पितृसत्ता: स्त्रीवाद के संदर्भ में - Patriarchy: in the context of feminism
पितृसत्ता: स्त्रीवाद के संदर्भ में - Patriarchy: in the context of feminism
यहाँ हम उस पृष्ठभूमि के बारे में विचार करेंगे, जिसमें स्त्री पर पुरुष की सत्ता के लिए पितृसत्ता शब्द का प्रयोग होना प्रारंभ हुआ था।
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सत्तर के दशक में अमेरिका में वियतनाम युद्ध के विरोध में और नागरिक अधिकारों के पक्ष में जन्में आंदोलनों में स्त्रियों ने भी बड़ी संख्या में भाग लिया था। उन स्त्रियों ने पाया कि आंदोलन में शांति, न्याय और समता की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले साथी पुरुषों का उनके प्रति जो व्यवहार था वह आम पुरुषों से भिन्न नहीं था। ये वे स्त्रियां थीं जो अपने लिए निर्धारित कर दी गई पारंपरिक भूमिकाओं के दायरों में सीमित नहीं रहना चाहती थीं। ये वे स्त्रियां थीं जो पितृसत्तात्मक समाज द्वारा थोपे गए नीति-नियमों का विरोध कर समान मानवीय अधिकारों की मांग कर रही थीं। वे यौन संबंधी रूढ़ियों को उखाड़ फेंकने की बात कर रही थीं। स्त्री समूह की मांग ने पितृसत्तात्मक समाज के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी। उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया और वियतनाम युद्ध विरोधी मुहिम का झंडा थामे संगठन के नेतृत्व ने उनसे कहा कि आंदोलन में स्त्रियों को पुरुषों के पीछे रहना चाहिए।
दूसरे शब्दों में, स्त्रियों को नेतृत्व क्षमता से हीन भोग की वस्तु और अनुगामिनी के रूप में ही लिया जा रहा था. जबकि उन स्त्रियों ने यह सोचा था कि शोषण और अन्याय के खिलाफ मुहिम चलाने वाले पुरुषों की मानसिकता बदली हुई होगी और कम-से-कम आंदोलन में वे उन्हें अपने बराबर समझेंगे। वहाँ के कड़वे अनुभवों से वे इस नतीजे पर पहुँचीं कि घर हो या बाहर, पुरुषों की स्थिति शोषक और स्त्रियों की शोषित के रूप में ही अवस्थित हैं।
2. पितृसत्ता: रेडिकल स्त्रीवाद की नज़र में
उपर्युक्त ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रेडिकल स्त्रीवाद पनपा और सबसे पहले केट मिलेट की कृति सेक्सुअल पॉलिटिक्स प्रकाशन वर्ष (1970) में व्यवस्थित रूप में व्यक्त हुआ । केट मिलेट ने ही स्त्री और पुरुष के बीच की सत्ता की स्थिति के लिए सबसे पहले पितृसत्ता शब्द का प्रयोग किया। ऐसा करने के पीछे उनका मंतव्य यह जाहिर करना था कि स्त्री की दोयम स्थिति व्यवस्थागत है
और उसकी अस्मिता स्वायत्त है। इस तरह मिलेट ने पिता के शासन के अर्थ में प्रयुक्त किए जाते रहे शब्द का पुरुष की सत्ता के अर्थ में प्रयोग कर उसका रूपांतरण कर दिया। मिलेट द्वारा स्त्री की दोयम स्थिति को व्यवस्था के रूप में रेखांकित करना स्त्रीवादी चिंतन और आंदोलन दोनों के लिहाज से बड़ी महत्वपूर्ण बात थी। उससे पहले यह मान्यता व्याप्त थी कि स्त्री की अधीनता अपने आप में एक व्यवस्था न होकर पूंजीवाद अथवा इसी तरह की किसी अन्य वृहत्तर व्यवस्था का हिस्सा है।
यहाँ गौरतलब है कि मिलेट ने पितृसत्ता का केवल स्वरूप ही उकेरा था। वे इसका कोई ठोस आधार नहीं विश्लेषित कर पाई। पितृसत्ता क्यों है, स्त्री की स्थिति दोयम क्यों है, पुरुष शोषण करने की स्थिति में क्यों हैं – इन प्रश्नों को उन्होंने अनुत्तरित ही छोड़ दिया।
