जाति व्यवस्था की उत्पत्ति के सिद्धांत - Origin of caste system
जाति व्यवस्था की उत्पत्ति के सिद्धांत - Origin of caste system
समान्यतः भारतीय संदर्भ में जाति व्यवस्था को वर्ण व्यवस्था के चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के आधार पर स्पष्ट करने का प्रयास किया जाता है, परंतु व्यावहारिक तौर पर भारतीय सामाजिक संरचना के निर्माण में अनेक जातियां और उप-जातियां शामिल हैं, जो जन्म आधारित समूह व सामाजिक प्रतिष्ठा के निर्धारण से संबंधित रही हैं। अनेक विद्वानों द्वारा जाति की उत्पत्ति के संबंध में विचार प्रस्तुत किए गए हैं। कुछ विद्वान इसे धार्मिक-पारंपरिक व्यवस्था के रूप में व्याख्यायित करते हैं, तो कुछ इसकी व्याख्या प्रजातीय आधारों पर करते हैं। विद्वानों ने व्यवसाय, वर्ग-विभिन्नता, जनजातीय व धार्मिक विश्वासों, विशुद्धता की अवधारणा, प्रजातीय विभिन्नता आदि के हवाले से जाति व्यवस्था की उत्पत्ति को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। कुछ विचार/सिद्धांत अधोलिखित हैं-
परंपरागत सिद्धांत -
यह सिद्धांत जाति व्यवस्था की उत्पत्ति को वेद शास्त्र, उपनिषद, स्मृतियों आदि के आधार पर व्याख्यायित करते हैं। इस सिद्धांत का प्रमुख आधार है ईश्वर ने इसे बनाया है।
ऋग्वेद में लिखित पुरुषसूक्त के अनुसार जाति की उत्पत्ति ब्रह्मा के विभिन्न अंगों से हुई है। ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, उदर से वैश्य और पैर से शूद्र का जन्म हुआ है। इसी आधार पर सभी जातियों का व्यवसाय निर्धारण हुआ। ब्राह्मणों को शिक्षण क्षत्रियों को सैन्य कार्य, वैश्यों को व्यवसाय तथा शूद्रों को अन्य तीनों वर्णों की सेवा संबंधी कार्य निर्धारित किए गए। जातियों की उत्पत्ति के लिए मनु ने प्रतिलोम विवाह और वर्णसंकरता को उत्तरदायी माना है। महाभारत और गीता में भी जाति व्यवस्था की उत्पत्ति के लिए वर्णसंकरता को ही जिम्मेदार माना गया है।
इस प्रकार से जाति व्यवस्था को सामाजिक कार्यों के प्राकृतिक रूप से निर्मित संगठन की संज्ञा प्रदान की जा सकती है जो जाति विशेष में व्यक्ति की सदस्यता को धर्म व कर्म संबंधी सिद्धांतों के आधार पर समझी जा सकती है।
धार्मिक सिद्धांत -
होकार्ट और सेनार्ट के अनुसार जाति व्यवस्था की उत्पत्ति धार्मिक आधारों से हुई है।
होकार्ट का मानना है कि जाति व्यवस्था की उत्पत्ति अनेक धार्मिक क्रियाओं और कर्मकांडों से हुई है। संख्या में अधिक ये क्रियाएं पवित्रता के आधार पर अनेक स्तरों में विभाजित थीं, जो उच्च व निम्न के रूप में स्तरण के लिए जिम्मेदार थे। विभिन्न सामाजिक क्रियाओं व कार्यकुशलता को बनाए रखने के लिए कुछ विशिष्ट व्यक्तियों की आवश्यकता हुई तथा इन्हीं व्यक्तियों के रूप में वर्ण व्यवस्था का जन्म भारत में हुआ। इस प्रकार से समाज में सामाजिक प्रस्थिति का निर्धारण उन विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा किए जाने वाले धार्मिक कार्यों की पवित्रता सुनिश्चित करने लगी। कालांतर में इस व्यवस्था ने ही आनुवांशिक रूप धारण कर लिया। भारत में धर्म और देवताओं का काफी महत्व है। देवताओं को चढ़ाए जाने वाले भेंट, जैसे मंत्र (ब्राह्मण), फूल (माली), जल (कुम्हार), शुद्ध वस्त्र (धोबी), बलि (कसाई/शूद्र) आदि कार्यों को करने वाले समूह ही बाद में जातियों के रूप में परिवर्तित हो गए। वर्तमान समय में भी कुम्हार, धोबी, नाई, ब्राह्मण आदि जातियां न केवल आर्थिक रूप से अपनी सेवाएं देते हैं बल्कि धार्मिक व संस्कारिक अवसरों की दृष्टि से भी इनकी सेवाएं अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं।
