पारसन्स का क्रिया सिद्धांत - Parsons's theory of action
पारसन्स का क्रिया सिद्धांत - Parsons's theory of action
समाजशास्त्रीय जगत में पारसन्स का क्रिया सिद्धांत अत्यंत उल्लेखनीय तथा विवेचनीय है। पारसन्स ने वस्तुतः इस सिद्धांत के माध्यम से सामाजिक व्यवस्था का अध्ययन करने की विधि प्रतिपादित की है। पारसन्स के इस सिद्धांत का मूल विषय यही है कि यदि सामाजिक क्रियाओं की विश्लेषण कर ली जाए तो हम सामाजिक व्यवस्था क्रिया की अवधारणा को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। सामाजिक क्रिया की परिभाषा करते हुए पारसन्स ने लिखा है। - “सामाजिक क्रिया के अंतर्गत मानव की समस्त गतिविधियाँ आ जाती हैं। सामाजिक क्रिया वे क्रिया है, जिसमें कर्ता अपनी अभिप्रेरणाओं से लक्ष्यों की प्राप्ति करने का प्रयास करता है। इस प्रकार पारसन्स ने क्रिया के लिए कर्ता, लक्ष्य, परिस्थितियाँ और साधन इन चार तत्वों की प्रमुख माना है।
अपने इस सिद्धांत की आवश्यकता बताते हुए पारसन्स आगे लिखता है - "उन सबसे विभिन्न दृष्टियों से इस संगठित सिद्धांत के लिए महत्वपूर्ण योग दिया है। इस दृष्टि से पारसन्स का मत पैरेटो, वेब्लेन, मैक्स वेबर, दुर्खीम आदि समाजशास्त्रियों से है। वस्तुतः पारसन्स ने अपना क्रिया सिद्धांत इन्ही विचारकों के विचारों से संबंधित रखा है।
पारसन्स आगे लिखना है कि सामाजिक क्रिया का सिद्धांत केवल अवधारणाओं एवं उनके तार्किक अंतसंबंधों का समूह मात्र नहीं है।
पारसन्स ने अपने इस सामाजिक क्रिया सिद्धांत का विवेचन अपनी पुस्तक “दी स्ट्रक्चर ऑफ सोशल ऐक्सन" में क्रिया है जो 1937 में प्रथम बार प्रकाशित हुई। पारसन्स की यह पुस्तक चार खंडों में प्रकाशित हुई है। इसके प्रथम खंड में पारसन्स ने अपना पद्धतिशास्त्र संबंधी विवेचन किया है। इस दृष्टि से उसने क्रिया का प्रत्युत्तरवादी सिद्धांत के नाम से विश्लेषण प्रस्तुत की है। इस सिद्धांत में पारसन्स ने अपने पद्धतिशास्त्र को चार तत्वों पर आधारित किया है। ये तत्व हैं तार्किकता, प्रत्यक्षवाद, प्रकार्यवाद और सामाजिक इकाई। इन चार तत्वों के आधार पर पारसन्स ने प्रत्यक्षवादी परंपरा में प्रचलति कमियों को इंगित किया है। इसके बाद पारसन्स ने पैरेटी और दुर्खीम के विचारों की आलोचना की है।
पारसन्स द्वारा प्रस्तुत सामाजिक क्रिया का सिद्धांत आधुनिक युग का प्रमुख सिद्धांत है,
पारसन्स के पूर्व विचारकों ने इस दृष्टि से अपना दृष्टिकोण व्यक्त किया है। परंतु प्रत्येक में कमियाँ बताते हुए पारसन्स ने यह सिद्धांत पारित किया। इस दृष्टि से प्रथम मार्शल का स्थान उल्लेखनीय है। मार्शल के विचारों पर टिप्पणी करते हुए पारसन्स ने लिखा है कि उसने क्रिया की तार्किकता की खोज नहीं की है। मार्शल ने यह भी नहीं माना है कि क्रिया के लिए आवश्यकताओं का स्वतंत्र अस्तित्व होता है। इस भाँति पारसन्स लिखता है कि मार्शल के विचारों को हम पूर्णतः प्रत्यक्षवादी नहीं मान सकते। मार्शल के बाद पारसन्स ने पैरेटो के विचारों की समीक्षा की है। पैरेटो ने इस दृष्टि से विशिष्ट चालक सिद्धांत प्रतिपादित किया है। पैरेटो का उद्देश्य अतार्किक क्रियाओं का विश्लेषण करना था। पैरेटो ने लिखा है कि क्रियाओं का अंतिम लक्ष्य अतार्किक होता है। पारसन्स के अनुसार पैरेटो ने अतार्किक क्रियाओं पर अधिक बल देकर अच्छा नहीं किया। उसने लिखा है कि अतार्किक भी पारसन्स ने पैरेटो के योगदान को उल्लेखनिय बताया। परंतु उसकी व्यापक टीका अपने सिद्धांत में की है।