मिलेट के बाद रेडिकल स्त्रीवादी शुल्मिथ फायरस्टोन ने द डायलेक्टिक ऑफ सेक्स (1970) में मिलेट द्वारा अधूरे छोड़ दिए कार्य को पूरा किया।
सबसे पहले तो उन्होंने पितृसत्ता को ही केंद्रीय संरचना सिद्ध किया। इसके लिए उन्होंने मार्क्स-एंगेल्स के इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या को दुरुस्त किया। फायरस्टोन के मुताबिक, मार्क्स-एंगेल्स ने वर्ग, वर्ग संघर्ष, अंतर्विरोध और शोषण को केवल आर्थिक परिक्षेत्र तक ही सीमित करके देखा था अन्य अंतर्विरोधों को उन्होंने द्वितीयक और इसलिए आर्थिक वर्ग के खत्म होने के साथ स्वतः मिट जाने लायक माना था। फायरस्टोन ने यह प्रस्तावित किया कि इतिहास में प्रमुख अंतर्विरोध और संघर्ष आर्थिक धरातल पर श्रम करने वालों और उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व या नियंत्रण रखने वालों के बीच नहीं रहा है। उन्होंने आर्थिक वर्ग की जगह यौन वर्ग शब्द का प्रयोग करते हुए मानव समाज को मूलतः पुरुष वर्ग और स्त्री वर्ग में बंटे होने और मानव इतिहास को मुख्य तौर पर इन्हीं के बीच अंतर्विरोध और संघर्ष का इतिहास घोषित किया। उन्होंने दावा किया कि इतिहास की उनकी इस नई भौतिकवादी व्याख्या की तर्ज पर होने वाली क्रांति ही सच्ची और असली क्रांती होगी।
इस तरह की क्रांति के लिए फायरस्टोन ने उन कारणों को रेखांकित किया जो स्त्री की दोयम स्थिति के लिए ज़िम्मेदार रहे हैं। स्त्री की शारीरिक संरचना में उसकी अधीनता की खोज करते हुए उन्होंने जो कारण गिनाए वे निम्नलिखित हैं-
• स्त्री की गर्भधारण और संतानोत्पति की क्षमता;
• गर्भ की अवस्था में शारीरिक विवशता और अर्थोपार्जन न कर पाने के कारण पुरुषों पर निर्भर रहने की उसकी विवशता;
• शिशु की देखभाल;
• माता पर शिशु की लंबे समय तक निर्भरता
• इस लंबी अवधि के अनन्तर माँ और बच्चे के बीच पनपे संवेदनात्मक संबंध और
• अपनी इस प्रजनन क्षमता के कारण विशेष प्रकार के ही श्रम करने की बाध्यता।
चूँकि यह सब पारंपरिक पारिवारिक संरचना के दायरे में घटित होता है, इसलिए फायरस्टोन जिस क्रांति की ज़रूरत की बात कर रही थी उसके लिए उनके मुताबिक, परिवार नाम की इस संरचना को खत्म करना पहला उपाय था।
दूसरा उपाय उन्हें कृत्रिम गर्भाधान और गर्भ निरोध जैसी तकनीक के विकास में दिखा। उन्हें लगा कि इनसे स्त्री प्रजनन की अनिवार्यता और अनचाहे गर्भ से मुक्त हो जाएंगी। तीसरा उपाय उन्होंने यह सुझाया कि बच्चे की देखभाल की ज़िम्मेदारी समाज को लेनी पड़ेगी और उन्होंने सामुदायिक शिशु देखभाल केंद्रों की कल्पना भी की।
यह प्रश्न उठ सकता है कि फायरस्टोन इस कदर मार्क्सवाद से क्यों उलझ पड़ी? उन्हें तो स्त्री अधीनता और स्त्री मुक्ति पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए था। दरअसल, फायरस्टोन को मार्क्सवाद से यह शिकायत थी कि उसे आर्थिक धरातल की असमानता ही सभी असमानताओं की जड़ में क्यों दिखाई देती है? इससे स्त्री अधीनता के केवल उस पहलू पर विचार की राह खुलती है, जिसका सीधा संबंध आर्थिक दायरे से है। ऐसे में, स्त्री अधीनता के जो धागे यौनिकता, प्रजनन, विवाह, पत्नीत्व, मातृत्व, घरेलू काम-काज आदि से जुड़े हुए हैं, वे अदृश्य रह जाते हैं, जबकि स्त्री के जीवन में यही धागे अधिक मायने रखते हैं। फायरस्टोन का प्रयास यह था कि यह हकीकत जगजाहिर हो। यह और बात है कि ऐसा करने के क्रम में उनसे अन्य कई असमानताओं को नज़रअंदाज़ करने की चूक हो गई।
