वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति के सिद्धांत - Origin of the Varna System
वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति के सिद्धांत - Origin of the Varna System
विभिन्न वर्णों की उत्पत्ति निम्न प्रकार हुई है इनसे संबंधित विचारों में अत्यधिक भिन्नता देखने को मिलती है। एक ओर यह विचार वेदों की रिचाओ, उपनिषदों, गीता और पौराणिक गाथाओं के आधर पर स्पष्ट किए जाते हैं तो दूसरी ओर दर्शन के आधार पर इसकी विवेचना आधुनिक विद्वानों द्वारा भी की गई है। कुछ विचारों के आधार पर वर्ण की उत्पत्ति को निम्नलिखित रुप से स्पष्ट किया जा सकता है
(1) ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के अनुसार अथवा परंपरागत सिद्धांत:- ऋग्वेद में पुरुष सूक्त के द्वारा वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति पर कुछ प्रकाश पड़ता है। इस सूक्त के अनुसार एक विराट स्वरूप है जिसके मु ब्रह्मा, बाहों से क्षत्रिय उदर अथवा जंघा से वैश्य और पैरों से शूद्र वर्ण की उत्पत्ति हुई है। वैदिक युग में वर्णभेद के विषय में प्रसिद्ध विद्वान और वेद आलोचक डॉक्टर कीत के अनुसार मयूर जिमनर, वेबर जैसे विद्वान मानते हैं
कि ऋग्वैदिक युग में किसी प्रकार का कोई जाति भेद नहीं था किंतु आधुनिक काल में जैल्यर-पूवर्ग का मानना है कि उस समय जाति-भेद था। एक दृष्टि से देखने पर सत्य ही ऋग्वेद में जाति भेद को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। ऋग्वेद के अनुसार ब्राह्मणों की उत्पत्ति मुख से होने के कारण उनका कार्य बोलना अर्थात लोगों को शिक्षित करना था। क्षत्रियों की उत्पत्ति भुजाओं के कारण इनका कार्य शासन संचालन व वस्त्र धारण कर समाज की रक्षा था। जंघाओ से वैश्य की उत्पत्ति के कारण इनका कार्य व्यापार वह पशु पालन था तथा शूद्रों की उत्पत्ति पैरों के कारण इनका कार्य सब की सेवा करना तथा समाज के धार को वाहन करना था जिस प्रकार पैर शरीर के भार का वाहन करता है।
(2) उपनिषदों का सिद्धांत अथवा उपयोगितावादी सिद्धांत:- उत्तर वैदिक काल में लिखे गए उपनिषदों में वृहदारण्यक एवं छांदोग्य से वर्णों की उत्पत्ति के संबंध में कुछ जानकारी मिलती है। वृहदारण्यक के अनुसार ब्रह्मा ने प्रारंभ में मात्र ब्राह्मणों को जन्म दिया। ब्राह्मण सभी कार्य पूर्ण नहीं कर सके अतः समाज कल्याण के लिए ब्रह्मा ने क्षत्रिय देवताओं (जैसे इंद्र, वरुण सोम भारत) की सृष्टि की जिससे क्षत्रिय उत्पन्न हुए। फिर भी सृष्टि का कार्य सही ढंग से नहीं हो सका जिसके कारण ब्रह्मा ने वैश्य देवता (बसु आदित्य रूद्र) की रचना की जिससे वैश्य वर्ण उत्पन्न हुआ।
इसी उपयोगितावादी दृष्टि के तहत शुद्र देवता कुशान व शूद्रवर्ण की उत्पत्ति हुई जिससे दो तथ्यों पर प्रकाश पड़ता है। श्रम तो सामाजिक आवश्यकता या उपयोगिता के आधार पर अलग अलग समय पर अलग-अलग वर्ण की उत्पत्ति है और दूसरा विभिन्न वर्णों की उत्पत्ति का आधार उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली विभिन्न प्रकार की सेवाएं थी। छांदोग्य उपनिषद में वर्ण तथा पुनर्जन्म के बीच घनिष्ठ संबंध बताया गया है। व्यक्ति अपने पूर्व जन्म में जिस प्रकार का कार्य करता है था उसमें से वैसा ही गुण अर्थात स्वभावगत विशेषताएं आ जाती थी। इसी कर्म व गुण के आधार पर उसे एक अगले जन्म में एक विशेष प्रकार की सदस्यता प्राप्त होती थी।
(3) महाभारत के अनुसार अथवा रंग का सिद्धांत:- महाभारत में अनेक स्थानों पर वर्ण व्यवस्था का उल्लेख है। शांति पर्व में महर्षि भृगु ने अपने शिष्य भारद्वाज को उपदेश देते हुए कहा कि प्रारंभ में मात्र एक ही वर्ण ब्राह्मण था कालांतर में यह एक वर्ण चार वर्णों में विभाजित हो गया। सफेद (श्वेत) रंग ब्राह्मणों की, क्षत्रियों का लोहित (लाल). व्यक्तियों का वैश्यों का पीत (पीला) व शूद्रों का श्याम (काला) रंग (वर्ण) है। रंगों के आधार पर वर्णों के विभाजन की कठिनाई का समाधान करते हुए भृगु ऋषि कहते हैं कि रंग वास्तव में वर्ण विभाजन का आधार नहीं है बल्कि गुण व कर्म ही है।
वास्तव में जो ब्राह्मण शांत व ज्ञानी थे। वह ब्राह्मण हुए जो क्रोधी व अभिमानी थे वह क्षत्रिय हुए। जो ब्राह्मण अपने धर्म के प्रति उदासीन होकर व्यापार व पशु पालन करने लगे वो वैश्य और जिनमें तामस, लोभ, असत्य, वह हिंसा गुण था वह शूद्र कहे जाने लगे। अतः स्पष्ट है कि ब्राह्मण वर्ण श्वेत रंग पवित्रता का सूचक है। क्षत्रियों का लाल रंग क्रोध का वैश्य का पीला रंग रजोगुण और तमोगुण के मिश्रण को स्पष्ट करता है जबकि शूद्रों का काला रंग तमोगुण यानी अपवित्रता का सूचक है।
(4) मनुस्मृति के अनुसार:- मनुस्मृति में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र चार वर्ण का वर्णन है। जहां तक मनुस्मृतिकार का वर्णों की उत्पत्ति के संबंध में विचार है कि यह महाभारत जैसा ही है कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र क्रमशः ब्रह्मा के मुख बाहु जंघा और पैरों से उत्पन्न हुए हैं। मनुस्मृति की मौलिक विशेषता यह है कि इसमें कर्म की महत्ता को स्वीकार किया गया है।
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