भौतिक यथार्थ , सामाजिक यथार्थ - physical reality, social reality
भौतिक यथार्थ , सामाजिक यथार्थ - physical reality, social reality
भौतिक यथार्थ से संसार का बोध होता है, जिसके बारे में लोग अपनीज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से जानकारी प्राप्त करते हैं। उदाहरण- जब रास्ते पर चलते-चलते हम सामने से आती हुई ट्रक को देखते हैं अथवा बगल में जाते हुए लोगों की उच्च स्वर में चल रही वार्ता को सुनते हैं, तो हम भौतिक वास्तविकताओं का बोध करते हैं और उनके अनुसार रास्ते के बगल में हो जाते हैं तथा शोर की ओर से ध्यान हटा लेते हैं। हमारे व्यवहारों के ये परिवर्तन भौतिक यथार्थ के आधार पर होते हैं। व्यक्ति की जानकारी उसके विश्वास या मत तथा उसके विचारों की वैधता की जांच भौतिक यथार्थ के आधार पर होता है।
अगर कभी-कभी नहीं हो पाता है तो ऐसी स्थिति में मतों या विचारों की जांच सामाजिक यथार्थ के आधार पर होती है।
सामाजिक यथार्थ
सामाजिक यथार्थ का तात्पर्य भ्रष्टाचार के संबंध अन्य लोगों के विचार तथा अभिमत। जिस सीमा तक समाज के अन्य लोग भी भ्रष्टाचार के संबंध में इसी प्रकार का मत रखते हैं, उस सीमा तक व्यक्ति का मत सामाजिक यथार्थ के आधार पर सही और वैद्य है। फेस्टिंगर ने अपने सिद्धांत में सामाजिक यथार्थ को निम्न भागों में बांटा है
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