समाजशास्त्र के सिद्धांत - principles of sociology

 समाजशास्त्र के सिद्धांत - principles of sociology


समाजशास्त्र के सिद्धांतों को मुख्य रूप से पाँच भागों में विभाजित कर सकते है। जो निम्नानुसार है


1. क्लासिकी समाजशास्त्र सिद्धांत


2. आगस्त काम्टे का सिद्धांत


3. दुर्खाइम का सिद्धांत


4. मार्क्सवादी सिद्धांत


5. वेबर का सिद्धांत


6. पार्सन्स का कार्य सिद्धांत


7. राबर्ट के मार्टम का सिद्धांत


क्लासिकी समाजशास्त्रीय सिद्धांत इस सिद्धांत में यह विचार उभर कर सामने आया कि समाज का वैज्ञानिक अध्ययन म्भव है। समाज किस प्रकार स्वयं की पहचान बनाता है ? इसका वैज्ञानिक अध्ययन कैसे किया जा सकता है? ऐसे सभी प्रश्न इस सिद्धांत में सम्मलित थे।


आगस्त काम्टे का सिद्धांत - समाजशास्त्र को अलग एवं स्वतंत्र विषय के रूप में स्थापित करने के लिए आगस्त काम्ट ने समाजशास्त्र को दो भागों में बाट दिया सामाजिक संख्यिकी एवं सामाजिक गतिशीलता। सामाजिक सांख्यिकी समाज में संतुलन से संबंधित है जबकि सामाजिक गतिशीलता का संबंध समाज में परिवर्तन से उनका मानना था कि समाजशास्त्र को गणित, जीव विज्ञान या राजनीतिक अर्थव्यवस्था की तरह परिसीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने त्रि-चरणों के नियम की बात की धर्मविज्ञान, आलौकिक एवं वैज्ञानिका उनके अनुसार प्रत्येक समाज तीनचरणों से गुजरता है। धर्म विज्ञान में प्रत्येक घटना को ईश्वर से जोड़ा जाता है। अलौकिक अवस्था जिसका अर्थ होता है बदलाव तथा तीसरे चरण को वैज्ञानिक चरण कहते है। जहाँ समाज के सन्दर्भ में ईश्वरीय शक्ति तथा अलौकिकता को पर्याप्त नहीं माना जाता।


दुर्खाइम का सिद्धांत - फांस के सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री इमाइल दुर्खाइम ने अगस्त काम्टे द्वारा स्थापित प्रत्यक्षवाद की परम्परा को कायम रखा। दुर्खाइम ने अगस्त काम्टे के छोड़े गये काम से अपना काम प्रारंभ किया। उन्होंने कहा कि समाज के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए प्राकृतिक विज्ञान के नियमों को लागू किया जा सकता है। उन्होंने अपनी पुस्तक द रूल ऑफ सोयियोलॉजिकल मैथड में अपने समाजशास्त्रीय उपागम को खोल कर स्पष्ट किया। दुर्खाइम सामाजिक विश्लेषण विधि पर जोर देते है जिसे वे ‘सामाजिक तथ्य' कहते है। इसलिए में पहली बार समाजशास्त्रीय सूत्रीकरण दुर्खाइम के सामाजिक तथ्य के विचार से शुरू हुये।


मार्क्सवादी सिद्धांत - जर्मनी के दर्शनशास्त्री कार्ल मार्क्स एक समाजिक विज्ञानी के साथ-साथ समाजशास्त्री भी थे। मार्क्स ने कुछ बुनियादी सूत्र प्रस्तुत किये इन बुनियादी सूत्रों में शामिल हैं - ने ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग एवं वर्ग संघष्ज्ञ, अधिशेष मूल्य का सिद्धांत एवं अलगवाद। मार्क्स के सूत्रों ने समाजशास्त्रीय विश्लेषण के लिए नई दिशा दिखाई। मार्क्स की विधि में तर्कशास्त्र के सिद्धांत को शामिल किया गया जिसकी पहले किसी समाजशास्त्री ने चर्चा नहीं की। मार्क्स के सिद्धांत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण था ‘द्वद्वात्मक विधि इसकी सहायता से उन्होंने समाज की भौतिकवादी व्याख्या थी।


मैक्स बेवर का सिद्धांत - जर्मनी के सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स बेवर समाजशास्त्र में क्लासिकी युग के थे। मैक्स बेवर ने अपने नीजि शब्दों एवं तरीकों से समाजशास्त्र को परिभाषित किया। उनके द्वारा निर्मित 'वर्सिटीहेन' जैसे सूत्रों के लिए अभी भी स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। मैक्स बेवर के प्रमुख सूत्र है सोशल एक्शन, बर्सिटिहोनया फिनौमिलौजी। मैक्स बेवर ने समाजशास्त्र में वस्तुनिष्ठता बनाम विषय निष्ठता संबंधी मुद्दों के बारे में लिखा है।


पार्सन्स का कार्य सिद्धांत- टॉलकोट पार्सन्स अमेरिका के प्रसिद्ध समाजशास्त्री थे उनका सामाजिक कार्य के सिद्धांत में महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने रैफरेंस के एक्शन फ्रेम, सामाजिक पद्धति और विकासवाद पर चर्चा की। उन्होंने द सोशल स्टिम में क्रिया के तीन अनिवार्य घटक व्यक्तित्व-व्यवस्था सामाजिक व्यवस्था. और सांस्कृतिक व्यवस्था बतलायें। एक अन्य पेपर में उन्होंने एगिल (AGIL) रूपावली" को स्पष्ट किया जिसके अनुसार ए का अर्थ है अनुकूलन जी का अर्थ है लक्ष्य प्राप्ति, आडू का समेकन और एल का अर्थ है अव्यक्तता। उनकी एक अन्य महत्वपूर्ण रचना है

“पैटर्न चर योजना" राबर्ट के मार्टम का सिद्धांत राबर्ट के मार्टन ने सिद्धांत एवं तथ्य के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया। इन्होंने प्रकार्यात्मक सिद्धांत को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। इसमें उन्होंने तीन अवधारणों का हवाला दिया है। ये है- 


1. समाज की प्रकार्यात्मक एकता की अभिधारणा 


2. सार्वभौमिक प्रकार्यवाद की अवधारणा 


3. अपरिहार्यता की अवधारणा