भारतीय समाज में पितृसत्ता - patriarchy in indian society
भारतीय समाज में पितृसत्ता - patriarchy in indian society
पितृसत्ता और समाज की अन्य संरचनाओं के बीच गहरा जुड़ाव रहता है। यही कारण है कि भिन्न भिन्न समाजों में पितृसत्ता का स्वरूप भी भिन्न-भिन्न रहा है। भारतीय उपमहाद्वीप में जाति व्यवस्था की व्याप्ति ने यहाँ की समाज-व्यवस्था को एकदम अनूठा बना रखा है। जाति-व्यवस्था के कारण पितृसत्ता के निर्माण की प्रक्रिया और उसके स्वरूप के स्तर पर भी भारतीय समाज अन्य समाजों से भिन्नता लिए हुए है। भारत में ही सभी समाज जाति के आधार पर ही गठित नहीं हैं। यहाँ जनजातीय समाज व्यवस्थाएँ भी हैं। दोनों ही तरह के समाजों में पितृसत्ता अलग-अलग स्वरूप लिए हुए है।
इसलिए भारतीय पितृसत्ता नामक किसी संरचना की हम बात नहीं कर सकते, लेकिन जाति व्यवस्था के निरंतर फैलते जाने और धीरे-धीरे कतिपय जनजातीय समाजों द्वारा इसे अपना लिए जाने की व्यापक परिघटना को देखते हुए स्त्रीवादी विद्वानों ने जाति समाज की पितृसत्ता को वर्चस्वशाली करार दिया है, जिससे जनजातीय पितृसत्ताएँ प्रभावित हुए बिना नहीं रही होंगी।
जाति-समाज के साथ आबद्ध पितृसत्ता का नामकरण ब्राह्मणवादी पितृसत्ता किया गया है। उमा चक्रवर्ती ने इस संबंध में निम्नलिखित मत व्यक्त किए हैं -
• यह स्त्री पराधीनता के विभिन्न रूपों में से कोई एक रूप भर नहीं बल्कि हिंदू समाज और जाति आधारित व्यवस्था से आबद्ध खास संरचना है। भारत के अधिकतर क्षेत्रों में जड़ जमा चुकी इस पितृसत्तात्मक संरचना की अलग पहचान चिन्हित करने के लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का प्रयोग उचित है।
• यह वस्तुत: नियमों और संस्थानों का ऐसा पुंज है, जिसमें जाति और जेंडर एक-दूसरे से गुंथे हुए हैं और एक-दूसरे का स्वरूप तय करते हैं, जिसमें स्त्री जातियों के बीच का पदानुक्रम बनाए रखने के •लिए बतौर साधन इस्तेमाल होती है।
• इसने ऐसे नियम बना रखे हैं कि दायराबद्ध विवाह-वृत्तों की पदानुक्रमता का उल्लंघन हुए बिना जाति व्यवस्था का पुनरुत्पादन होता रहे।
जाति की स्थिति और तदजन्य रुतबा (शुद्ध/ अशुद्ध) के अनुसार ही उसकी स्त्रियों के लिए नियम तय किए गए हैं। इन नियमों को तय करने का अधिकार ऊँची जातियों के पास रहा है।
• यह पतिव्रता और साध्वी स्त्रियों के महिमामंडन द्वारा स्त्रियों से उनकी अपनी ही अधीनता के लिए सहमति प्राप्त करता है। ज़रूरत पड़ने पर इसने दंड की भी व्यवस्था कर रखी है।
• आनुष्ठानिक हैसियत उठाने के लिए निम्न जातियाँ अक्सर इन नियमों का अनुसरण करना शुरू कर देती हैं। इस क्रम में वे यह नहीं समझ पाती कि उच्च और निम्न जातियों की स्त्रियों के लिए विवाह और यौन संबंधी अलग-अलग नियमों का ऊँची जातियों द्वारा निम्न जातियों के श्रम के दोहन से गहरा संबंध है। यह इस बात की व्याख्या करता है कि क्यों एक तरफ तो ऊँची जातियों में विधवा पुनर्विवाह भी निषिद्ध है और दूसरी तरफ निम्न जातियों की स्त्रियों के लिए पुनर्विवाह ही नहीं बल्कि उनसे जबरन सहवास तक की संभावना खुली रखी गई।
• श्रम दोहन जाति व्यवस्था का मूल मंतव्य है, कारण इसी के लिए जेंडर आधारित नियम बनाए गए ताकि ऊँची जातियों का हित सध सके।
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