पितृसत्ता सार्वभौम और सर्वकालिक नहीं है - Patriarchy is not universal and everlasting

पितृसत्ता सार्वभौम और सर्वकालिक नहीं है - Patriarchy is not universal and everlasting


अब तक हमने देखा स्त्रीवादी चिंतकों ने एक-एक कर उन सभी तर्कों को गलत किया जो पितृसत्ता को सार्वभौम, सर्वकालिक और स्वाभाविक मानते आ रहे थे। लेकिन, कुछ तर्क ऐसे भी रहे हैं जो पितृसत्ता को सार्वभौम, सर्वकालिक और स्वाभाविक नहीं मानते। ये मानते हैं कि पितृसत्ता इतिहास के एक पड़ाव पर कुछ निश्चित कारणों से उत्पन्न हुई और इसलिए, उन कारणों को दूर कर उसे खत्म भी किया सकता है। यहाँ हम ऐसे ही कुछ तर्कों पर विचार करेंगे।


रेडिकल स्त्रीवादियों पर हम पहले बात कर चुके हैं। उन्होंने पितृसत्ता के इतिहास के किसी मोड़ पर ही उत्पन्न होने की बात तो की, लेकिन इस क्रम में वे जैविक निर्धारणवाद को गले लगा बैठीं, जो कि पितृसत्ता के पक्षधरों के तरकश का सबसे शक्तिशाली तीर रहा है। इसलिए, स्त्रीवाद स्त्री-मुक्ति के अभियान में उनकी व्याख्या के साथ आगे नहीं बढ़ सकता था। रेडिकल स्त्रीवादियों से बहुत पहले मार्क्सवाद स्त्री के अधीन स्थिति में आने को ऐतिहासिक परिघटना बता चुका था और वह भी जैविक- निर्धारणवाद के भंवर में फंसे बिना।


यहाँ हम फ्रेडरिक एंगेल्स की कृति परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति पर विचार करेंगे, क्योंकि मार्क्स-एंगेल्स के समूचे लेखन कार्य में यही एक ऐसी कृति है, जिसमें स्त्री विषयक मसलों का व्यवस्थित विवेचन किया गया है- 


1.फ्रेडरिक एंगेल्स: 'परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति'


फ्रेडरिक एंगेल्स की यह कृति 1884 में प्रकाशित हुई थी। इसे लिखने के लिए उन्होंने मानवविज्ञानी लुईस हेनरी मॉर्गन की 1877 में प्रकाशित रचना 'प्राचीन समाज का सहारा लिया था। मॉर्गन ने मानव सभ्यता के विकास को मंजिलों के क्रम के रूप में देखने का प्रयास किया था। उन्होंने वन्य-जीवन, बर्बरता और सभ्यता- इन तीन मंजिलों की बात की और मानव के एक मंजिल से दूसरे मंजिल की ओर की विकास यात्रा के पीछे मुख्य तौर पर आजीविका के साधनों और उनमें हुई उत्तरोत्तर उन्नति का हाथ बताया। मॉर्गन ने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संरचनाओं के स्वरूप के निर्धारण में आजीविका के साधनों की निर्धारक भूमिका रही है। जैसे-जैसे आजीविका और उन्हें जुटाने के साधन सरल से जटिलतर होते गए वैसे-वैसे परिवार और इसलिए स्त्री-पुरुष संबंधों के स्वरूप में परिवर्तन होता गया।


मार्क्स और एंगेल्स ने भी इतिहास की जो भौतिकवादी धारणा विकसित की थी, उसमें उन्होंने उत्पादन के साधनों की भूमिका को ही निर्धारक माना था। एंगेल्स के शब्दों में भौतिकवादी धारणा के अनुसार, इतिहास में अंतत: निर्णायक तत्व तात्कालिक जीवन का उत्पादन और पुनरुत्पादन है, लेकिन यह खुद दो प्रकार का होता है। एक ओर तो भोजन, वेशभूषा तथा आवास जैसे जीवन-निर्वाह के साधनों और उन्हें प्राप्त करने के लिए जरूरी औज़ारों का उत्पादन होता है। दूसरी ओर स्वयं मनुष्यों का उत्पादन, यानि पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंश-वृद्धि होती रहती है।


मॉर्गन मानवविज्ञानी पद्धति और विपुल आंकड़ों के साथ मार्क्स-एंगेल्स की स्थापना की पुष्टि कर रहे थे। यही कारण है कि मार्क्स-एंगेल्स ने मॉर्गन के कार्य को हाथों-हाथ लिया। उन्होंने मॉर्गन के कार्य को सैद्धांतिक परिपक्वता प्रदान की। मॉर्गन ने जिन तीन मंजिलों की बात की उन्हें स्वीकार करते हुए एंगेल्स ने स्त्री की अधीनता को दूसरी मंजिल यानि बर्बरता की अवस्था की परिघटना बताया।


यहाँ वन्य-जीवन और बर्बरता की अवस्था के बारे में मॉर्गन और एंगेल्स के विचारों को संक्षेप में प्रस्तुत किया जा रहा है, ताकि एंगेल्स जिस रास्ते स्त्री अधीनता संबंधी अपने निष्कर्ष पर पहुंचे वह स्पष्ट हो सके।