भारतीय समाज में सामूहिक द्वंद को उत्पन्न करने वाली समस्याएँ - Problems causing mass conflict in Indian society

भारतीय समाज में सामूहिक द्वंद को उत्पन्न करने वाली समस्याएँ - Problems causing mass conflict in Indian society


प्रत्येक समाज के कुछ सामाजिक समस्याएं होती है जिससे सामाजिक संघर्ष या द्वंद उत्पन्न होता है। भारतीय समाज में भी कुछ ऐसी सामाजिक समस्याएं हैं जिनसे सामाजिक संघर्ष की उत्पत्ति होती है। इन सामाजिक समस्याओं में निम्नांकित प्रमुख है-


1- जनजाति समस्या


2- जाति समस्या


3- सांप्रदायिक समस्या


4- मजदूर मालिक समस्या


5- छात्र समस्या


6- भूस्वामी किराएदार समस्या


7- लाभान्वित वर्ग एवं अलाभान्वित वर्ग का टकराव


8- भाषा समस्या


9- नौकरी की समस्या


अंतर सामूहिक द्वंद समाधान की विधियां सामाजिक मनोवैज्ञानिकों द्वारा सामूहिक संघर्ष के


समाधान की कुछ विधियों का वर्णन किया गया है जिनमें निम्नांकित प्रमुख हैं।


1- पारस्परिक लाभदायक लक्ष


2- समझौता


3- विशेष मानक का उपयोग


4- प्रति सामाजिक व्यवहार


5- वैज्ञानिक उपागम का उपयोग


6- द्वीविमीय मॉडल का उपयोग 


7- तीसरी पार्टी से संपर्क


1- पारस्परिक लाभदायक लक्ष्य - सामूहिक संघर्ष को समाप्त करने का यह एक सामान्य तरीका है कि दोनों समूहों या पार्टियों के बीच एक पारस्परिक लाभदायक लक्ष्य को रखा जाए।

ऐसे लक्ष्य के होने पर दोनों समूह आपस में मिलकर काम करेंगे तथा एक दूसरे की कठिनाइयों के समाधान में हाथ बटा कर समूह संघर्ष को कम करेंगे। पारस्परिक लाभदायक लक्ष्य के होने पर सामूहिक संघर्ष कम हो जाता है। 


2- समझौता- दोनों प्रतिद्वंदी समूहों के बीच समझौता करा देने से भी समूह संघर्ष में कमी आ जाती है। Simmel (1957) का मत यह है कि समझौता एक ऐसी प्रविधि है जिसमें दोनों समूह में से कोई भी समूह में को ना लाभ होता है या ना हानि होती है फलस्वरूप, उसमें संघर्ष अपने आप कमने लगता है। 


3- विशेष मानक का उपयोग - व्यक्तियों के दो समूहों के बीच का संघर्ष एक विशेष मानक विकसित करके भी किया जाता है जिनमें दो समूह द्वारा एक मानक बनाकर बीच का संघर्ष दूर किया जाता है।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार दोनों समूहों को एक दूसरे को प्रभावित करने की क्षमता होती है और उन दोनों में उस क्षमता के प्रयोग की लालसा होती हैं तो वैसी परिस्थिति में दोनों समूह या पार्टी मिलकर एक नया मानक विकसित कर अपने बीच के संघर्ष को कम करते हैं।


4- प्रति सामाजिक व्यवहार - प्रति सामाजिक व्यवहार से वैसे व्यवहार से होता है अन्य व्यक्तियों के लिए धनात्मक भाव उत्पन्न करता है। जब एक व्यक्ति या समूह दूसरे व्यक्ति या समूह के प्रति किसी तरह का प्रति सामाजिक व्यवहार करता है, तो इससे सामूहिक इंद में अपने आप कमी आ जाती है। 