3. आमूल परिवर्तनवादी (रेडिकल) स्त्रीवाद की आलोचना
रेडिकल स्त्रीवाद द्वारा पितृसत्ता के उकेरे गए स्वरूप और उसकी व्याख्या की स्त्रीवादियों ने कई कारणों से आलोचना की।
• स्वरूप की आलोचना
स्त्रीवादियों का मत है कि स्त्री और पुरुष के बीच के सत्ता संबंध के विशिष्ट समीकरण की जिस तरह उपेक्षा की जाती रही है, उसके स्वरूप के रेखांकन का जो काम रेडिकल स्त्रीवाद ने किया उसके बिना स्त्रीवाद की यात्रा संभव नहीं थी। रेडिकल स्त्रीवाद ने इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया कि स्त्रियों के बीच की भिन्नताएँ इतनी मामूली नहीं हैं कि उन्हें दरकिनार कर सभी स्त्रियों को एक ही धरातल पर स्थित मान लिया जाए। विभिन्न वर्गों में बंटे समाज में सभी स्त्रियों के अनुभव एक समान नहीं होते। उदाहरण के लिए, निम्न जातियों की स्त्रियों को जाति-व्यवस्था और पितृसत्ता दोनों का ही दोहरा दंश झेलना पड़ता है। उन्हें न केवल सभी पुरुषों, बल्कि उच्च जातियों की स्त्रियों की अधीनता भी झेलनी पड़ती है।
इतना ही नहीं, उच्च जातियों की स्त्रियाँ खुद को निम्न जातियों के पुरुषों से भी श्रेष्ठ स्थिति में पाती हैं। जातिजन्य श्रेष्ठता इन स्त्रियों को निम्न जातियों की स्त्रियों के साथ मिलकर पितृसत्ता के खिलाफ मोर्चा खड़ा करने से रोक देती है। इसी तरह, उच्च वर्ग की स्त्रियों और निम्न वर्ग अथवा मज़दूर स्त्रियों के हित समान नहीं होते।
सभी पुरुषों की स्थिति भी एक समान नहीं है। न केवल पुरुषों के बीच सत्ता मौजूद है, बल्कि ऐसी भी स्थितियाँ है जिनमें स्त्री भी सत्ता की स्थिति में होती है और पुरुष सत्ताहीनता की स्थिति में। उदाहरण के लिए, जाति आधारित विभाजन के कारण निम्न जातियों के पुरुष खुद को उच्च जातियों की स्त्रियों से हीन स्थिति में पाते हैं। कहने का आशय यह है कि सामाजिक संरचना इतनी सरल नहीं है कि एक ओर पुरुषों को रख दिया जाए और दूसरी ओर स्त्रियों को।
इसके अलावा, पितृसत्ता को एक अलग स्वायत्त संरचना मानकर चलने पर स्त्री-पुरुष संबंधों में देश और काल के आधार पर जो भिन्नताएँ रही हैं, वे नज़रअंदाज़ हो जाती हैं। मध्यकालीन समाज में पितृसत्ता का स्वरूप वैसा नहीं था जैसा कि आधुनिक समाज में है। आज के समय में ही दुनिया भर की सभी स्त्रियों के पितृसत्ता के अनुभव एक-समान नहीं हैं। आदिवासी और गैर-आदिवासी स्त्रियों, दलित और गैर-दलित, उच्च और निम्न वर्ग, मुसलमान और हिंदू स्त्रियों के जीवनानुभव अथवा उनकी समस्याएँ और संघर्ष एक-सा नहीं हैं।
• व्याख्या की आलोचना
स्त्रीवादियों ने रेडिकल स्त्रीवाद द्वारा पितृसत्ता की प्रस्तुत की गई व्याख्या की भी आलोचना की। रेडिकल स्त्रीवाद के मुताबिक, स्त्री अधीनता का कारण उसकी प्रजनक क्षमता है जो स्त्री अधीनता के पक्षधर रहे हैं, वे भी वर्षों से यही तर्क प्रस्तुत करते रहे हैं।
