पितृसत्ता और विवाह संस्था - Patriarchy and the institution of marriage
पितृसत्ता और विवाह संस्था - Patriarchy and the institution of marriage
पितृसत्ता के ढाँचे का अध्ययन करते समय स्त्रीवादी विचारों और उनके उद्देश्यों की परख अत्यंत आवश्यक है। स्त्री को अपनी पहचान बनाने के लिए समाज में जो संघर्ष करना पड़ा स्त्रीवादियों ने उसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। पितृसत्ता के द्वारा स्त्री को शक्तिहीन, उत्पीड़ित एवं गुलाम बनाने की जो प्रवृत्ति थी उसका विश्लेषण स्त्रीवादियों ने पितृसत्ता के एकाधिकार एवं वर्चस्ववादी स्थितियों के तहत किया। यद्यपि स्त्रीवादियों के विभिन्न आंदोलनों में स्त्री संबंधी स्वतंत्रता और समानता एवं स्वावलंबन के विचारों को लेकर मतभेद रहे हैं। परंतु सभी आंदोलनों का उद्देश्य स्त्री को पितृसत्ता से मुक्ति दिलाने के लिए ही रहा है। पितृसत्ता पुरुष के द्वारा स्थापित समाज व्यवस्था का शोषक रूप है। स्त्रीवादी आंदोलनों में अपने शोध के माध्यमों से यही तथ्य उजागर किया गई कि स्त्री शोषण और अत्याचार का मुख्य कारण पितृसत्ता है। लैंगिक भेदभाव तब तक खत्म नहीं हो सकता जब तक पितृसत्तात्मक व्यवस्था को समाप्त नहीं कर दिया जाता। पितृसत्तात्मक समाज पुरुष के वर्चस्ववादी मानसिकता का द्योतक होने के कारण इसकी समाप्ति निश्चय ही पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती देती है।
बाद में पितृसत्ता के समर्थक स्त्रीवादी आंदोलनों को उनके उद्देश्य से भटकाने के लिए लैंगिक भेदभाव के विरुद्ध, इस आंदोलन में शामिल हो गए। यद्यपि स्त्रीवादी चिंतक पितृसत्ता और
लैंगिक भेदभाव दोनों को एक साथ जोड़कर देखते थे। इसलिए उसमें भटकाव की कोई गुंजाइश नहीं थी।
संपूर्ण विश्व में स्त्रीवादी आंदोलनों का प्रभाव सरकारी नीतियों पर पड़ता दिखाई देने लगा है। जिससे स्त्रीवादी आंदोलनों को और अधिक प्रोत्साहन मिलने लगा। पितृसत्तात्मक समाज में बचपन से ही लिंग भेद से बच्चों को अवगत कराया जाता रहा है, ताकि वह बचपन से ही अपने लिंग की श्रेष्ठता के प्रति सचेत रहे, उसके व्यवहार और क्रिया-कलाप भी लैंगिक स्थितियों के अनुरूप विकसित होते रहें। स्त्रीवादी एक तरफ पितृसत्तात्मक समाज को सुधारने की बात कर रहे थे तो दूसरी तरफ उसे जड़ से समाप्त करने की भी बात कर रहे थे। चूँकि समाज पर पुरुष का नियंत्रण है, इसलिए इसमें पुरुषों को भी शामिल करने की आवश्यकता महसूस की गई।
अतः स्त्रीवादियों ने पुरुष मानसिकता को भी बदलने पर जोर दिया। उनके अनुसार - ने "पुरुषों को चाहिए कि वह राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक स्तर पर लैंगिक भेद को दूर करें और क़ानून में सुधार के द्वारा पितृसत्तात्मक ढाँचे को प्रतिबंधित करें या समाप्त करें। स्त्रीवादी चिंतक 'मैकिनान' के अनुसार स्त्री को अंतःकरण से जागृत करने की आवश्यकता है, तभी पुरुष स्त्रियों के