5- वैज्ञानिक उपागम का उपयोग- इसमें निम्नांकित तीन उपागम प्रमुख हैं -


(i) जीत हार उपागम


(ii) हार हार उपागम


(iii) हार जीत उपागम


6- द्वीविमीय मॉडल का उपयोग - सामूहिक संघर्ष को कम करने के लिए समाज मनोवैज्ञानिकों द्वारा एक द्वीविमीय मॉडल का विकास किया गया है। इस मॉडल के अनुसार, सामूहिक संघर्ष समाधान में दो विभिन्न आयाम होते हैं जो महत्वपूर्ण होते हैं। वे दो आयाम है निश्चय आत्मकता तथा सहयोगीता । निश्चयआत्मकता मैं एक पार्टी या समूह अपनी इच्छा या अभीप्रेरणा की तुष्टि की इच्छा व्यक्त करता है जबकि सं सहयोगिता में पार्टी या समूह दूसरे पार्टियां समूह की इच्छा या अभीप्रेरण की पुष्टि करने का भी अधिक से अधिक ख्याल रखता है।


7- तीसरी पार्टी से संपर्क- समाधान के इस तरीके में दोनों व्यक्ति या पार्टी संघर्ष के संवेगीक पहलू तथा मौलिक संबंध के बारे में खोजबीन करता है तथा सर्जनात्मक समस्या समाधान ढूंढने का प्रयास करता है।

भारतीय संदर्भ में सामूहिक संघर्ष का समाधान भारत एक विशाल देश है जिसमें कई तरह के समूह संघर्ष या सामाजिक संघर्ष होते रहते हैं। इन संघर्षों का समाधान यद्यपि उपर्युक्त तरीकों से बहुत हद तक संभव है, फिर भी इन समस्याओं का समाधान करने के लिए कुछ विशेष उपायों पर भारतीय मनोवैज्ञानिकों ने बल डाला है। इन उपायों का वर्णन निम्नांकित है।


1- सांप्रदायिक संघर्ष का समाधान - भारत जैसे देश में हिंदू और मुस्लिम के बीच सांप्रदायिक घ सबसे अधिक प्रमुख हैं। इस तरह के संघर्ष का समाधान का संबंध अल्पसंख्यक समस्या से है क्योंकि मुस्लिम की संख्या भारत में हिंदुओं की संख्या से काफी कम है। इस तरह के संघर्ष को दूर करने के लिए मुस्लिम भाइयों को उचित शिक्षा, संसद में तथा राज्य के विधान मंडलों में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व, उर्दू को पर्याप्त दर्जा देना आदि को प्रधान बताया गया है।


2- जनजातीय संघर्ष का समाधान - जनजातियों के मन में क्या विश्वास हो गया है कि उनकी आर्थिक एवं शैक्षिक पिछड़ेपन अब दूर नहीं हो सकता जब तक कि उनका अलग एवं स्वतंत्र पहचान ना हो।

सरकार को उनके इस विश्वास को दूर करना होगा तथा उनमें एक नया विश्वास उत्पन्न करना होगा। 


3- जातीय संघर्ष का समाधान- इस संघर्ष को दूर करने के लिए शज्ञ ने कई तरह के सुझाव दिए हैं जैसे के पिछड़ी जाति तथा हरिजनों को शिक्षित करना, उन्हें आर्थिक समानता दिलाना, सरकारी नौकरी में आरक्षण दिलाना आदि प्रमुख हैं। 


4- छात्र संघर्ष का समाधान- इस संघर्ष मनोवृत्ति को दूर करने के लिए उनके कुंठा तथा चिंता को दूर करना होगा । उनकी शिक्षा रोजगार उन्मुख की होनी चाहिए।


5- श्रमिक मालिक संघर्ष का समाधान- इस संघर्ष को दूर करने के लिए श्रमिकों के सामाजिक आर्थिक स्तर को ऊंचा करना होगा। इसके लिए उन्हें उचित शिक्षा, उचित मजदूरी तथा अपने कार्य के वातावरण में सहभागिता आवश्यक है।