इस प्रकार क्रिया सिद्धांत के संदर्भ में पारसन्स ने अपने पूर्ववर्ती विचारें की व्यापक रूप से समीक्षा की है। क्रिया संबंधी दुर्खीम के विचारों की समीक्षा करते हुए पारसन्स ने लिखा है
कि दुर्खीम ने सामाजिक क्रिया के कारणों की व्याख्या सामाजिक घटनाओं के संदर्भ में की जानी चाहिए। दुर्खीम के इस मत को पारसन्स करता है। यहाँ अन्य तत्वों का समावेश होता है। पारसन्स लिखता है कि प्रत्येक क्रिया के पीछे कुछ आदर्श और मूल्य अवश्य होते हैं। ये सामाजिक आदर्श और मूल्य ही व्यक्ति की क्रियाओं को प्रभावित करते हैं। व्यक्ति को इन मूल्यों के अनुरूप ही अपनी क्रिया को आयोजित करना पड़ता है। प्रत्येक समाज में इन आदर्शों और मूल्यों की व्यवस्था होती है। इनकी अवहेलना करना समाज के हित मे नहीं है। इसलिए प्रत्येक समाज में व्यक्तियों पर इनका नियंत्रण होता है। अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति की क्रियाएँ इनके नियंत्रण में रहती हैं। इसी प्रकार प्रत्येक क्रिया की कुछ दशाएँ और परिस्थितियाँ होती है जो क्रिया विशेष को प्रभावित करती है। ये परिस्थितियाँ साधनों की प्रकृति को निर्धारित करती है। परिस्थिति के अनुसार व्यक्ति क्रिया करने के तलिए इन साधनो को चुनता है। इस परिस्थिति की सीमा में ही क्रियाएँ आयोजित की जाती है।
इस प्रकार पारसन्स ने अपने क्रिया सिद्धांत में क्रिया के तत्वपों की विश्लेषण की है। वह यह मानता है इन तत्वों के विश्लेषण के अभाव में क्रिया-व्यवस्था की व्याख्या नहीं हो सकती। और इस प्रकार सामाजिक व्यवस्था की व्याख्या हेतु यह विश्लेषण अति आवश्यक है।
पारसन्स लिखता है कि सामाजिक व्यवस्था उस समाज की भौतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप होती है। इन्ही कारणों से विश्व में विभिन्न प्रकार की सामाजिक व्यवस्थाएं पाई जाती है। इसी प्रकार सामाजिक व्यवस्था क्रिया के संदर्भ में भी उल्लेखनीय स्थान रखती है। अर्थात् क्रिया का रूप स्वरूप सामाजिक व्यवस्था और उसकी विशिष्ट प्रकृति के अनुकूल होते हैं। इस प्रकार क्रिया औ सामाजिक व्यवस्था के पारस्परिक संबंधों को भी पारसन्स ने स्पष्ट करेन का प्रयास किया है।
इस प्रकार सामाजिक परिस्थिति सामाजिक व्यवस्था और सामाजिक क्रिया व्यवस्था में घनिष्ठ संबंध है। इस मत को भी पारसन्स ने स्पष्ट करने का यत्न किया है। उसके मतानुसार सामाजिक परिस्थिति व्यक्तियों की स्थिति (Status) और कार्यों (Roles) को निर्धारित करती हैं। इन स्थितियों के ही अनुसार व्यक्ति को समाज मे कार्य या क्रिया करना पड़ता है। व्यक्ति को परविार में, पडोस में, व्यावसायिक संगठनों आदि सभी में अपनी स्थितियों के अनुसार कार्य करना पड़ता है। स्थितियों का ज्ञान हो। तभी वे अपनी क्रियाओं को तार्किक रूप में संचालित कर सकते हैं। वास्तव में व्यक्तियों की भूमिकाओं का निर्धारण केवल सामाजिक स्थितियों के आधार पर ही नहीं होता है। क्योंकि भूमिका व्यवस्था में एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से अंतःक्रिया करनी पड़ती है। इसी प्रकार व्यक्तियों को अपनी भूमिकाओं का संचालन करने के लिए सामाजिक परिस्थितियों का ज्ञान भी आवश्यक है। पारसन्स का सामाजिक परिस्थितियों से यहाँ तात्पर्य समाज के मूल्यों एवं आदर्शों से है। इनके ज्ञान के अभाव में व्यक्ति सामाजिक दृष्टि से वांछित व्यवहार और क्रियाएँ नहीं कर सकता है। इसीलिए पारसन्स कहता है कि व्यक्तियों को इन सबका ज्ञान करने के लिए सामाजीकरण की व्यवस्था की जाती है।
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