मुस्लिम विवाह से संबंधित समस्याएँ - Problems Connected with Muslim Marriage
मुस्लिम विवाह से संबंधित समस्याएँ - Problems Connected with Muslim Marriage
मुस्लिम संस्थाओं एवं सामाजिक व्यवस्थाओं पर सनातनी अरबी व्यवस्थाओं का प्रभाव पड़ा है आज भी यह प्रभाव दिखलाई पड़ता है किंतु मुस्लिम विवाह का परंपरागत स्वरुप बदल रहा है। पुरुषों की स्वेच्छाचारिता पर कुछ नियंत्रण लगाये गये हैं। स्त्रियों की स्थिति कुछ ऊँची उठाई जा रही है। उन्हें विवाह, परिवार एवं संपत्ति के क्षेत्र में अनेक अधिकार प्रदान किए गए हैं। शरीयत अधिनियम, 1937 व मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 पारित किये गये हैं। साथ ही मुस्लिम विवाह की प्रमुख बात यह है कि इसे एक सामाजिक समझौता माना गया है, धार्मिक संस्कार नहीं। अतः जब चाहे तब स्त्री पुरुष विवाह-विच्छेद कर सकते हैं। इससे यह प्रतीत होता है कि मुस्लिम विवाह काफी सरल है और उसमें कोई समस्या नहीं है, किंतु यहह तस्वीर का एक पहलू है। इसका दूसरा पहलू भी है। व्यावहारिक दृष्टि से आज मुस्लिम विवाह भी हिंदू विवाह के समान ही अनेक गम्भीर समस्याओं का शिकार बनता जा रहा है। कुछ प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित प्रकार से हैं -
1. ‘मेहर’ की समस्या मुस्लिम समाज में मेहर की प्रथा विकराल रुप ग्रहण कर चुकी है। मुस्लिम पक्ष को मेहर की धनराशि दे दी जाती है रा वधूपक्ष द्वा-विवाह तभी वैध माना जाता है जब वर अथवा देने का वायदा किया जाता है।
वर्तमान समय में मेहर की प्रथा अभिशाप बनती जा रही है। आज मेहर की राशि दिन-रात चौगुनी गति से बढ़ती जा रही है। इससे कई मुसलमान, जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होती है, वैवाहिक संबंध स्थापित करने से वंचित रह जाते हैं व धनाढ्य लोगों का ही विवाह पर एकाधिकार बन जाता है। साथ ही इससे बेमेल विवाह को भी प्रोत्साहन मिलता है।
2. बहुपत्नी विवाह प्रथा- मुस्लिम समाज में वैधानिक दृष्टि से एक पुरुष को चार स्त्रियों से विवाह करने की स्वीकृति प्राप्त है। इससे पुरुषों की स्वेच्छाचारिता बढ़ जाती है, वे तानाशाह बन जाते हैं और स्त्रियों पर अत्याचार किए जाते हैं। उनके प्रति भेदभाव बढ़ता जाता है, परिणामस्वरूप उन्हें पत्नीत्व का वास्तविक सुख नहीं मिल पाता। बहुपत्नी प्रथा के कारण ही पारिवारिक वातावरण कलुषित हो जाता है। वहाँ आये दिन ईर्ष्या, द्वेष, मनमुटाव लड़ाईझगड़े पाये जाते हैं। स्त्रियों की - सामाजिक, आर्थिक स्थिति भी निम्न हो जाती है। अधिक पत्नियाँ तथा अधिक सन्तान बहुधा परिवार पर आर्थिक बोझ भी बन जाती है। ऐसी दशा में उनके रहनसहन का स्तर गिरता है-, उनके बालकों का चहुँमुखी विकास अवरुद्ध हो जाता है।
