पारसन्स का नियमहीनता संबंधी सिद्धांत एवं विचार - Parsons' theory and ideas about lawlessness
पारसन्स का नियमहीनता संबंधी सिद्धांत एवं विचार - Parsons' theory and ideas about lawlessness
पारसन्स ने नियमहीनता की अवधारणा का विश्लेषण सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत किया है। सामाजिक नियंत्रण सामाजिक व्यवस्था का प्रमुख आधार है। सामाजिक नियंत्रण के यंत्र (Mechanisms of Social Control) के रूप में सामाजिक संस्थाओं को पारसन्स ने अत्यधिक महत्त्व दिया है। सामाजिक संस्थाएँ सामाजिक व्यवस्था (Social System) में संतुलन, अनुरूपता एवं नियमबद्धता में स्थापित रखती हैं। मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति भी सामाजिक संस्थाएँ करती हैं। संपूर्ण सामाजिक • व्यवस्था सामाजिक संस्थाओं में विभाजित हो जाती है और उन पर आधारित रहती है। पारसन्स ने सामाजिक संस्थाओं के निर्माण एवं विकास की प्रक्रिया को संस्थाकरण (Institutionalization) से संबधित किया है।
संस्थाकरण ही सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखता है और व्यक्तियों के व्यवहारों को निर्देशित, प्रतिमानित, संचालित एवं नियंत्रित करता है। संस्थाकरण का अभिप्राय है नियमबद्धता। पारसन्स के अनुसार संस्थाकरण की विरोधी है नियमहीनता (anomic) जब संस्थाकरण का अभाव रहता है, तो नियमहीनता पनपती है और व्यक्ति मनमाना व्यवहार रकने लगता है और किसी नियंत्रण को स्वीकार नहीं करता है।
पारसन्स ने नियमहीनता की परिभाषा करते हुए लिखा है- "संस्थाकरण की ध्रुवीय-विरोधी धारणा नियमहीनता है अंतः क्रियात्मक प्रक्रिया की संरचनात्मक पूरकता का अभाव या जो कि एक ही वस्तु है - आदर्शात्मक व्यवस्था का पूर्ण से खंडित हो जाना, नियमहीनता है।" पारसन्स के अनुसार प्रत्येक समाज के व्यक्तियों की आवश्यकताओं, लक्ष्यों एवं आदर्शों की प्राप्ति एवं पूर्ति के लिए संस्थाएँ होती है जो समाज स्वीकृत नियमों की स्थापना से है। जब ये समाज स्वीकृति नियमों का पुंज होती हैं। संस्थाकरण (Institutionalization) का अभिप्राय समाज स्वीकृत नियमों की स्थापना से है। जब ये समाज स्वीकृत नियम या पद्धतियाँ नहीं होती हैं या अप्रभावी हो जाती हैं, जो नियमहीनता (एनामी) की स्थिति रहती है। इसीलिए पारसन्स से कहा है कि नियमहीनता संस्थाकरण की ध्रुवीय-विरोधी (polar anti- thesis) धारणा है। एक और नियम व्यवस्था (संस्थारण) है. तो उसकी विरोधी नियमहीनता है। इसी स्थिति को स्पष्ट करते हुए उसने कहा है, (अंतः क्रियात्मक प्रक्रिया की संरचनात्मक पूरकता का अभाव ( नियमहीनता है और भी अधिक सरल शब्द में, प्रत्यय को स्पष्ट करते हुए पारसन्स ने अपनी परिभाषा में कहा है- (आदर्शात्मक व्यवस्था (Normative Order) का पूर्णरूप से खंडित हो जाना नियमहीनता एनामी है। जब आदर्शात्मक व्यवस्था अर्थात् संस्थाकरण या नियम व्यवस्था पूर्णरूप से खंडित हो जाती है या बिखर जाती है या अप्रभावी हो जाती है. तो उस स्थिति को नियमहीनता या एनामी कहते हैं।
नियमहीनता को पारसन्स ने संस्थात्मक प्राथमिकताओं (Institutional Priorities) के संदर्भ में भी व्याख्या की है। पारसन्स का कहना है कि एक व्यक्ति की समाज में अनेक विभिन्न प्रकार की स्थितियाँ एवं उनसे संबंधित भूमिकाएँ होती है। एक व्यक्ति की व्यावसायिक स्थिति, सामाजिक स्थिति, पारिवारिक स्थिति, राजनैतिक स्थिति आदि होती हैं और उसे सब स्थितियों की भूमिकाओं को निभाना पड़ता है। ऐसी दशा में कई बार एक व्यक्ति की विभिन्न स्थितियों में टकराव उत्पन्न हो जाता है और व्यक्ति यह निश्चय नहीं कर पाता है कि उसे क्या करना चाहिए? किस भूमिका को (Role) को प्राथमिकता देनी चाहिए। भूमिकाओं की प्रथमिकताओं के अभाव में नियमहीनता पनप सकती है। पारसन्स ने इसे एक उदाहरण के द्वारा समझाया है। एक डॉक्टर है। एक डॉक्टर को अपनी व्यावसायिक स्थिति (Professional Status ) है और उस स्थिति से संबंधित निश्चित भूमिका है जो कि व्यावसायिक आचरण के नियमों (Rule of Professional Conduct) से प्रतिमानित एवं निर्धारित होती है। पर एक डॉक्टर पति भी है, पिता भी है और भी अनेक पारिवारिक स्थितियाँ हैं। मान लीजिए किसी समय उसे किसी पारिवारिक भूमिका को निभाना है और उसी समय कोई गम्भीर रूप से बीमार मरीज को देखने के लिए उसे कोई बुलाने आता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर क्या करे?