सेनार्ट का मत है कि भारत में जाति व्यवस्था का जन्म पारिवारिक पूजा तथा कुल देवता को अर्पित किए जाने वाले भोजन में भिन्नता व विभिन्न निषेध के कारण हुआ है। इस आधार पर सेनार्ट ने जाति व्यवस्था के तहत पाए जाने वाले विवाह, सामाजिक सहवास और भोजन के निषेधों का विश्लेषण किया। भारतीय समाज में अनेक देवी-देवताओं की संकल्पना पायी जाती है। एक समूह की आस्था किसी देवी-देवता के लिए रहती है तो दूसरे समूह की आस्था दूसरे देवी-देवता के प्रति । विभिन्न देवी-देवताओं के प्रति आस्था व पूजा आदि के आधार पर विभिन्न समूहों में विभाजन था तथा यही विभाजन कालांतर में जाति समूहों के रूप में पर्णित हो गया।
राजनीतिक सिद्धांत -
अब्बे डुबॉय का मानना है कि जाति प्रथा 'ब्राह्मणों की चतुर-युक्ति का परिणाम है। ब्राह्मण अपने वर्चस्व और सत्ता को सदैव के लिए कायम रखना चाहते थे तथा इसके लिए उन्होंने धर्म का सहारा लिया। इस प्रकार से उन्होंने जाति व्यवस्था का निर्माण किया तथा इस योजना के आधार पर ब्राह्मणों ने अपनी शक्ति, सत्ता तथा वर्चस्व को सुरक्षित कर लिया। ऐसा इसलिए भी था, क्योंकि व्याख्या व पठन पाठन का अधिकार उनके पास ही था तथा इसी कारण वे अपनी इस योजना में सफल भी हो पाए।
डेंजिल इबेट्सन और गोविंद सदाशिव घुरिए ने भी अब्बे डुबॉय द्वारा प्रस्तुत किए गए विचार को आंशिक रूप से स्वीकार किया है। घुरिए लिखते हैं कि जाति व्यवस्था इंडो-आर्यन संस्कृति के ब्राह्मणों का शिशु है जो कि गंगा और यमुना के मैदान में पैदा और पला-बढ़ा है तथा यहीं से देश के अन्य भागों में ले जाया गया है।'
उद्विकासीय सिद्धांत -
डेंजिल इबेट्सन के अनुसार विभिन्न धार्मिक संघों से जाति व्यवस्था का जन्म हुआ है तथा इसी कारण इस सिद्धांत को श्रेणी/संघ सिद्धांत भी कहा जाता है। आर्थिक वर्ग से आर्थिक संघ विकसित हुआ और आर्थिक संघों से ही जाति व्यवस्था का विकास हुआ है।
आरंभ में रक्त संबंधों की प्रधानता के कारण समूहों में उच्च निम्न की भावना पायी जाती थी। परंतु धीरे-धीरे जनसंख्या, खतरों व आवश्यकताओं के बढ़ने से राज्य की उत्पत्ति हुई तथा राज्य की उत्पत्ति ने राजा के कर्तव्यों के रूप में व्यावसायिक भिन्नता तथा श्रम विभाजन को जन्म दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि व्यवसाय समूह के लोग अपने हितों का संरक्षण करना आरंभ कर दिए तथा दूसरे समूहों से पृथक रहते हुए अपने संघ को सुदृढ़ स्वरूप प्रदान करने की ओर उन्मुख होने लगे। इस प्रकार से सामाजिक सहवास, विवाह तथा खान-पान संबंधित निषेधों का जन्म हुआ। इस संक्रमण की प्रक्रिया के दौरान पुरोहिती का कार्य करने वाला संघ अन्य संघों की अपेक्षाकृत अधिक संगठित रहा तथा इस संघ ने अपने नियमों व कार्यों का पालन अधिक दृढ़ता से किया। फलस्वरूप इस संघ की सामाजिक स्थिति समस्त संघों में सर्वश्रेष्ठ हो गयी। इसके पश्चात ये समूह अंतर्विवाही संघों में परिवर्तित होने लगे तथा यह व्यवस्था संस्तरण के रूप में स्थापित होकर पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होने लगी। कालांतर में इन्हीं व्यावसायिक संघों को जाति व्यवस्था के नाम से जाना जाने लगा।
