पितृसत्ता सार्वभौम और सर्वकालिक - patriarchy universal and everlasting

पितृसत्ता सार्वभौम और सर्वकालिक - patriarchy universal and everlasting


पितृसत्ता के पक्ष में प्रस्तुत किए गए तर्कों की चारित्रिक खासियत यह है कि वे स्त्री अधीनता और पुरुष आधिपत्य को उनके शरीर के साथ अनिवार्य तौर पर जुड़ा हुआ मानते हैं। समाज विज्ञान में इसे जैविक निर्धारणवाद कहा जाता है। यहाँ हम एक-एक करके इन तर्कों और स्त्रीवादियों द्वारा दिए गए उनके जवाबों पर विचार करेंगे-


1. धार्मिक तर्क


धार्मिक दृष्टिकोण वाले ईश्वर को सृष्टिकर्ता मानते हैं। वे जीव-जगत के समस्त कार्य-व्यापारों और घटनाओं का नियंता ईश्वर को ही मानते हैं। उनके मुताबिक, चूंकि ईश्वर ने स्त्री शरीर की इस तरह से रचना की कि वह गर्भ धारण कर संतान को जन्म दे, इसलिए उसके लिए भिन्न सामाजिक भूमिका का निर्धारण उचित है। उनका मत है किस्त्री माँ बनने के लिए ही रची गई है और यही उसके जीवन का ध्येय होना चाहिए, इसी से उसके जीवन की सार्थकता सिद्ध होती है। स्त्री इस ध्येय से न डिगे इसके लिए हर समाज अपने-अपने तरीके से मातृत्व का महिमामंडन करता है।

मातृत्व में भी पुत्र को जन्म देने वाली स्त्री ज्यादा सम्मान पाती है। हम अपने समाज में भी शास्त्रों से लेकर व्यवहार तक में नववधू को पुत्रवती भव का आशीर्वाद दिए जाने का व्यापक चलन पाते हैं। स्त्री के मानस में बचपन से ही यह धारणा इस कदर जड़ जमा लेती है कि उसे भी विवाह और तत्पश्चात पुत्रवती बनने में ही अपना जन्म और जीवन सार्थक दिखाई देता है। बाँझ और पुत्रहीन स्त्रियाँ हिकारत भरी निगाहों से देखी जाती है। उसे हर रोज, हर पल यह एहसास करा कर हीन ग्रंथि से भर दिया जाता है कि उसका जीवन निरर्थक चला गया।


यहाँ ध्यान देने की ज़रूरत है कि पितृसत्ता के पक्षधर धार्मिक तर्क के सहारे लंबी अवधि तक अपनी नैया खेते रहे, लेकिन ज्ञान-विज्ञान के विकास के साथ वज़ूद में आई वैज्ञानिक दृष्टिकोण के समक्ष जब धार्मिक दृष्टिकोण का प्रभाव मंद पड़ गया तब उन्हें भी अपने बचाव के लिए वैज्ञानिक तर्क गढ़ने पड़े। इसका मतलब यह नहीं कि धार्मिक तर्क पूर्णतः निष्प्रभावी हो गए। हम अपने आस-पास आज भी ऐसे बहुत से लोग पा सकते हैं, जो स्त्री-पुरुष असमानता को ईश्वरीय नियम मानते हैं।


2. शिकारी पुरुष का तर्क


वैज्ञानिक तर्कों की बात करें तो मानवविज्ञानी शेरवुड वाशबर्न और सी. लैंकेस्टर द्वारा प्रस्तुत · शिकारी पुरुष' की धारणा सबसे प्रभावी सिद्ध हुई। उनकी यह धारणा मानव के उद्विकास संबंधी सिद्धांत से जुड़ी हुई है। इस सिद्धांत के प्रणेता चार्ल्स डार्विन थे। सर्वप्रथम डार्विन ने ही यह प्रतिपादित किया कि पृथ्वी पर जीवन का विकास विशुद्ध जैव-रासायनिक प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप हुआ है न कि ईश्वर अथवा उस जैसी किसी अन्य अलौकिक सत्ता के प्रताप से। सबसे पहले एककोशकीय जीव वज़ूद में आए और फिर उसके बाद बहुकोशकीय जीव। ऐसा विकास की लंबी और जटिल प्रक्रिया के तहत हुआ। आज का मानव विकास की इस लंबी श्रृंखला की ही कड़ी है। उसके ठीक पहले वानर आते हैं। कहने का आशय यह कि मानव प्रजाति का विकास वानरों से हुआ। डार्विन के ये विचार उनकी कृतियों ओरिजिन ऑफ स्पिशीज' और 'दी डिस्सेंट ऑफ मैन' में दर्ज हैं। 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में ये कृतियाँ प्रकाशित हुई तो लोगों के बीच सनसनी फैल गई। स्थापित धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ जाने के कारण डार्विन को लोगों का कोप भाजन भी बनना पड़ा, प्रस्थान बिंदु और संदर्भ बिंदु दोनों हो गए।


