुए थे जिन्हें कालांतर में पृथक किया गया है। डॉ. मोदी एवं ऑल इंडिया ओरिएंटल कॉन्फ्रेंस की विभिन्न निबंधों में दिए गए उदाहरणों से ज्ञात होता है कि छांदोग्य उपनिषद में जीवन के तीन क्रमों गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा ब्रह्मचर्य का वर्णन मिलता है इनमें ब्रह्मचर्याश्रम को जीवन का अंतिम अवसर माना गया है

मनुस्मृति (मनुस्मृति,2/230) में भी आश्रम केवल तीन आश्रम मिलते हैं। यह सब प्रमाण प्राप्त करते हैं कि मनुस्मृति के समय तक आश्रम व्यवस्था एक सुसंगठित रूप में विकसित नहीं हो सकी थी परंतु मनुस्मृति काल के पश्चात 3 आश्रमों की संरचना अधिक व्यवहारिक और उपयोगी प्रतीत ना होने के कारण आश्रमों की संख्या 4 हो गई और इनमें भी ब्रह्मचर्य आश्रम को प्रथम माना गया। परंतु चारों आश्रमों का व्यवस्थित रूप सर्वप्रथम जाबिल उपनिषद (जाबिल को उपनिषद, पेज 587-88) में मिलता है। लेकिन यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि इसकी रचना कब हुई है। परंतु इतना अवश्य है कि आश्रम व्यवस्था का निर्माण उत्तर वैदिक काल में हो गया था यद्यपि एक सुसंगठित रूप में इसकी व्याख्या सर्वप्रथम स्मृति काल में हुई थी।