प्रति सुरक्षित क़ानून के निर्माण में पहल करेगें। उनके अनुसार राज्य एक संस्था की तरह है। वह सभी क़ानून समाज को नियंत्रित करने के लिए तथा अपनी सुरक्षा के लिए बनाता है। इस तरह से वह एकाधिकार की स्थिति में होता है। चूँकि व्यवस्था पुरुषों द्वारा निर्मित होती है। इसलिए यह एकाधिकार समाज की सभी इकाईयों के साथ-साथ स्त्रियों के ऊपर भी लागू होता है। चाहे वह घर में हों, पारिवारिक पेशे में हों, सभी जगह उसे मौखिक नियमों में बंधना पड़ता है। 'मैकिनान' आगे कहती हैं कि "व्यक्तिगत और सामाजिक नियंत्रण की परिकल्पना लैंगिक भेद के माध्यम से शोषण को ही बढ़ावा देती है यह खतरनाक स्थिति है।"
प्रसिद्ध स्त्रीवादी चिंतक 'जर्मन ग्रीयर' ने उग्र स्त्रीवाद की वकालत की उन्होंने सेक्स के उदारीकरण की प्रक्रिया को स्त्री के शोषण का छल पूर्ण रवैया बताया। उनकी पुस्तक 'फिमेल यून्च' (1970), 'डैडी वी हार्डली न्यू यू' (1989), 'द होल विमैन (1999) में स्त्रीवादी दृष्टिकोण को पितृसत्तात्मक समाज के समक्ष चुनौती के रूप में रखा गई है। वे जिस क्रांति की बात करती हैं वह निश्चित रूप से युगों से प्रताड़ित स्त्री का है। इसलिए स्त्रीवादियों ने साफ तौर पर कहा कि पुरुष नियमों और योजनाओं के द्वारा पितृसत्तात्मक ढाँचे को सुधारे या उसमें परिवर्तन लाए या उसे पूर्णतः खत्म कर दे। स्पष्ट है कि लैंगिक भेदभाव की प्रक्रिया, जिसके माध्यम से पितृसत्ता स्त्रियों पर नियंत्रण रखती है, वह बनावटी है। जैविक अंतर के अतिरिक्त स्त्री और पुरुष के मध्य और कोई अंतर नहीं होता है। कुछ स्त्रीवादी चिंतकों ने भारतीय परिवेश में इसे ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक ढाँचे का रूप कहा है। संविधान ने उल्लिखित जनतांत्रिक व समतावादी कानूनों को स्त्रीवादियों ने चुनौती दी तथा इसके विरुद्ध एक व्यापक आंदोलन की शुरूआत की। विश्व में चल रहे स्त्रीवादी आंदोलनों से प्रेरणा ले करके इन्होंने स्त्री स्वतंत्रता, समानता तथा स्वावलंबन के लिए आवाज उठाई।
भारत में पाई जाने वाली विविधता के कारण लैंगिक भेदभाव की प्रक्रिया को विश्लेषित करने में कई असुविधाएँ आईं। ‘रजनी पालड़ी वाला' ने 'बियान्ड मिथ्स - द सोसल एण्ड पोलिटिकल डायनामिक ऑफ जेंडर' लेख में दक्षिण भारत और उत्तर भारत की स्त्रियों के बीच लैंगिकता संबंधी भेदभाव और साक्षरता तथा स्त्रियों के शोषण संबंधी विचार, पारिवारिक जीवन में किस तरह के हैं, इस पर शोध अध्ययन प्रस्तुत किया है। उन्होंने लिखा है कि उत्तर भारत में पितृसत्तात्मकता पर अधिक बल दिया गई है।' उन्होंने इसके सांस्कृतिक और आर्थिक दो कारण बताए हैं। उनके अनुसार उत्तर भारत में ब्राह्मणवादी मूल्यों का ज्यादा प्रभाव है जो दक्षिण भारत में कम देखने को मिलता है।' इसलिए उत्तर भारत में संबंध आर्थिक दृष्टि से अधिक होते हैं। ब्राह्मण जाति व्यवस्था में ऊपर हैं तथा समाज व्यवस्था के नियामक हैं। इसलिए इनका अनुसरण अन्य जातियाँ भी करती हैं। जबकि तमिलनाडु राज्य में स्त्रियों का लिंगानुपात अधिक है और वे उत्तर भारत की स्त्रियों के अनुपात में थोड़ी बेहतर स्थिति में हैं।
