सहभागी प्रेक्षण - Participant observation
सहभागी प्रेक्षण - Participant observation
इस तरह के परीक्षण में शिक्षक व्यक्तियों के समूह की क्रियाओं में स्वयं हाथ बटाता है और उनके व्यवहारों का प्रेक्षण भी करता जाता है। सचमुच में यहां प्रेक्षक का उद्देश्य व्यवहारों का ठीक से वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण करना होता है और इस ख्याल से ही वह समूह की क्रियाओं में हाथ बंटाता है। प्रायः प्रेक्षक व्यक्तियों के व्यवहार के हर पहलू के बारे में अपना विस्तृत रिकॉर्ड तैयार करता है और बाद में उसका विश्लेषण करता है। इस विधि में प्रेक्षक व्यक्तियों के समूह का पूर्व कालीन सदस्य भी बन कर कार्य कर सकता है यह अंशकालीन सदस्य बन कर भी कार्य कर सकता है। चाहे उनकी सदस्यता जिस प्रकार की हो, वह सक्रिय रूप से समूह की क्रियाओं में भाग लेता है। जब प्रेक्षक की भूमिका के बारे में व्यक्तियों को पता नहीं होता है, तो उसे प्रच्छन्न सहभागी प्रेक्षण और जब लोगों को प्रेक्षक की भूमिका के बारे में पता होता है तो उसे अतिप्रच्छन्न सहभागी प्रेक्षण कहा जाता है। सहभागी प्रेक्षण प्राय: असंरचित या और संगठित होता है। दूसरे शब्दों में. इस विधि में प्रेक्षक को इस बात की छूट होती है कि वह स्वयं ही यह निश्चित करें कि उसे क्या प्रेक्षण करना है
उसे कैसे रिकॉर्ड करना है आदि आदि। इस तरह की प्रेक्षण विधि में प्रेक्षक अपना परिचय सदस्यों से प्राय: छिपाकर रखता है या वह कोई ऐसी भूमिका अपनाकर समूह में प्रवेश करता है जिससे प्रेक्षण किए जाने वाले सामाजिक व्यवहार का पैटर्न प्रभावित न हो। लेकिन यह कोई जरूरी नहीं है कि वह अपना परिचय हमेशा छिपाकर ही रखें। ऐसा करने से उसे कुछ लाभ अवश्य होता है, इसलिए प्रायः वह अपना परिचय छिपाकर ही रखता है। सबसे बड़ा लाभ यह है कि जब व्यक्तियों को यह पता नहीं होता है कि उनके बीच कोई एक प्रेक्षक भी है जो उनके व्यवहारों का प्रेक्षण कर रहा है तो वह बिल्कुल ही स्वाभाविक ढंग से व्यवहार करता है।
रोसेंहान, (1973) द्वारा सहभागी प्रेक्षण के सहारे एक महत्वपूर्ण अध्ययन किया गया जिसमें सहभागी परीक्षकों ने एक मनिचिकित्सीय अस्पताल में रोगी बन कर कुछ दिनों तक प्रेक्षण किया और उस अस्पताल के सामान्य कार्यों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी। सहभागी प्रेक्षण के कुछ गुण तथा दोष है इसके प्रमुख गुण निम्नांकित है-
(i) इस तरह के परीक्षण में प्रेक्षक व्यक्तियों के व्यवहारों का प्रेक्षण एक स्वाभाविक संदर्भ में करता है। फलस्वरूप वह व्यक्तियों के प्रत्येक व्यवहारिक पहलू जिससे किसी व्यवहार का विशेष अर्थ समझा जा सकता है, को सही-सही रिकॉर्ड कर उसका विश्लेषण करने में समर्थ होता है। इससे उसके परिणाम की सार्थकता काफी बढ़ जाती है।
(ii) प्राय: यह देखा गया है कि सहभागी प्रेक्षण कई दिनों तक चलता है। परिणाम स्वरूप, इससे जो सूचनाएं प्राप्त होती हैं, वे काफी विस्तृत तथा अर्थ पूर्ण होती है।
इस विधि के कुछ प्रमुख अवगुण निम्नांकित है-
(i) क्योंकि प्रेक्षक इस विधि में समूह की क्रिया में सक्रिय भाग लेता है, इसलिए धीरे धीरे वह समूह में अपना एक विशेष पद बना लेता है और अपनी सक्रियता कम कर देता है। परिणाम स्वरूप, वह वास्तव में बहुत सी सामाजिक अंतर क्रियाओं को रिकॉर्ड करना ही भूल जाता है और इस तरह से उसका प्रेक्षण दोषपूर्ण हो जाता है।
(ii) प्रेक्षक धीरे धीरे अपनी मानवीय कमजोरियों को दिखाना शुरू कर देता है।
(iii) सहभागी प्रेक्षण से प्राप्त आंकड़ों में मानकीकरण कम होता है।
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