वर्ग-संघर्ष की प्रक्रिया - Process of Class Struggle

वर्ग-संघर्ष की प्रक्रिया - Process of Class Struggle


संसार में वर्ग संघर्ष की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए मार्क्स ने कहा है कि- “दुनिया के आज तक के समाजों का इतिहसा वर्ग संघर्ष का इतिहास है।" यह स्वतंत्र व्यक्ति और दास, उच्च तथा सामान्य वर्ग, जमीदार एवं अर्द्ध- दास, उद्योगपति एवं श्रमिक वर्ग के बीच चलने वाले संघर्ष का इतिहास है। दूसरे शब्दों में यह शासक तथा शोषित वर्ग का इतिहास है जो आज तक बिना किसी व्यवधान के एक-दूसरे के विरोध में खड़े हुए है।


कार्ल मार्क्स ने वर्ग-संघर्ष के संबंध में अपने विचारों में वर्गों की उत्पत्ति के विश्लेषण पर उतना अधिक ध्यान नहीं दिया जितना कि भविष्य में निर्मित होने वाले वर्गों के विश्लेषण पर विचार किया। इस संदर्भ में मार्क्स ने यह स्पष्ट किया कि एक विशेष वर्ग में सामान्य हितों के लिए संघर्ष करने की दशा ही उसमें वर्ग-चेतना को विकसित करती है जो वर्ग संघर्ष की प्रक्रिया का प्रमुख आधार है। जब एक वर्ग सामान्य हितों को लेकर संगठित होने लगता है

तब वह वर्ग एक सामाजिक शक्ति के रूप में उदित होता है। मार्क्स ने वर्ग-संघर्ष को एक प्रक्रिया के रूप में स्पष्ट किया है जो अनेक दशाओं के प्रभाव से आगे बढ़ती है। इन दशाओं के संदर्भ में ही वर्ग संघर्ष की संपूर्ण प्रक्रिया को समझा जा सकता है।


(1) सर्वहारा वर्ग का विकास (Development of Proletariate) मार्क्स का कथन है कि वर्ग संघर्ष की प्रथम घटना वह है जिसमें श्रमिक एक-दूसरे से संबद्ध होकर किसी संगठन का निर्माण करने लगते हैं। बड़े-बड़े उद्योगों में मजदूरों की एक बड़ी भीड़ अवश्य होती है लेकिन इस भीड़ के लाग एक दूसरे से अपरिचित होते हैं। आरंभ में व्यक्तिगत हितों के कारण श्रमिक एक-दूसरे से अलग रहते हैं किंतु मजदूरी की सामान्य समस्याओं को लेकर उनके हित सामान्य बन जाते हैं किंतु मजदूरी की सामान्य समस्यओं को लेकर उनके हित सामान्य बन जाते हैं

और इस तरह वे संगठित होकर उद्योग के प्रबंधकों से अपने अधिकारों की माँग करने लगते हैं। इस दशा में उनकी एकता विचारों पर आधारित होती है। मार्क्स के अनुसार "इस एकता या गठबंधन में दो विशेषताएँ निहत होती है। पहली कि श्रमिकों की आपसी प्रतियोगिता समाप्त हो जाती है तथा दूसरी यह कि उनमें पूँजीपति से की जाने वाली एक सामान्य प्रतियोगिता का उदय होता है।" इस प्रकार स्पष्ट होता है कि पूँजीवादी अर्थव्यवस्था जनसाधारण को श्रमिक वर्ग के रूप में स्थानांतरित करती है तथा परिस्थितियों को जन्म देती है जिनमें सामान्य हितों के लिए श्रमिकों की चेतना विकसित होने लगती है। पूँजीवादी समाज की यह विशेषता वह है जो दास युग तथा सामान्तवादी युग के समाजों में नहीं पाई जाती थी।


(2) संपत्ति का बढ़ना हुआ महत्त्व ( Increasing Importance of Property) - मार्क्स ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी समाज की विशिष्टता को जानने के लिए उस समाज में संपत्ति के रूप को • समझना एक महत्त्वपूर्ण आधार पर सरलतापूर्वक समझा जा सकता है कि संपत्ति के प्रति व्यक्ति अथवा वर्ग की मनोवृत्ति क्या है?

दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि वर्गो का निर्धारण एक बड़ी सीमा तक संपत्ति के स्वरूप के आधार पर होता है। मार्क्स का कथन है कि वर्गों का निर्धारण करने में व्यक्ति के उत्पादन संबंधों का विशेष महत्त्व होता है। इसे स्पष्ट करते हुए उन्होंने बतलाया कि किसी भी समाज में • वर्गों के विभाजन का आधार व्यवसाय नहीं है बल्कि उत्पादन के उपकरणों से बनने वाले संबंध ही वर्ग विभाजन का आधार है। उदाहरण के लिए, मजदूर उत्पादन के जिस उपकरण अर्थात् मशीन पर श्रम करता है, वह मशीन उसकी नहीं होती। दूसरी ओर दूसरी और दूसरा व्यक्ति जो उस मशीन पर श्रम नहीं करता वह उसका स्वामी होता है। इस प्रकार मार्क्स के दृष्टिकोण से जिस वर्ग के पास उत्पादन के साधनों का स्वामित्व है वह पूँजीपति वर्ग बन जाता है तथा जो वर्ग उत्पादन के साधनों का स्वामी नहीं है वह सर्वहारा वर्ग के अंतर्गत आता है। इस तरह वर्ग-संघर्ष की प्रक्रिया में संपत्ति के महत्त्व को स्पष्ट उत्पादन के साधनों का स्वामित्व ही है।