व्यवसायिक सिद्धांत
नेसफील्ड का मानना है कि जाति व्यवस्था कि उत्पत्ति का एक मात्र कारण व्यवसाय है। जाति व्यवस्था की उत्पत्ति प्रजाति अथवा धार्मिक आधारों पर नहीं है अपितु मात्र व्यवसाय के आधार पर ही जाति व्यवस्था की उत्पत्ति को माना जा सकता है।
इनके अनुसार जातियां वास्तव में एक व्यावसायिक समूह हैं। व्यवसाय की तकनीकी कुशलता एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित कर दी जाती है। इससे एक जाति से संबंधित लोग उस व्यवसाय को लंबे समय तक करते रहते हैं। इस प्रकार से 'व्यावसायिक संघों' का अस्तित्व निर्धारित होता है तथा यही बाद में जाति व्यवस्था के रूप में जाना जाने लगा।
धर्म के आधार पर जाति की उत्पत्ति न होकर श्रम विभाजन के कारण विभिन्न व्यवसायों में बंटकर जातीय समूहों का जन्म हुआ है। सामाजिक समूहों के आधार पर व्यवसाय पूर्व से ही स्तरीकृत थे और यही स्तरीकरण जातीय समूहों में भी पाया जाता है। उनका मत है कि व्यवसायों से जुड़ी श्रेष्ठता तथा हीनता की भावना ने ही जाति व्यवस्था में संस्तरण को जन्म दिया है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि उन समाजों में यज्ञ तथा बालि आदि का बड़ा महत्व था। अतः ब्राह्मणों का स्थान समाज में सम्माननीय तथा सर्वोच्च बन गया। इसी प्रकार से अन्य जातियां भी बनीं तथा उनका स्थान निर्धारित हुआ। नेसफील्ड ने जाति व्यवस्था की उत्पत्ति में मूल रूप से दो कारण प्रस्तुत किए हैं -
1. व्यवसाय
2. जनजाति का संगठन
प्रजातीय सिद्धांत
हर्बर्ट रिजले द्वारा लिखित पुस्तक 'People of India' में जाति व्यवस्था की उत्पत्ति के प्रजातीय सिद्धांत का विवरण मिलता है। इनका मत है कि इंडो-आर्यन प्रजाति के लोगों का फारस (पर्शिया) से भारत आगमन हुआ। भारत आने के पश्चात वे अश्वेत लोगों से मिले और अपनी सैन्य शक्तियों के बल पर उन्होंने स्थानीय निवासियों पर विजय प्राप्त की तथा विजय के पश्चात वे यहीं निवास करने लगे। चूंकि वे लोग युद्ध के प्रयोजन से आए थे, अतः अपने साथ स्त्रियां नहीं लाए थे। अतः जनसंख्या वृद्धि व शारीरिक आवश्यकताओं की शांति के लिए यहां के मूल निवासियों के साथ विवाह संबंध स्थापित किया। इस प्रकार से प्रतिलोम विवाह प्रचलन में आया। आर्यों ने आदिवासियों की लड़कियों से विवाह तो किया परंतु अपनी लड़किया उन्हें नहीं दी। अनुलोम विवाह के पश्चात उत्पन्न संतान को 'चांडाल' कहा गया।
प्रजातीय श्रेष्ठता को बनाए रखने की दृष्टि से प्रतिलोम विवाह को प्रतिबंधित किया गया था। स्त्रियों की आवश्यकता पूर्ण होने के पश्चात अनुलोम विवाह को भी प्रतिबंधित कर दिया गया। इस प्रकार से अनुलोम विवाह और प्रजातीय श्रेष्ठता की भावना के कारण ही जाति व्यवस्था का जन्म हुआ।