भारत में विधवा की स्थिति अत्यंत दयनीय है।
उसे उपेक्षा और अपवित्रता दोनों स्थितियों का सामना करना पड़ता है। वह समाज में अपना उचित स्थान नहीं बना पाती। पारिवारिक ढाँचे में भी उसे उपेक्षित कर दिया जाता है। यहाँ तक कि उसके लिए रोज़गार के अवसर भी उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। यह स्थिति उत्तर और दक्षिण दोनों जगहों पर एक समान है। भारत में संयुक्त परिवार व्यवस्था में पितृसत्तात्मकता कहीं अधिक दृढ़ है। यहाँ जाति संबंधों के भीतर ही विवाह को महत्व दिया जाता है और विवाह सभी के लिए अनिवार्य है। यह पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों पर अधिक लागू होता है। विवाह संस्था अपने भौतिक, सामाजिक और प्रतीकात्मक अर्थ का परिणाम है। यह स्त्री और पुरुषों के जीवन पर अलग-अलग तरह से प्रभाव डालती है। अपनत्व की भावना, सम्मान और हैसियत पति और पिता के साथ गहरे जुड़े होते हैं। निःसंतान दंपति को पितृसत्तात्मक समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है। इसमें स्त्रियों की स्थिति अधिक दयनीय होती है उन्हें उपेक्षित कर दिया जाता है अर्थात संतानहीनता का सारा दोष स्त्रियों पर मढ़ कर पुरुष को सभी दोषों से मुक्त कर दिया जाता है। विवाह जाति और पारंपरिक रस्मों का बंधन होता है। भारत में अंतःजाति विवाहों का प्रचलन है। विवाह में दिए जाने वाले उपहार और दहेज नए परिवार में स्त्री की हैसियत को दर्शाता है और उसी अनुसार उसे सम्मान भी दिया जाता है।
ऐसी स्थिति में कम हैसियत वाले परिवार बेटियों को बोझ समझने लगते है। दक्षिण एशियाई धर्मों में स्त्री को यौन पवित्रता और अच्छे दहेज के कारण सम्मान दिया जाता है। भारत में वैवाहिक संबंध संगोत्रिय एवं जातिगत होते है और इसमें पति पत्नी की योग्यता, उम्र, आय आदि का पर विशेष ध्यान दिया जाता है। उसी अनुसार परिवार में हस्तक्षेप की इज़ाजत मिलती है। संयुक्त परिवारों में युवा दंपत्ति पुरानी पीढ़ियों के साथ रहते हैं। वहाँ पर परिवार संस्था के संचालन के लिए पुरुष का विवाहित होना आवश्यक होता है। इसलिए कम उम्र में विवाह का प्रचलन बढ़ा है। संपूर्ण भारत में रिश्तेदारियों में ही विवाह करने का प्रचलन रहा है। ऐसा पारिवारिक संबंधों को मज़बूत बनाए रखने एवं सुरक्षा के कारण है। यह पितृसत्ता के और दृढ़ होने की ओर संकेत करता है। दक्षिण भारत में सगोत्रीय विवाहों का प्रचलन अधिक रहा है। इसके विपरीत उत्तर भारत में सगोत्रीय विवाहों पर बंधन है। पर सजातीय विवाहों को मान्यता दी गई है। लड़कियों को ऊँची हैसियत वाले परिवारों में विवाह करने का प्रचलन रहा है। उत्तर भारत में दूसरे गांवों में शादी का प्रचलन रहा है, जबकि दक्षिण भारत में गाँव और जिले के भीतर ही शादियाँ होती रही हैं।
