समाज की धारणा - perception of society

समाज की धारणा - perception of society


मार्क्स की सैद्धांतिक दृष्टि से समाज या सामाजिक जगत की चर्चा ऐतिहासिक भौतिकवाद का अंग है। समाज व्यक्तियों का संग्रह है जो एक निश्चित स्थान या भू-भाग पर बसा होता है। समाज के सदस्य अपनी आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए श्रम के द्वारा उत्पादन करते हैं। यह मानव की प्रथम एवं सर्व महत्वपूर्ण ऐतिहासिक क्रिया है। प्रत्येक समाज में उत्पादन की एक शैली होती है। इस शैली के दो पक्ष हैं - प्रथम उत्पादन के साधन एवं शक्तियाँ एवं दूसरा, इनसे लोगों के संबंध एवं लोगों का आपस में संबंध, जो चाहे या अनचाहे बनाना ही पड़ता है। समाज में शक्ति एवं श्रृंखला की राजनैतिक व्यवस्था होती है। मानव संगठन होते हैं। विश्वास, विचार, मूल्य एवं नैतिकता की व्यवस्था होती है। ये सभी तत्व महत्वपूर्ण हैं परंतु उत्पादन की शैली सबसे महत्वपूर्ण है, इसी से समाज का चरित्र तय होता है। मानव की प्रथम ऐतिहासिक घटना भौतिक वस्तुओं का उत्पादन है। ये जरूरी है, अनिवार्य हैं। इसके लिए मानव जो तरीके और कौशल अपनाता है.

उसे ही प्रौद्योगिकी (Technology) कहते हैं। मानव प्रौद्योगिकी के कारण ही मानव है। सभी अन्य पशु प्रकृति से अपनी आवश्यकताओं की वस्तुएँ उसी रूप में अपना लेते हैं।


समाज, विरोधी शक्तियों का गत्यात्मक संतुलन है। समाज में अनेक पक्ष हैं. परंतु विश्लेषण की दृष्टि से दो पक्षों के अलग कर सकते हैं। एक पक्ष समाज की आधार संरचना है, जिसके अंतर्गत उत्पादन की शैली सम्मिलित है और दूसरा पक्ष अधिरचना (super structure) है, जिसमें राजनैतिक संस्थाएँ, विचारधारा, धर्म, मूल्य, परिवार, नातेदारी, नियम, जीवन शैली आदि होती हैं। आधार रचना एवं अधिरचना में द्वंद्वात्मक संबंध होते हैं। मानव जीवन एवं समाज का आधार मानव द्वारा अपने जीवन के साधनों के उत्पन्न करने से बनता है। इस उत्पादन के लिए मानव एक-दूसरे से चाहे या अनचाहे संबंध स्थापित करता है। सामूहिक उत्पादन से एक जीवन शैली उत्पन्न होती है जो मानव के चरित्र और स्वभाव को निर्धारण करती है। मार्क्स के अनुसार जीवन के भौतिक साधनों के उत्पादन से मानव समाज एवं मानव जीवन बनता एवं सँवरता है।