रिजले ने जाति व्यवस्था की उत्पत्ति व विकास में से संबंधित कुल 6 प्रक्रियाओं के बारे में वर्णन प्रस्तुत किया है
1. पारंपरिक व्यवसाय को बदलकर कोई भी जाति अथवा उपजाति एक स्पष्ट जाति के रूप में परणित हो जाती है।
2. प्रवास के आधार पर जाति का एक लघु अंश किसी दूसरे क्षेत्र में निवास हेतु गमन कर जाता है तथा यातायात व संचार साधनों की अनुपलब्धता के कारण अपने पैतृक क्षेत्र व लोगों से संपर्क रख पाना कठिन होता था। अंततः वे अपने मूल क्षेत्र व समूह से पूर्णतः पृथक हो जाते थे तथा इस प्रकार से भी नवीन जाति का विकास हुआ।
3. कभी-कभी रीति-रिवाजों तथा प्रथाओं आदि के बदल जाने के कारण भी नवीन जाति का निर्माण हो जाता था।
4. कुछ जातियां पुरानी परंपराओं को संरक्षित व सुरक्षित रखती थीं तथा कालांतर में ये परम्पराएं ही उनकी जाति की पहचान का प्रतिनिधित्व करती थी। इस प्रकार से भी नई जाति का निर्माण हुआ।
5. कभी-कभी संपूर्ण जाति हिंदुत्व में शामिल हो जाती थी तथा अपना एक नया नाम रख लेती थी। इस प्रकार से वह स्वयं को हिंदुओं में विलीन कर लेती थी तथा अन्य जातियों से स्वयं के अस्तित्व को पृथक कर लेती थी। इस प्रकार की जातियों में मध्य प्रदेश के गोंड तथा बंगाल के राजवंशी आदि आते हैं।
6. धार्मिक उत्साही लोग भी कभी-कभी उपदेश देते थे, अपना एक अलग ही समूह विकसित कर लेते हैं तथा अंत में ये स्वयं को एक अन्य जाति के रूप में व्याख्यायित करने लगते हैं, जैसे कबीरपंथी।
रिजले के अलावा इस सिद्धांत को घुरिए और मजूमदार द्वारा भी समर्थन दिया गया है। घुरिए का मानना है कि जाति व्यवस्था की उत्पत्ति के लिए प्रजातीय भेदभाव तथा प्रजातीय लक्षण उत्तरदायी हैं। आर्यों तथा द्रविड़ों की प्रजातीय भिन्नता के कारण जाति व्यवस्था का जन्म हुआ है। इनका मानना है कि भारत में आर्यों का आगमन 2500 वर्ष ईसा पूर्व हुआ तथा मूल निवासियों को पराजित कर आर्यों ने उन्हें 'दास' अथवा दस्यु' की संज्ञा दी। दास शब्द का अभिप्राय ईरानी भाषा में 'दुश्मन' से होता है।
जब इंडो-आर्यन प्रजाति का आगमन भारत में हुआ तो पूर्व से ही उसमें तीन श्रेणियां विभाजित थीं। भारत में विजय के पश्चात आर्यों ने सर्वप्रथम यहां के मूल निवासियों से निर्मित 'दासों' अथवा 'शूद्रों' से विवाह संबंध स्थापित करने को प्रतिबंधित किया तथा साथ ही शूद्रों के लिए आर्यों की धार्मिक पूजा को निषिद्ध किया। घुरिए का मत है कि आर्यों द्वारा किए गए वे सभी प्रयास ही जाति व्यवस्था के लक्षण व प्रतिबंध हैं जो यहां के मूल निवासियों पर उनके द्वारा थोपे गए थे।
मजूमदार ने भी जाति व्यवस्था की उत्पत्ति को प्रजातीय आधारों से ही जोड़ा है। घुरिए की बातों से सहमती रखते हुए मानते हैं कि जातिगत संस्तरण, विभाजन तथा उपजातियों का निर्माण आदि आर्यों व द्रविड़ों के जातीयसंघर्ष तथा जीत-हार का परिणाम है। द्रविड़ों को हराने के पश्चात आर्य रक्त शुद्धता के आधार पर क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य के रूप में तीन वर्गों में विभाजित हो गए। द्रविड़ों को सबसे निम्नतम स्थान 'दास' के रूप में प्रदान किया गया। मजूमदार के अनुसार इन प्रजातियों के मिश्रण के कारण निम्न थे-