3. बाल विवाह की समस्या विवाह से संबंधित एक महत्वपूर्ण समस्या बाल-विवाह की भी है। मुस्लिम संस्कृति का हिन्छू संस्कृति से लम्बे समय से सम्पर्क के कारण मुस्लिम संस्कृति में भी बाल-विवाह की कुप्रथा प्रचलित हो गयी। इस दुष्प्रथा के कारण स्त्रियों का स्वास्थ्य गिरा रहता है. दुर्बल सन्तानों का जन्म होता है, पारिवारिक सामंजस्य स्थापित करने में कठिनाई रहती है। साथ ही जनसंख्या वृद्धि को भी प्रोत्साहन मिलता है। लेकिन मुस्लिम विवाह की एक शर्त के अनुसार यदि 15 वर्ष से कम आयु में विवाह किया जाय तो बालिग होने पर वर-वधू अपने विवाह को समाप्त भी कर सकते हैं।
4. पर्दा प्रथा की समस्या :- मुस्लिम विवाह की एक समस्या पर्दा-प्रथा है। मुस्लिम स्त्रियों को घर में बड़े-बूढ़े से, नाते रिश्तेदारों से पर्दा करना पड़ता है। उन्हें घर से बाहर निकलते समय बुरका ओढ़ना पड़ता है, इससे स्त्रियों की निम्न स्थिति रहती है, उनकी समुचित शिक्षा-दीक्षा नहीं हो पाती, व्यक्तित्व का स्वस्थ व सन्तुलित विकास नहीं हो पाता, वे केवल घर की चारदीवारी तक ही सीमित रह जाती हैं।
5. स्त्रियों की असंतोषजनक स्थिति :- हिंदू स्त्रियों की भाँति मुस्लिमम स्त्रियों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं कहीं जा सकती है। अशिक्षा, संयुक्त परिवार प्रथा, पर्दा प्रथा, बहुपत्नी प्रथा एवं आर्थिक निर्भरता के कारण स्त्रियाँ अपने अधिकार का लाभ नहीं उठा पातीं। स्त्रियों के सारे अधिकार छील लिये गये हैं और पर्दा प्रथा की आड़ में उन्हें जनान खाने में कैद करके रख दिया गया है। परिवार संबंधी वास्तविक संपत्ति तो पुरुषों के हाथ में केंद्रित रहती है और स्त्रियों को सेविका की ही भूमिका आजीवन निभानी पड़ती है।
6. वैवाहिक अधिकारों की अव्यावहारिकता :- मुस्लिम स्त्रियों को विवाह से संबंधित अनेक अधिकार तो दिए गए हैं, परंतु वे केवल बाहरी दिखावा मात्र हैं, व्यावहारिक दृष्टि से उनका उपयोग करना कठिन है। स्त्रियों से विवाह के पूर्व स्वीकृति ली जाती है किंतु वह एक औपचारिकता है, उसे माता-पिता की इच्छा के अनुसार स्वीकृति देनी ही पड़ती है। मेहर की राशि पर स्त्री का नहीं वरन् परिवार का ही अधिकार होता है।
विधवा स्त्री को पुनर्विवाह का अधिकार तो है किंतु ऐसी स्त्री समाज में हीन दृष्टि से देखी जाती है। व्यवहार में तलाक के अधिकार का भी स्त्रियों द्वारा कम ही उपयोग किया जाता है।
7. अस्थायी विवाह :- मुसलमानों में विवाह से संबंधित एक समस्या यह है कि उनमें अस्थायी विवाह भी होते हैं जिसे 'मुताह' (Mutah) कहते हैं। ऐसे विवाह से वैश्यावृत्ति, यौन अनैतिकता एवं बहुपत्नी विवाह जैसी समस्याएँ जन्म लेती हैं। साथ ही साथ पारिवारिक संगठन भी सन्तुलित नहीं रह पाता। मुहम्मद साहब ने भी ऐसे विवाह को वैश्यावृत्ति की बहिन कहा है।
8. अधिक जनसंख्या :- मुस्लिम समाज में प्रचलित बहुपत्नी विवाह व बाल विवाह की प्रथा के कारण अधिक संतानोत्पत्ति की समस्या उत्पन्न होती है। बाल विवाह के कारण सन्तान अल्पायु में ही होना प्रारम्भ हो जाती है और देश की जनसंख्या बढ़ती जाती है जबकि वर्तमान समय में जनसंख्या की वृद्धि एक अत्यन्त गम्भीर समस्या है।