स्त्रीवादियों ने पाया कि रेडिकल स्त्रीवाद जाने-अनजाने उन्हीं की पंक्ति में खड़ा हो जाता है। जबकि उन्होंने इसी तर्क को काटने के लिए सेक्स/जेंडर विभेद की अवधारणा विकसित की थी। वैसे भी, किसी भी सामाजिक सत्ता-संरचना की उत्पत्ति और निरंतरता के पीछे किसी एक ही कारक की भूमिका नहीं होती। आखिर, रेडिकल स्त्रीवाद ने मार्क्सवाद की इसीलिए तो आलोचना की थी कि वह समूचे समाज को आर्थिक तत्वों के पदों में ही विघटित कर देता है। स्त्रीवादियों का मत है कि स्त्री अधीनता के विभिन्न कारणों के बीच के अंतसंबंधों को समझने की ज़रूरत है न कि किसी एक कारण की केंद्रीयता के बरक्स दूसरा कारण खड़ा करने की। अब आइए हम यह देखें कि रेडिकल स्त्रीवाद की पितृसत्ता की संकल्पना की आलोचना के क्रम में स्त्रीवादियों ने इसे कैसे परिभाषित करने के प्रयास किए हैं।
4. पितृसत्ता का अर्थ-विस्तार
मेडिकल स्त्रीवाद द्वारा पितृसत्ता पद के प्रयोग में विद्यमान कमियों के आधार पर बैरेट और शीला रोबोथम जैसी स्त्रीवादी विद्वानों ने तो इसे एक सिरे से अनुपयोगी करार दिया।
सिल्विया वाल्बी बैरेट और शीला रोबोधम के रुख से सहमत नहीं हैं। वे स्त्री अधीनता के विभिन्न आयामों की गहराई, व्यापकता और अंतसंबंध की सटीक समझ विकसित करने के लिहाज से पितृसत्ता जैसी संकल्पना या सिद्धांत को अनिवार्य मानती हैं। उनका मत है कि अनुपयोगी मानने की जगह इसे एक संकल्पना और सिद्धांत के रूप में इस तरह विकसित किया जा सकता है कि स्त्री अधीनता की देश, काल, जाति, नस्ल, वर्ग, धर्म, जातीयता आदि आधारित भिन्नताएँ नज़रअंदाज़ न हो पाएँ।
मार्क्सवादी स्त्रीवाद पितृसत्ता को पूंजीवाद की उपज मानता है। उसके मुताबिक, परिवार स्त्री के शोषण का प्राथमिक स्थल है। यहाँ स्त्रियों द्वारा किए जाने वाले घरेलू श्रम से सीधे पूंजीपतियों को लाभ होता है न कि पुरुषों को पितृसत्ता को इस तरह पूंजीवाद से जोड़कर मार्क्सवादी स्त्रीवाद पूंजीवाद - पूर्व समाज व्यवस्थाओं में विद्यमान स्त्री अधीनता की व्याख्या कर पाने में असमर्थ हो जाता है।
समाजवादी स्त्रीवाद पितृसत्ता को पूंजीवाद की उपज नहीं मानता। उसके मुताबिक, दोनों ही एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इस जुड़ाव की प्रकृति को लेकर मतभेद की स्थिति है। जिल्ला आइजेन्स्टिन इस जुड़ाव को दो जिस्म एक जान की तरह देखती हैं। वे मानती हैं कि दोनों एक-दूसरे में गुथ कर एक हो गए हैं। अपना मंतव्य व्यक्त करने के लिए उन्होंने कैपिटलिस्ट पैट्रियार्कों का प्रयोग किया है। हार्टमैन और मिशेल इन दोनों संरचनाओं को इतना एकमेव नहीं मानतीं कि उनकी अपनी पहचानें खो गई हों। उनका मत है दोनों के तार जुड़े हुए हैं लेकिन, दोनों अलग-अलग रेखांकित और विश्लेषित किए जा सकते हैं।
गर्दा लर्नर ने पितृसत्ता की सबसे सटीक परिभाषा दी है। उनके मुताबिक, पितृसत्ता का अर्थ परिवार के भीतर स्त्रियों और बच्चों पर पुरुष आधिपत्य का संस्थानीकरण और प्रदर्शन तथा बाहरी समाज में भी स्त्रियों पर प्रसार है। इससे यह पता चलता है कि समाज के सभी महत्वपूर्ण संस्थानों पर पुरुष काबिज हैं और स्त्रियाँ इस तरह की किसी भी सत्ता से वंचित है। इसका मतलब यह नहीं कि स्त्रियाँ एकदम से पूरी तरह सत्ताहीन हैं अथवा अधिकारों, प्रभाव, और संसाधनों से पूरी तरह वंचित हैं। यह आमतौर पर व्याप्त इस धारणा का द्योतक है कि पुरुष स्त्री से श्रेष्ठ होते हैं।
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