ऐसी स्थितियों में संस्थात्मक प्राथमिकताएँ उसे मार्ग निर्देशत करती है और उनके अनुसार वह व्यवहार करता है। यदि संस्थात्मक प्राथमिकताएँ न हों, तो आये दिन इस प्रकार के संघर्ष उत्पन्न होते रहेंगे और व्यक्ति मनमाना व्यवहार करने के लिए बाध्य होगा। कुछ लोग इस अनिश्चितता का लाभ उठाकर भी मनमाना व्यवहार कर सकते हैं, पर संस्थात्मक प्राथमिकताएँ हर वस्तु एवं भूमिका की निश्चित परिभाषा करती है और स्वीकृत व्यवहार करने के लिए निर्देशित करती हैं। इसीलिए, पारसन्स ने लिखा है कि संस्थात्मक प्राथमिकताओं ( Institutional Priorities) का अभाव ही नियमहीनता है।
नियमहीनता के कारणों पर प्रकाश डालते हुए पारसन्स ने एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण कारण का उल्लेख किया है। पारसन्स ने लिखा है कि सामाजिक व्यवस्था के दो पक्ष होते हैं -
1. सकारात्मक (Positive) और
2. नकारात्मक (Negative )
नकारात्मक पक्ष कुछ कार्य को न करने का निर्देश देता है।
नकारात्मक पक्ष तभी प्रभावी रह सकता है जबकि समाज के अधिकतम व्यक्तियों की इच्छाओं एवं आवश्यकताओं की पूर्ति एवं संतुष्टि नियम व्यवस्था के अंतर्गत ही हो जाए। यह अनिवार्य नहीं है कि सब व्यक्तियों की सब आवश्यकताएँ पूर्ण हो जाएँ। पर यह अपरिहार्य है कि अधिकांश व्यक्तियों को न्यूनतम आवश्यकताएँ अवश्य पूरी हो जाएँ। जिस समाज व्यवस्था में अधिकतम व्यक्तियों की न्यूनतम अनिवार्य आवश्यकताएँ जैसे- भोजन, वस्त्र, रहने-सहने का स्थान, सुरक्षा आदि की पूर्ति होती है। उस समाज में आदर्शात्मक व्यवस्था (Normative Order or Norms) बनी रहती है, पर जिस सामाजिक व्यवस्था में न्यूनतम अनिवार्य आवश्यकताओं की भी पूर्ति नियम व्यवस्था के अंतर्गत नहीं हो पाती है, उसमें नियमों की व्यवस्था अप्रभावी हो जाती है और व्यक्ति मनमाने ढंग से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने लगने हैं और नियमहीनता पनपने लगती है।
पारसन्स ने भी मर्टन की इस व्याख्या को स्वीकार किया है कि नियमहीनता का आधार सामाजिक संरचना में ही है और उस आधार पर उसने नियमहीनता का विश्लेषण किया है। पारसन्स ने भी नियमहीनता के कारणों की खोज सामाजिक संरचना एवं सामाजिक व्यवस्था में की है। पारसन्स ने नियमहीनता के संदर्भ में संस्कार (Rituals), धर्म और मूल्य व्यवस्था ( Religion and Value System) आदि का भी उल्लेख किया है।
4. क्लवर्ड का नियमहीनता संबंधी सिद्धांत एवं विचार
क्लवर्ड ने मर्टन की व्याख्या में कुछ संशोधन प्रस्तुत किए है और उसकी व्याख्या को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। उचित साधनों की उपलब्धि में अंतरण नियमहीनता के विस्तार के प्रमाण का माप क्लवर्ड का सिद्धांत है कि सांस्कृतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के उचित साधनों या संस्थागत नियमों की उपलब्धि पर ही नियमहीनता आश्रित होती है। यदि उचित साधनों का वितरण समाज के सब वर्गों एवं समूहों के लिए समान है, तो नियमहीनता नहीं पनप सकती। पर प्रायः सामाजिक संरचनाओं में उचित साधनों का वितरण समान नहीं होता है और कुछ वर्ग एवं समूह उचित साधनों की उपलब्धि नहीं कर पाते हैं। बाध्य होकर ये वर्ग और समूह अनुचितसाधनों का प्रयोग करने लगते हैं। जिस मात्रा में उचित साधनों की उपलब्धि का वितरण समान न होगा, उसी मात्रा में नियमहीनता पाई जाएगी। उसने अपनी परिकल्पना को इस प्रकार व्यक्त किया है। नियमहीन व्यवहार (विचलित व्यवहार) के ऐसे अवसर उसी प्रकार भिन्न होंगे. जिस रूप में उचित साधनों की उपलब्धि में अंतर भिन्न होगा।"
अनुचित साधनों के प्रयोग के अवसर भी समान रूप से सबको उपलब्ध नहीं क्लवर्ड का कहना है कि जहाँ सब व्यक्तियों, वर्गों एवं समूहों को उचित साधनों की उपलब्धि का वितरण समान नहीं होता है। वहाँ यह भी है कि अनुचित साधनों के प्रयोग के अवसर भी समान रूप से सबको उपलब्ध नहीं होते हैं। नियमहीनता इस तथ्य पर भी आधारित है कि अनुचित साधन कहाँ तक किस समूह को उपलब्ध है। इस संदर्भ में उसने बाल अपराध, आत्महत्या आदि विचलित व्यवहारों की व्याख्या की है। हर व्यक्ति या समूह ही नियमहीन व्यवहार नहीं करने लगता है। नियमहीन व्यवहार वही करते हैं जिन्हें अनुचित साधन उपलब्ध होते हैं।
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