9. आर्थिक कठिनाईयाँ :- मुस्लिम विवाह पद्धति के कारण कई बार स्त्री पुरुषों को आर्थिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। मुस्लिम विवाह में मेहर देना अनिवार्य होता है। अतः यदि पुरुष की आर्थिक स्थिति पहले ही कमजोर हो और अल्प बचत भी वह मेहर के रुप में दे दे तो बाद में उसे आर्थिक अभाव का सामना करना पड़ता है। इसी प्रकार बहुपत्नी प्रथा के कारण भी परिवार में अधिक स्त्रियों व अधिक सन्तानों के होने से उनके भरण-पोषण व शिक्षा-दीक्षा की समस्या आती है।
10. संविदात्मक विवाह :- मुस्लिम समाज में विवाह का स्वरुप संविदा या सामाजिक समझौते का है। इसका मुख्य लक्ष्य संतानोत्पत्ति तथा वैध यौन संबंधों को धार्मिक-सामाजिक मान्यता प्रदान करना है। मुस्लिम विवाह कानून के अनुसार भी स्त्री-पुरुष के बीच किया गया वह बिना शर्त का संविदा (Unconditional Contract) है जिसका उद्देश्य संतानोत्पत्ति कर बच्चों को वैध रुप प्रदान करना है। इनमें विवाह एक स्थायी बन्धन न होकर कभी भी तोड़ा जा सकने वाला समझौता मात्र होता है। इसी कारण मुस्लिम समाज में बहुपत्नी प्रथा, तलाक की प्रथा, मेहर की प्रथा, विधवा पुनर्विवाह की स्वीकृति व स्त्रियों की निम्न दा जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं।
11. सरल तालक पद्धति :- मुस्लिम विवाह से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण समस्या विवह-विच्छेद की है। इसमें जब चाहे तब पति पत्नी तलाक ले सकते व दे सकते हैं। सर विलियम म्योर ने लिखा है कि, "मुहम्मद साहब ने जो स्थिति स्त्री के लिए निर्धारित की वह निम्न कोटि की है और उनके अनुसार स्त्री के भाग्य में केवल अपने स्वामी की सेवा करना लिखा है और वह भी उस स्वामी की जो बिना कोई कारण बतलाये तथा बिना एक घण्टे की पूर्व सूचना दिए पत्नी को अलग कर सककता है। साथ ही तलाक से सम्बंधित अधिकार एक तरफ है। इस पूरे खेल की बागडोर पुरुष के हाथ में रहती है। पुरुष जब चाहे तब बिना बताये तीन बार तलाक शब्द के उच्चारण मात्र से ही पत्नी को तलाक दे सकता है। यद्यपि पुरुष के इस वर्चस्व को 1939 के अधिनियम द्वारा समाप्त किया गया है और कुछ परिस्थितियों में स्त्रियों को भी तलाक देने का अधिकार दिया गया है, परंतु व्यावहारिक रूप से स्त्रियों द्वारा तलाक कम ही दिया जाता है। इस सरल तलाक पद्धति के कारण ही स्त्रियों को सदैव पुरुषों की दासी बनकर रहना पड़ता है। साथ ही स्त्रियों की निम्न स्थिति के लिए सरल तलाक पद्धति ही प्रमुखतः उत्तरदायी है।
उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि मुस्लिम विवाह पद्धति के कारण आज सम्पूर्ण मुस्लिम समाज अनेक गम्भीर दुष्परिणामों से पीड़ित है। प्रमुखतः बहुपत्नी विवाह, बाल विवाह विवाह प्रथा, मेहर प्रथा, सरल विवाह-विच्छेद पद्धति, पुरुषों की स्वेच्छाचारिता, स्त्रियों की निम्न दशा अधिक संतानोत्पत्ति, आर्थिक दबाव आदि समस्याओं का मुस्लिम समाज को सामना करना पड़ रहा है। यद्यपि समय परिवर्तन के साथ-साथ मुस्लिम विवाह पद्धति में भी अनेक परिवर्तन आ रहे हैं. किंतु जो परम्परा सदियों से चली आ रही है. उसे दो चार दिन में नहीं छोड़ा जा सकता।
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