बौद्ध धर्म के सिद्धांत और विलक्षणताएं - The principles and peculiarities of Buddhism
बौद्ध धर्म के सिद्धांत और विलक्षणताएं - The principles and peculiarities of Buddhism
बुद्ध एक बड़े व्यावहारिक सुधारक के रूप में जाने जाते हैं तथा उनका ज्ञान और दर्शन वास्तविकता के अंचल पर आधारित था। बुद्ध उन निरर्थक वाद-विवादों में नहीं पड़े, जो तत्कालीन समय में आत्मा तथा परमात्मा के मेल आदि से संबंधित थे। उनकी वैचारिकी सांसारिक समस्याओं के प्रति आकृष्ट रही। उन्होंने बताया कि यह संसार दुखमय है तथा इच्छाएं, लालसा, काम आदि ही दुख का कारण होती हैं। यदि इन पर विजय प्राप्त कर लिया जाए तो निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है। गौतम बुद्ध ने दुख से मुक्त होने के संबंध में अष्टांगिक मार्ग/अष्टविध साधन बताए हैं -
अष्टांगिक मार्ग
1 सम्यक् दृष्टि
2 सम्यक् वाक्
3 सम्यक् आजीव
4 सम्यक् स्मृति
5 सम्यक् संकल्प
6 सम्यक कर्मात
7 सम्यक् व्यायाम
8 सम्यक समाधि
यदि कोई व्यक्ति पूरी निष्ठा से इन आठ मार्गों का अनुसरण अपने जीवन में करे तो वह बिना किसी बाधा और सहायता के अपने इच्छित लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। बुद्ध का मानना था कि हमें ना ही अधिक विलास पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए और ना ही अधिक संयम को बनाए रखना चाहिए।
वे सदैव से ही मध्य के मार्ग को अपनाने पर ज़ोर देते रहे हैं। बुद्ध ने अपने अनुयायियों के लिए आचार संहिता निर्मित की है, जो उनके जीवन और व्यक्तित्व को समृद्ध करने में सहायक सिद्ध होते हैं। ए आचार नियम इस प्रकार हैं-
1. व्यक्ति को पराए धन के प्रति लोभ की इच्छा नहीं रखनी चाहिए।
b. व्यक्ति को हिंसा का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए।
c. व्यक्ति को नशे आदि से दूर रहना चाहिए।
d. व्यक्ति को कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए।
c. व्यक्ति को दुराचार से दूर रहना चाहिए।
समान्यतः सभी धर्मों में उक्त लिखित बिंदुओं के प्रति निषेध की भावना पाई जाती है।
बौद्ध धर्म में ईश्वर और आत्मा की संकल्पना नहीं पाई जाती है तथा यह बात भारत के धर्म के इतिहास में किसी क्रांति से कम नहीं है। अपने आरंभिक समय में बौद्ध धर्म किसी प्रकार के दार्शनिक वाद-विवादों में नहीं पड़ा और यही कारण है कि इसने सामान्य लोगों के ध्यान को अपनी ओर आकृष्ट करने में सफलता प्राप्त की। इसे ज्यादा मात्रा में निम्न वर्ण से संबंधित लोगों द्वारा स्वीकार किया गया. ऐसा इसलिए था क्योंकि इसमें वर्ण व्यवस्था का विरोध प्रत्यक्ष तौर पर दिखाई देता है। यहाँ सभी के लिए पर्याप्त स्वतंत्रता और समानता देखने को मिलती है, चाहे वह किसी जाति से संबंधित हो। इसमें स्त्रियों को भी पुरुषों के समान ही अधिकार प्रदान किए गए हैं। बौद्ध धर्म को अपनाने वाले लोगों में वैदिक क्षेत्र से इतर के लोग अधिक मात्रा में हैं। इन लोगों ने बड़ी ही आसानी से इस धर्म का अनुसरण किया।
बुद्ध का व्यक्तित्व और धर्मोपदेश करने की प्रणाली दोनों ही बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में सहायक सिद्ध हुई। बुद्ध का मानना था कि भलाई के द्वारा ही बुराई को नष्ट किया जा सकता है
तथा प्रेम की सहायता से ही घृणा को दूर किया जा सकता है। किसी की निंदा और कटु शब्दों से भी वे क्रोधित नहीं होते थे। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी वे शांत और सहज बने रहते थे तथा उन परिस्थितियों का सामना अपनी चतुरता और बौद्धिक कुशलता से करते थे।
गौतम बुद्ध ने बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए बौद्ध संघ की स्थापना की। इस संघ में कोई व्यक्ति बिना किसी जाति अथवा लिंग के भेदभाव के प्रवेश प्राप्त कर सकता था। अनुयायियों के लिए एकमात्र शर्त यह थी कि वह संघ के नियमों का पालन पूरी निष्ठा से करेगा। संघ के अधीन सुव्यवस्थित प्रचार व्यवस्था होने के कारण बौद्ध धर्म ने गौतम बुद्ध के जीवनकाल में ही तेजी पकड़ी। तत्कालीन समय में मगध, कोशल और कौशांबी के राजाओं तथा अनेक गणराज्यों व उनकी जनता ने बौद्ध धर्म को अंगीकार किया। वर्तमान समय में भी श्रीलंका, बर्मा, तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचलन तथा चीन और जापान के कुछ भागों में बौद्ध धर्म अनुयाई रहते हैं।
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