आर्थिक व्यवस्था - Primitive Economy
आर्थिक व्यवस्था - Primitive Economy
मनुष्य की तीन आधारभूत एवं प्राथमिक आवश्यकताएं होती है भोजन, वस्त्र एवं मकान जिनको कार्ल मार्क्स ने जीवन के आवश्यक भौतिक मूल्य कहा। इन्हीं को जुटाने के प्रयास में मनुष्य विभिन्न समूहों से समझौता करता है और इस प्रकार उत्पादन, उपभोग, व्यय तथा वितरण की व्यवस्था प्रारंभ होती हैं जो अंततः मनुष्य के आर्थिक जीवन को संचालित करती हैं। संक्षेप में इसी को आर्थिक व्यवस्था कहते हैं।
जनजातियों से संबंधित आर्थिक संगठन का अध्ययन सर्वप्रथम ट्रोब्रीयांड दीप वासियों का ब्रिटिश मानवशास्त्री मैलिनोवस्की (1922) में किया गया था। इसके पश्चात रेमंड फर्थ ने न्यूजीलैंड की माओरी जनजाति तथा पॉलिनेशियाई द्वीप समूह में स्थित जनजातियों के आर्थिक संगठनों का प्रकार्यात्मक विश्लेषण किया। भारतीय जनजातियों के आर्थिक संगठन संबंधी अध्ययन सर्वप्रथम दो अर्थशास्त्रियों डी. एस. नाग एवं आर.पी. सक्सेना ने किया। डी.एस. नाग ने मध्य प्रदेश की बैगा जनजाति तथा आर. पी. सक्सेना ने मध्य प्रदेश की अन्य जनजातियों का एवं एल.पी. विद्यार्थी ने मलेर जनजाति बिहार के आर्थिक संगठन का अध्ययन किया जिन्हें आदिम अर्थव्यवस्था नाम से जाना गया।
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