सामाजिक परिवर्तन के सिद्धांत - principles of social change
सामाजिक परिवर्तन के सिद्धांत - principles of social change
उद्वविकासवादी के प्रमुख प्रवर्तक हर्बर्ट स्पेन्सर हैं जिनके अनुसार सामाजिक परिवर्तन धीरे-धीरे, सरल से जटिल की और कुछ निश्चित स्तरों से गुजरता हुआ होता है। संरचनात्मक कार्यात्मक सिद्धांत के प्रवर्तकों में दुखींम, वेबर, पार्सन्स, मर्टन आदि विद्वानों का उल्लेख किया जा सकता है। इन विद्वानों के मतानुसार सामाजिक संरचना का निर्माण करने वाली प्रत्येक इकाई का अपना एक प्रकार्य होता है और यह प्रकार्य उसके अस्तित्व को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होता है। इस प्रकार सामाजिक सरंचना और इसको बनाने वाली इकाइयों (संस्थाओं, समूहों आदि) के बीच एक प्रकार्यात्मक संबंध होता है और इसीलिए इन प्रकार्यों में जब परिवर्तन होता है तो सामाजिक संरचना भी उसी अनुसार बदल जाती है।
सामाजिक ढाँचे में परिवर्तन को ही सामाजिक परिवर्तन कहते हैं। आगर्बन द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक विलम्बना' (Cultural Lag) के सिद्धान्त को भी कुछ विद्वान इसी श्रेणी में सम्मिलित करते हैं। संघर्ष या द्वन्द्व के सिद्धांत के समर्थक कार्ल मार्क्स, कोजर, डेहर डोर्फ़ आदि हैं। इनके सिद्धान्तों का सार तत्व यह है कि सामाजिक जीवन में होने वाले परिवर्तन का प्रमुख आधार समाज में मौजूद दो विरोधी तत्वों या शक्तियों के बीच होने वाला संघर्ष या द्वन्द्व है। चक्रीय सिद्धान्त के प्रमुख प्रवर्तक स्पेगलट, परेटो आदि हैं जो कि परिवर्तन की दिशा को चक्र की भाँति मानते हैं।
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