पारसन्स का क्रियात्मक दृष्टिकोण - Parsons's functional approach
पारसन्स का क्रियात्मक दृष्टिकोण - Parsons's functional approach
सामाजिक प्रणाली के प्रति पारसन्स का दृष्टिकोण समन्वयात्मक है। उसने उक्त प्रणाली के निर्माण के लिए न केवल उपयोगितावादी परिप्रेक्ष्य में विद्यमान अभिप्ररेणात्मक तथ्यों के महत्व को प्रदर्शन किया, बल्कि मूल्यों के महत्व को भी स्पष्ट किया। उसने अपने इस दृष्टिकोण का निर्माण सामाजिक क्रिया के सिद्धांत के रूप में किया, जो सामाजिक प्रणाली का मूल तत्व है।
पारसन्स 1937 के अनुसार क्रिया एकांत में नहीं होती। क्रिया अलग होने के बजाय सामूहिक योग में होती है। जो प्रणालियों का निर्माण करते हैं। इन प्रणालियों पर हमने आगे विचार किया है। आइए पहले आप (क्रिया ( की अवधारणा को समझ लें। पारसन्स के अनुसार (क्रिया ( की अवधारणा मनुष्यों के व्यवहार से हुआ है। एक जीवधारी प्राणी के रूप में बाह्य जगत के साथ और अपने भीतरी मन
के साथ अंतर्क्रिया करते हैं। ये व्यवहार आगे दी हुई चार स्थितियों में क्रिया का रूप धारण कर लेते हैं।
• इनका प्रयोजन किसी लक्ष्य या किसी प्रत्याशित परिणाम को प्राप्त करना होता है।
• यह किसी विशिष्ट स्थिति में घटित होती है।
• यह समाज के मानदंडों और मूल्यों से नियंत्रित होती है।
• इसके लिए ऊर्जा अथवा अभिप्रेरणा अथवा प्रयत्न की अपेक्षा होती है।
जब ये सभी विद्यमान हो तो व्यवहार क्रिया में बदल जाती है। आप उस महिला का उदाहरण लीजिए जो स्वंय कार चलाकर मंदिर जा रही है। वह संभवत: वहाँ पूजा करने जा रही है।
ऐसी स्थिति में उसका लक्ष्य मंदिर में पूजा करना है जिसकी तरफ वह उन्मुख है। उसकी क्रिया की स्थिति वह सड़क है जिस पर वह अपनी कार चला रही है और वह कार जिसमें वह बैठी है। इसके अलावा उसका व्यवहार सामाजिक प्रतिमानों या मूल्यों द्वारा नियंत्रित है और मंदिर जाकर पूजा करने की क्रिया को समाज से मान्यता भी प्राप्त है। इसके अतिरिक्त कार चलाने के लिए वह अपनी बुद्धिमान और कार चलाने के कौशल का इस्तेमाल कर रही है, इसे उसने समाज से सीखा है। कार चलाने की इस क्रिया का मतलब है, ऊर्जा का प्रयोग कार के स्टियरिंग हवील को पकड़ना एक्सिलेटर का ठीक से प्रयोग करना और भीड़ भरी सड़क पर ठीक से गाड़ी चलाना आदि। जब व्यवहार को इस प्रकार विश्लेषण करके देखा जाता है तो इसे क्रिया कहा जा सकता है।
क्रियान्मुखता की इस स्थिति को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। एक तो अभिप्रेरणात्मक उन्मुखता और दूसरी मूल्यपरक उन्मुखता अभिप्रेरणात्मक उन्मुखता उस स्थिति की ओर संकेत करती है, जिसमें आवश्यकताओं, बाह्य उपस्थिति और योजनाओं के परिप्रेक्ष्य में किया होती है। चिंतन के मानवों पर आधारित है।
जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है। पारसन्स के अनुसार कोडू क्रिया एकांत में नहीं होती, अपितु ये सामूहिक योग में होती है। क्रिया के इस सामूहिक योग से प्रणालियों का निर्माण होता है। क्रिया की इन प्रणालियों को तीन तरह से संगठित किया जा सकता है। पारसन्स के अनुसार ये प्रणालियाँ है। व्यक्तित्व प्रणाली सांस्कृतिक प्रणाली और सामाजिक प्रणाली व्यक्तित्व प्रणाली मानव के व्यक्तित्व के उन पहलुओं के बारे में बताती है. जो व्यक्ति की सामाजिक क्रिया पद्धति को प्रभावित करती है। दूसरी ओर सांस्कृतिक प्रणाली में वास्तविक विश्वास मूल्यों की मूर्त व्यवस्था संप्रेषण के प्रतीकात्मक साधन शामिल है। सामाजिक प्रणाली में व्यक्तियों और इनसे बनने वाले संगठनों के बीच अंतः क्रिया के रूपों और तरीकों की ओर संकेत किया है। इस संदर्भ में मिचल (1979:204) ने सामाजिक प्रणाली के उदाहरण के रूप में किसी संगठन की प्राधिकार संरचना को या किसी परिवार में श्रम विभाजन को किया है।
पारसन्स के अनुसार किसी सामाजिक प्रणाली में निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती हैं।
• दो या अधिक व्यक्तियों के बीच अंतः क्रिया होती है और अंतः क्रियात्मक प्रक्रिया ही इसका मुख्य केंद्र बिंदु है।
• अंतः क्रिया ऐसी स्थिति में होती है, जिसमें किसी अन्य पात्र या व्यक्ति की अपेक्षा होती है। इन व्यक्तियों में संवेगों और मूल्यों के बारे में निर्णय लेने की शक्ति होती है तथा इनके द्वारा वे अपने लक्ष्यों और क्रिया के साधनों को प्राप्त करते हैं।
• सामाजिक प्रणाली में सामूहिक लक्ष्योन्मुखता होती है। या समान मूल्य होते हैं और मानदंडों तथा संज्ञानात्मक अर्थों में अपेक्षाओं पर सर्वसम्मति होती है।
• सामाजिक प्रणाली की अवधारणा को और अच्छी तरह से समझने के लिए आइए अब हम सामाजिक प्रणाली के गठन की आधारभूत इकाई का परीक्षण करें।
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