डार्विन के बाद मानव के विकास की कहानी में बहुत कुछ जुड़ा। हमारे लिए इस कहानी का पहला अध्याय यहाँ मायने रखता है, जिसे शिकार-संग्रह युग या पुरापाषाण युग के नाम से जाना जाता है।

कारण, इस युग में मनुष्य आजीविका के लिए सीधे प्रकृति पर निर्भर था। में


वाशबर्न और लैंकेस्टर का मत है कि केवल पुरुष ही शिकार पर जाया करते थे। स्त्रियाँ उनके साथ शरीक नहीं होती थीं। विकास के क्रम में स्त्रियों के शरीर में महत्वपूर्ण अंदरूनी परिवर्तन हुए। अब वे वर्ष भर गर्भ धारण कर सकती थीं। इसके अलावा, मानव शिशु के अल्पविकसित अवस्था में ही जन्म लेने और अपेक्षाकृत लंबी अवधि तक देखभाल पर निर्भर रहने की उसकी ज़रूरत ने स्त्रियों को बांध-सा दिया था। बड़े शिकार के लिए ज़रूरी बलिष्ठ शरीर और तेज दौड़ सकने की क्षमता उसमें नहीं थी। वह और बच्चे, पुरुष के शिकार पर आश्रित थे। आवास के इर्द-गिर्द जितना संभव हो सकता था, वे कंद मूल फल एकत्र किया करती थीं। शिकार अकेले पुरुष के वश की बात नहीं थी। इसके लिए उन्हें संगठित होकर नित नई परिस्थितियों के मुताबिक नई-नई युक्तियाँ बनानी पड़ती थीं। इसके साथ ही, शिकार के दौरान उनके बीच परस्पर संवाद की ज़रूरत से भाषा विकसित हुई। आवास पर इंतजार कर रही स्त्रियों और बच्चों के लिए मांस लाने की क्रिया ने भावनात्मक और सामाजिक बंधन के विकसित होने का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसलिए, वाशबर्न और लैंकेस्टर इंसानों के जैविक, मनोवैज्ञानिक और आचार-व्यवहार के स्तर पर वानरों से दूर निकल आने का श्रेय उन शिकारी पुरुषों को ही देते हैं। दूसरे शब्दों में, पुरुष के शिकार करने की क्षमता की मानव के उद्विकास में निर्णायक भूमिका रही है।

ये विद्वान मानते हैं शिकार पुरुष की फितरत है। इसके पक्ष में वे यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि आधुनिक मनुष्य भी शिकार पर जाता है, जबकि आजीविका के लिए उसकी ज़रूरत नहीं रह गई है।


शिकारी पुरुष का तर्क पुरुष के आश्रयदाता और मज़बूत होने तथा स्त्री के आश्रित और कमज़ोर होने के पक्ष में पुरापाषाण अवस्था से लेकर आज तक निरंतरता स्थापित करता है। इसके मुताबिक, स्त्रियाँ अपनी प्रजनक क्षमता के कारण ही पिछड़ गई। नतीजतन, यह तर्क वैज्ञानिक होने का दावा करने के बावज़ूद जैविक निर्धारणवाद के दायरे में ही सीमित होकर रह जाता है। इससे स्त्री और पुरुष की सापेक्षिक स्थितियाँ स्वाभाविक और इसलिए अपरिवर्तनीय और असमाप्य होकर रह जाती हैं।