सामाजिक संज्ञान के पूर्वाग्रह तथा संभावित त्रुटियाँ - Prejudices and Possible Errors of Social Cognition

सामाजिक संज्ञान के पूर्वाग्रह तथा संभावित त्रुटियाँ - Prejudices and Possible Errors of Social Cognition


मनुष्य की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति यह है कि वह निषेधात्मक सूचनाओं के प्रति अपनी संवेदनशीलता अधिक कर लेता है और उसका ध्यान ऐसी सूचनाओं पर अपने आप केंद्रित भी हो जाता है। निषेधात्मक सूचनायें अधिक अवधान पाने के कारण अधिक गहन स्तर पर प्रक्रमित होती हैं और सकारात्मक सूचनाओं की तुलना में सामाजिक संज्ञान को अधिक प्रभावित करती है। किसी व्यक्ति, समूह तथा सामाजिक कार्य-कलाप के संबंध में अधिक वांछनीय सूचनाओं के साथ थोड़ी सी भी निषेधात्मक सूचनाएं व्यक्ति के पूरी संज्ञान को अधिक मात्रा में प्रभावित कर देती हैं। सामाजिक संज्ञान के कुछ प्रमुख पूर्वाग्रहों तथा त्रुटियों भी होती हैं। जो व्यक्तियों को सामाजिक संज्ञान बनाते समय सजग रहने की आवश्यकता है।


सामाजिक निर्णय, अनेक प्रकार की सामाजिक स्थितियों में सूचनाओं को प्राप्त कर लेने के पश्चात उनको इकट्ठा करते समय मनुष्य की कुछ पूर्वधारणाएं होती हैं, जिनके परिप्रेक्ष्य में सूचनाओं को वह ग्रहण करता है। जो सूचनाएं व्यक्ति के पूर्व के धारणाओं से संगत होती हैं, उन्हें वह सहजता से ग्रहण कर लेता है,

किंतु जो सूचनाएं असंगत होती हैं, उनके यथार्थ को सरलता से स्वीकार नहीं करता। अपनी पूर्व की धारणाओं की पुष्टि करने वाली सूचनाओं को व्यक्ति प्रथम दृष्टि में स्वीकार कर लेता है किंतु असंगत सूचनाओं को गलत मानते हुए व्यक्ति अधिक सावधानी से उनका मूल्यांकन भी करता है।


सामाजिक संज्ञान तथा अप्रत्याशित सूचनाएं को लेकर फिस्के एवं न्यूवर्ग (1990)ने एक अध्ययन में कहा कि ऐसी अप्रत्याशित सूचनाएं अधिक एकाग्रता से ग्रहण किए जाने के परिणाम स्वरूप दीर्घकालिक स्मृति में प्रबलता के साथ भंडारी हो जाएंगी और बाद में किये जाने वाले सामाजिक अनुमान को अधिक रूप से प्रभावित करने की वाली सिद्ध होगी।


सामाजिक संज्ञान पर भावनात्मक मनोदशा के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए आइसेन एवं डावमैन (1984) यह प्रदर्शित किया है कि दुख एवं अन्य निषेधात्मक मनःस्थितियों की तुलना में सुख जैसे धनात्मक मनःस्थिति में व्यक्ति अधिक विस्तार से सूचनाओं को स्मृति के विभिन्न वर्गों के अंतर्गत संगठित करता है।

इनके अतिरिक्त अन्य अध्ययनों से भी ज्ञात हुआ है कि धनात्मक मनःस्थितियों में होने पर लोग सभी प्रकार के टास्कों का निष्पादन अधिक सफलता से करते हैं और सृजनशीलता प्रदर्शित करते हैं। धनात्मक मन:स्थिति में होने पर लोग समस्याओं के समाधान में भी नए ढंग से सोचते हैं। इस प्रकार मनुष्य की भावनाए उसके सामाजिक संज्ञान एवं निर्णय को प्रभावित करती है। व्यक्ति की मनोदशा सामाजिक सूचनाओं की प्रक्रिया के ढंग को प्रभावित करती हैं। सूचनाओं की प्रक्रिया का ढंग, व्यक्ति के सामाजिक संज्ञान अनुमान या निर्णय को भी प्रभावित करता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि सामाजिक संज्ञान में व्यक्ति की भावनाएं प्रमुख भूमिका का निर्वहन करती है।