1. इन आक्रमणकारी इंडो-आर्यन समूहों में स्त्रियों की कमी थी।
2. तत्कालीन समय में द्रविड़ संस्कृति में मातृसत्तात्मक व्यवस्था विद्यमान थी।
3. वे भारतीय मूल निवासियों के स्थायी जीवन के प्रति आकर्षित थे।
4. इंडो-आर्यन समूहों तथा यहां के मूल निवासियों में पर्याप्त संस्कारिक विभिन्नता थी।
5. देवियों के प्रति आस्था, पूजा आदि
6. पुरोहित व्यवस्था
7. शैक्षिक व्यवस्था
आदिम संस्कृति अथवा 'माना' का सिद्धांत -
हट्टन द्वारा जाति व्यवस्था की उत्पत्ति संबंधित तीन पक्षों को प्रस्तुत किया गया है तथा ये पक्ष
1931 की जनगणना पर आधारित जातीय तथ्यों द्वारा निर्धारित किए गए हैं
1. व्यवसाय का अनुवांशिक रूप
2. विवाह खान पान व सामाजिक सहवास संबंधी निषेध
3. संस्तरण की व्यवस्था
हट्टन का मत है कि जाति व्यवस्था की उपलब्धता भारत में होने के नाते इसकी उत्पत्ति के कारकों को तलाश करना भी भारतीय परिस्थितियों में ही संभव हो सकता है। अतः इस अध्ययन हेतु उन आदिवासी संस्कृतियों को चुनना चाहिए जिनमें काफी लंबे समय से परिवर्तन नहीं हुए हों। उदाहरणस्वरूप, भारत की नागा जनजाति का क्षेत्र इन क्षेत्रों में वर्तमान समय में भी कई ऐसी जनजातियां हैं जो हिंदू, इस्लाम और बौद्ध आदि धर्मों के प्रभाव से परे हैं। इन क्षेत्रों में अनेक गांव हैं तथा प्रत्येक गांव एक पृथक राजनीतिक इकाई हैं। उनकी जीवनशैली, व्यवसाय, विश्वास आदि अलग-अलग हैं। एक गांव के सभी लोग प्रायः एक ही व्यवसाय में संलग्न रहते हैं और वही व्यवसाय उनके जीवन बसर को पूरा करता है। इन आधारों पर यह अवश्य कहा जा सकता है कि आर्यों के आने से पूर्व भी भारत में व्यावसायिक विभिन्नता विद्यमान थी, भले ही यह सामान्य रूप में क्यों न रही हो। आर्यों ने इस व्यावसायिक विभिन्नता/विभाजन को और भी स्पष्ट किया तथा स्वयं के व्यवसायों को वरीयता में उच्च स्थान प्रदान किया।
व्यावसायिक आधारों की व्याख्या के पश्चात हट्टन ने विवाह, खान-पान और वैवाहिक निषेधों के विश्लेषण हेतु नागा जनजाति में माने जाने वाले टेबू' तथा माना' की अवधारणा का सहारा लिया। जनजातियों में अनेक प्रकार के व्यवहारों को अशुभ समझा जाता है तथा उन्हीं व्यवहारों पर रोक लगाने हेतु कुछ टेबू अथवा निषेधों को लागू किया जाता है। माना एक विशिष्ट प्रकार की शक्ति है जो अशरीरी तथा अलौकिक है और यह सभी वस्तुओं में विद्यमान रहती है। साथ ही यह स्पर्श से भी दूसरी वस्तुओं आदि में विचारित कर सकती है। माना एक प्रकार का विश्वास है तथा इस विश्वास के कारण ही जनजातीय समूह स्वयं को बाहरी समूहों के संपर्क से दूर रखने का प्रयास करते हैं। हट्टन के अनुसार आर्य जब भारत आए तो पहले से ही उनमें सामाजिक आधार पर संस्तरण की भावना पायी जाती थी। आर्यों ने यहां के मूल निवासियों में टेबू और माना जैसी अवधारणाओं व विश्वासों को देखा तथा उन्हें एक स्पष्ट एवं निश्चित स्वरूप प्रदान किया। इससे आर्यों का सामाजिक व राजनीतिक प्रभाव स्थापित हो गया तथा परिणामस्वरुप विवाह, खान-पान और सामाजिक सहवास संबंधित अनेक निषेध निर्मित हो गए तथा शनैः शनैः ये निषेध और भी विस्तृत व कठोर होते गए।
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