भारत की राजनितिक विचारधाराएं , राष्ट्रवादी विचारधारा - Political Ideology of India Nationalist Ideology

भारत की राजनितिक विचारधाराएं , राष्ट्रवादी विचारधारा - Political Ideology of India Nationalist Ideology

● राष्ट्रवादी विचारधारा (Nationlist Political Philosophy) 


गोपाल कृष्ण गोखले, लाला लाजपतराय, दादाभाई नौरोजी, बिपिन चंद्र पाल, विवेकानंद, रविंद्रनाथ टैगोर, श्री अरविंद, डॉ. बाबासाहब आंबेडकर, जवाहलाल नेहरु, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आझाद, खान अब्दुल गफ्फार खान आदि विचारक प्रखर भारतीय राष्ट्रवादी माने जाते है। गोपाल कृष्ण गोखले के अनुसार, राष्ट्रवाद का लक्ष्य राष्ट्र के सदस्यों का नैतिक पुनरुत्थान होना चाहिए। लाला लाजपतराय के अनुसार प्रत्येक राष्ट्र को अपने-अपने आदर्श निर्धारित करने और उन्हें कार्यान्वित करने का मूल अधिकार है। तिलक के अनुसार राष्ट्रवाद कोई मूर्त सत्ता नहीं, यह एक विचार या भावना है। राष्ट्रवाद हमें हमारे गौरवशाली इतिहास की याद दिलाता है। बाल गंगाधर तिलक के अनुसार लॉर्ड मेकाले द्वारा प्रेषित पश्चिमी शिक्षा राष्ट्र के भावी हित एवं कल्याण के लिए घातक है।

राष्ट्रिय शिक्षा प्रणाली का निर्माण प्राचीन भारतीय संस्कृति को स्वस्थ और जिवंत के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने पश्चिमी मूल्यों पर आधारित शिक्षा का विरोध किया। भारतीय शिक्षा भारतीय संस्कृति, भारतीय जीवनशैली, विकास के लक्ष्य, भारत की संरचना आदि पर आधारित राष्ट्रिय विकास के लिए शिक्षा का नियोजन, आयोजन एवं क्रियान्वयन किया जाना चाहिए। जवाहरलाल नेहरुजी भारतीय राष्ट्रवाद के सशक्त समर्थक थे। सांस्कृतिक बहुलवाद और संस्लेषण नेहरुजी के राष्ट्रवाद का मूलमंत्र था। नेहरूजी द्वारा रचित 'भारत एक खोज' पुस्तक के अनुसार, राष्ट्रवाद वस्तुतः अतीत की उपलब्धियों परंपराओं और अनुभवों की सामूहिक स्मृति है। आज के युग में राष्ट्रवाद की भावना इतनी सुदृढ़ हो गई है कि, जीतनी पहले कभी नहीं थी। जब कभी कोई संकट पैदा हुआ है, (हमारा) राष्ट्रवाद फिर से उभर कर सामने आया है और लोगो ने अपनी पुराणी परंपराओं में सुख और सुदृढ़ता की तलाश की है। वर्तमान युग की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, अपने खोये हुए अतीत की फिर से खोजा" (ओ.पी.गाबा: राजनीती- चिंतन की रुपरेखा, पृष्ठ सं. 429) नेहरुजी के अनुसार राष्ट्रवाद एक महान शक्ति है। वह विध्वसंक राष्ट्रवाद में नहीं बल्कि रचनात्मक राष्ट्रवाद के विश्वास रखते है। डॉ. बाबासाहब अंबेडकर कहते थे कि, "मै प्रथमतः एवं अंतिमतः भारतीय हूँ।" अपने जात, धर्म, पंथ, संप्रदाय. पक्ष का भारतीयत्व में विलीनीकरण ही सही अर्थों में भारतीय राष्ट्रवाद है।