प्रायः ऐसी स्थिति भी देखी गई है कि ऊँची हैसियत की शादियों में वर्गीय स्तर भेद भी होता है। ये अपने से कम हैसियत के परिवारों में शादी विवाह करने से बचते हैं। यदि स्त्री सुशिक्षित, सुंदर या अच्छी आय वाली नौकरी करती है तो वह जाति में आर्थिक रूप से कमज़ोर होने के बावजूद ऊँची हैसियत के परिवारों में विवाह कर सकती है। लेकिन उसे दहेज या उपहार में छूट नहीं है। अर्थात पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के स्वावलंबी होने के बावज़ूद दहेज व अपनी आमदनी से पुरुष को खुश रखना ज़रूरी है। किसी बहाने स्त्री को छोड़ देना या तलाक दे देना पुरुषों के लिए सहज है, पर स्त्रियों के लिए इसकी गुंजाइश कम ही होती है। पुनर्विवाह की व्यवस्था स्त्री के लिए नहीं है पर पुरुष इस मामले में स्वैच्छिक है अर्थात पितृसत्ता में स्त्री की स्थिति दास की तरह है। स्त्री संगठनों ने पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के लिए दोहरे नियमों की भी आलोचना की है। स्त्री के लिए तलाकशुदा जीवन, विधवा जीवन की तरह ही है। पितृसत्तात्मक समाज में उसके लिए कठोर बंधन निर्धारित है। स्त्रीवादियों ने स्त्री की स्वतंत्रता व आर्थिक रूप से स्वावलंबन को ज़रूरी समझा। उसके अनुसार स्त्रियों की स्थिति में सुधार तभी संभव है जब पितृसत्तात्मक व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाए।
पितृवंश और ससुर का घर स्त्री के लिए ऐसे पड़ाव हैं, जो उसे वंश परंपरा को चलाने के लिए एवं संपत्ति के उत्तराधिकारी को जानने के लिए ही स्थान देते हैं अन्यथा समाज में उसकी मौजूदगी का कोई महत्त्व नहीं है। पति के साथ भी उसका जीवन पुत्र जननी के रूप में है। वह तभी पतिव्रता है जब वंश के लिए उत्तराधिकारी पैदा करे। पति अपने एकधिकार में पत्नी से सिर्फ संतति सुख की आकांक्षा रखता है। स्त्रियों का वैवाहिक जीवन भी खानाबदोश से कम नहीं होता। एक तरफ उनका मायका होता है तो दूसरी तरफ उनकी ससुराल होती है। उसकी निष्ठा दोनो परिवारों में बराबर होती है, लेकिन पितृसत्तात्मक व्यवस्था में उसे किसी भी परिवार का ज़िम्मेदार सदस्य नहीं बनाया जाता है। चूँकि दोनों परिवारों में स्त्री का जीवन बँट जाता है। इसलिए अपने पिता से मिलने वाले भावनात्मक अधिकार भी खत्म हो जाते हैं। ऐसा दक्षिण भारत और उत्तर भारत में दोनों स्थानों के परिवारों में देखने को मिलता है। विवाह के बाद स्त्री का पति के घर जाकर रहना पितृसत्ता के कठोर नियमों में से एक है। यहाँ एक परिवार में वह पराई है तो दूसरे परिवार में ब्याहता है। दोनों स्थिति में वह त्याज्य है, जबकि पितृसत्तात्मक समाज पुरुष को दामाद के रूप में पूज्य और पुत्र के रूप में वंशज कहता है। अर्थात दोनों ही स्थितियों में पुरुष सुरक्षित है। वह कुनबे को में बढ़ाने वाला ज़िम्मेदार तथा संरक्षक के रूप में जाना जाता है। यद्यपि स्त्रियां पुरुषों से कहीं अधिक संवेदनशील होती हैं। वे भावनात्मक स्तर पर पितृगृह से जुड़ी रहती है तथा पति के प्रति भी संवेदना बनाए रखती हैं।
