विवाह की उत्पत्ति के सिंद्धात - Origins of marriage
विवाह की उत्पत्ति के सिंद्धात - Origins of marriage
समाज वैज्ञानिक अध्ययनों में विवाह की उत्पत्ति से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांत निम्न प्रकार हैं -
1. शास्त्रीय सिद्धांत- इस सिद्धांत के प्रतिपादको मे प्लेटो एवं अरस्तु प्रमुख हैं। भारतीय धार्मिक ग्रंथ भी विवाह के इस सिद्धांत पर बल देते हैं। बाद में सर हेनरीमेन ने विश्व के विविध समाजों का अध्ययन कर इस सिद्धांत को विस्तारित किया। इस सिद्धांत के अनुसार विवाह का प्रारंभिक स्वरूप पितृसत्तात्मक या विवातेशांत पितृसत्तात्मक पितृवंशीय परिवार का विस्तार होता था।
2. यौन साम्यवाद का सिद्धांत - इस सिद्धांत के समर्थकों मे मॉर्गन, फ्रेजर एवं ब्रिफाल्ट प्रमुख हैं। इस सिद्धांत के अनुसार जब समाज विकास की प्रक्रिया के प्रारंभिक चरण में था, तब कोई भी पुरूष किसी भी महिला से यौन संबंध स्थापित कर सकता था। इस अवस्था को उन्होंने यौन साम्यवाद कहा है। इस चरण में प्रितृत्व का निर्धारण करना कठिन था। इसलिए मातृसत्तात्मक परिवारों का अस्तित्व था। इस सिद्धांत के अनुसार विवाह का प्रारंभिक स्वरूप यौन साम्यवाद का था।
3. एक विवाह का सिद्धांत - इस सिद्धांत के समर्थकों में वेस्टरमार्क प्रमुख हैं। वेस्टरमार्क के अनुसार जब पुरूष संपत्ति की भांति स्त्री पर एकाधिकार के प्रयास में सफल हुआ तो विवाह अस्तित्व में आया, अर्थात विवाह अपने अस्तित्व में एक विवाह के स्वरूप में ही आया। मैलिनोवस्की का भी यही मत है कि मनुष्य पशु अवस्था से ही परिवार को अपने साथ लाया है और वह एक विवाही परिवार था।
4. मातृसत्तात्मक सिद्धांत - इस सिद्धांत के समर्थकों में ब्रिफाल्ट प्रमुख हैं। प्रारंभिक अवस्था में स्त्री-पुरूष के संबंधों से अधिक मजबूत माता व पुत्र के संबंध थे, संतान के लालन-पालन एवं सुरक्षा का भार भी मात्र माता का था, अतः स्त्री यौन संबंधों के लिए अधिक स्वतंत्र थी। इस सिद्धांत के अनुसार यही विवाह का प्रारंभिक स्वरूप था।
5. उद्विकासीय सिद्धांत - इस सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या मॉर्गन ने की है। इनके अतिरिक्त हैवीलैण्ड, क्रिचफील्ड तथा बैकोफन भी इस सिद्धांत के समर्थक हैं। इस सिद्धात के अनुसार विवाह नामक संस्था एक ही बार में अपने वर्तमान स्वरूप में नहीं आई बल्कि उसका कृमिक रूप से उद्विकास हुआ है।
अर्थात यह यौन साम्यवाद के चरण से एक विवाह के स्वरूप तक उद्विकास की प्रक्रिया से गुजरा है। इन सभी सिद्धांतो को एक साथ मिलाकर देखें तो हम कह सकते हैं कि अन्य अवधारणाओं की भांति विवाह की उत्पत्ति के संबंध में भी विद्वानों में मतभेद है। इन सिद्धातों को और अधिक संक्षिप्त रूप से हम समाज वैज्ञानिको के विचारों के आधार पर देख सकते हैं।
A. मॉर्गन का उद्विकासीय सिद्धांत- मॉर्गन का मत है कि समाज की प्रारंभिक अवस्था में विवाह नामक संस्था का अभाव था, प्रारंभ में समाज में यौन साम्यवाद की स्थिति थी। पुरुष को किसी भी स्त्री से एवं स्त्री को किसी भी पुरूष से यौन संबंध स्थापित करने की स्वतंत्रता थी। धीरे-धीरे मानव समाज का विकास तेज हुआ और विवाह संस्था का प्रारंभिक स्वरूप विकसित हुआ, यह विकास कुछ अवस्थाओं में हुआ। जो निम्न प्रकार है
1. समूह विवाह
2. सिण्डेस्मियन विवाह
3. व्यवस्थित विवाह
इसी प्रकार बेकोफेन ने भी विवाह रूपी संस्था के विकास की तीन अवस्थाओं का उल्लेख किया है
1. बहुपति विवाह
2. बहुपत्नी विवाह
3. एक विवाह
B. वेस्टरमॉर्क का एक विवाह का सिद्धांत - वेस्टरमार्क का मानना है कि मनुष्य एवं पशु में अंतर है, मनुष्यों में भावनाएँ एवं संवेग जैसे अपनत्व एवं ईर्ष्या पाए जाते हैं अतः प्रारंभ में भी यौन साम्यवाद की स्थिति नहीं थी। व्यक्ति (स्त्री एवं पुरूष) भावनाओं के साथ एक दूसरे से जुड़े होते थे। इस प्रकार एक विवाह ही विवाह का प्रारंभिक स्वरूप था, और आगे भी रहेगा। वेस्टमार्क बहुपति एवं बहुपत्नी विवाह को विवाहिक आदर्शों का उल्लघन मानते हैं।
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