संयुक्त परिवारों में बुजुर्ग सदस्य मुखिया होता है। वह श्रम के आवंटन, आय के वितरण एवं एकत्रीकरण तथा खर्च के मामले में अपना एकाधिकार रखता है। वह स्त्रियों को पुरुषों के समकक्ष रखकर कोई निर्णय नहीं लेता। सभी निर्णय पुरुषों के हित में लिए जाते हैं और स्त्रियों पर उन्हें थोप दिया जाता है। स्त्री की स्थिति पत्नी, माँ और वृद्धा के रूप में घर की चारदीवारी में ही बीत जाती है। पितृसत्तात्मकता में उनके लिए स्वतंत्र निर्णय लेने या घर के बाहर की दुनियाँ को समझने का अधिकार नहीं है। जातीय, वर्गीय और लैंगिक आधार पर स्त्रियों के प्रति व्यवहार सुनिश्चित किए जाते हैं। उन्हें सीमित दायरे में ही भ्रमण की इजाज़त दी जाती है।
इस तरह से पितृसत्तात्मक व्यवस्था में विवाह संस्था स्त्रियों की स्वतंत्रता को बाधित करती है, जिससे वह अपना पूर्ण विकास नहीं कर पाती है। वह किसी भी स्थिति में परिवार के मुखिया या पति के प्रति हमेशा मुखापेक्षित रहती हैं। वह पति, पुत्र या करीबी रिश्तेदारों पर आर्थिक रूप से निर्भर बनी रहती हैं। जो थोड़े अधिकार परिवार संस्था में उन्हें मिलते हैं वे भी वर्चस्व की लड़ाई में तब्दील हो जाते हैं।
सास-बहू, ननद भौजाई, जेठानी-देवरानी के आपसी विवाद पितृसत्ता की ही देन हैं। विवाह संस्था पारिवारिक कलह एवं स्त्री के आपसी विवादों को सुझाने में असमर्थ रही है। ये विवाद स्त्री को स्त्री के विरुद्ध खड़ा करते हैं। पुरुष तटस्थ होकर परंपरा संबंधी नियमों का हवाला देता रहता है। पितृसत्तात्मक समाज इन विवादों में ही अपनी स्थिति मज़बूत बनाए हुए है।
स्त्रीवादी चिंतक स्त्रियों में सकारात्मक सोच विकसित करने के लिए तथा उन्हें जागरूक करने के लिए कई तरह से प्रयासरत हैं। भारत में कई पत्रिकाओं का प्रकाशन किया जा रहा है। कई संस्थाएँ बनाई गई हैं। स्वयं भारत सरकार ने 1992 में राष्ट्रीय स्त्री आयोग का गठन किया है। सन 1980 से काली फार विमेन' में नामक स्त्री प्रकाशन संस्थान का आरंभ किया गया, जिसके तहत स्त्रियों के उत्थान के लिए उत्तम कोटि की पुस्तकों का प्रकाशन किया जा रहा है। प्रोग्रेसिव वूमेंस आर्गनाइजेशन' नामक संस्था का गठन उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद में किया गई। 1970 के दशक में दिल्ली से मानुषी' पत्रिका का प्रकाशन किया जा रहा है। दिल्ली से ही 'समाज विज्ञान संस्थान' की 'हासिए की आवाज' पत्रिका भी प्रकाशित की जा रही है। इसी तरह से बिहार से अपनी आजादी के लिए' तथा मध्य प्रदेश से 'स्त्री की आवाज' नामक पत्रिकाएँ प्रकाशत हो रही हैं। ये सभी पत्रिकाएँ पितृसत्तात्मक समाज के विरुद्ध स्त्री जागरण, उनके उत्थान तथा उनकी सामाजिक स्वतंत्रता की लड़ाई में संघर्षरत हैं।
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