(3) आर्थिक शक्ति से राजनैतिक शक्ति का उदय (Emergence of polotical Power from Economic Power ) उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व तथा कुछ व्यक्तियों के हाथ में वितरण प्रणाली का केंद्रीकरण पूँजीवाद की प्रमुख विशेषताएँ है।

उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व होने के कारण उच्च वर्ग (पूँजीपति वर्ग) की राजनैतिक शक्ति बढ़ने लगती है तथा वह इसका उपयोग सामान्य जनता के शोषण के लिए करने लगता है। मार्क्स का कथन है कि जिन लोगों का प्रभावशाली संपत्ति पर एकाधिकार होता है वे राजनैतिक तंत्र को नियंत्रित करने लगते हैं जिसके फलस्वरूप उनके राजनैतिक हितों एवं मानदंडों का संरक्षण होने लगता है। मार्क्स के शब्दों में- “राजनैतिक शक्ति कए बड़ी सीमा तक एक वर्ग द्वारा दूसरों का शोषण करने के लिए संगठित शक्ति की तरह है।” पूँजीपति वर्ग भी राज्य का उपयोग अपने हितों के लिए ही करते हैं। इस प्रकार पूँजीवादी समाज में बुर्जुआ वर्ग अपनी राजनैतिक और सत्तात्मक पहचान स्थापित कर लेता है। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि बुर्जुआ वर्ग को आर्थिक शक्ति धीरे-धीरे राजनैतिक शक्ति के रूप में बदलने लगती है। मार्क्स ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा है कि तब आर्थिक शक्ति राजनैतिक शक्ति का स्थान लेने लगती है तब समस्त रानैतिक प्रक्रियाएँ एवं संस्थाएँ जिनमें न्यायालय, पुलिस, सेना तथा प्रशासनिक अभिजन वर्ग सम्मिलित है, पूँजीपतियों के हितों के लिए ही कार्य करने लगती है। इस प्रकार वर्ग संघर्ष के इस स्तर को स्पष्ट करते हुए मार्क्स का कथन है कि आर्थिक शक्ति से ही रानैतिक शक्ति अथवा प्रभुता का उदय होता है।


(4) वर्गों का ध्रुवीकरण (Polarization of Classes) मार्क्स ने वर्ग संघर्ष की प्रक्रिया में धुरवीकरण की दशा को विशेष महत्त्व दिया है। इसका कारण यह है

कि संपूर्ण समाज में वर्ग विभाजन दो धुर्वी के रूप में स्थापित हो जाना ही वर्ग संघर्ष की प्रारंभिक अवस्था को स्पष्ट करता है। मार्क्स है कि जब समाज में पूँजीवाद का विकास होने तलता है। मार्क्स का कथन है कि जब समाज में पूँजीवाद का विकास होने लगता है तब बड़े उद्योगपति अधिक पूँजी एकत्रित करने के लिए छोटे उद्योगपतियों (Petty Bourgeosie) तथा आकारहीन सर्वहारा वर्ग (Lumpen Proletariate) को संपत्ति से वंचित करने लगते हैं। वास्तव में यह प्रक्रिया बहुत स्पष्ट रूप में घटित नहीं होती क्योंकि व्यावसायिक प्रतियोगिता तथा महँगाई बढ़ने के कारण समाज के वे लोग धीरे-धीरे अपनी संपत्ति से वंचित होने लगते हैं जो न तो पूरी • तरह सर्वहारा वर्ग के अंतर्गत आते हैं और न ही बड़े उद्योगपति होते हैं। मार्क्स का कथन है कि वर्ग-चेतना में वृद्धि तथा वर्ग-संघर्ष बढ़ने के स्तर पर यह छोटे पूँजीपति अपनी संपत्ति से पूर्णतया वंचित हो जाते हैं तथा वे सर्वहारा वर्ग का अंग बन जाते हैं। रेमंड ऐरां ने इस स्थिति को (सर्वहाराकरण ( के नाम से सम्बाधित किया है। सर्वहाराकरण की इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप समाज में एक ओर सर्वहारा वर्ग की सदस्य-संख्या बढ़ने लगती है तो दूसरी ओर पूँजी का केंद्रीयकरण बहुत थोड़े से हाथों में बढ़ता चला जाता है। इस स्थिति को निम्नांकित चित्र के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।


वर्गों के धुर्वीकरण में वृद्धि होने से पूँजीपति तथा सर्वहारा वर्ग के बीच संघर्ष की गति तेज होने लगती है।

यह दोनों वर्ग अपनी राजनैतिक प्रभुता स्थापित करने के लिए संघर्ष करने लगते हैं। यह द्वंद्व एक स्तर पर निर्णायक रूप ले लेता है जिसमें समाज का प्रत्येक व्यक्ति किसी व किसी वर्ग के साथ होकर संघर्ष में हिस्सा लेने लगता है।


(5) दरिद्रीकरण में वृद्धि (Increase in Pauperization) मार्क्स का विचार है कि पूँजीपति वर्ग द्वारा श्रमिकों के आर्थिक शोषण के कारण से उनकी आर्थिक दशा निरंतर बिगड़ती चली जाती है। दूसरी ओर पूँजीपति वर्ग श्रमिकों से अतिरिक्त श्रम लेकर अपने अतिरिक्त मूल्य में वृद्धि करता रहता है। समाज में जैसे-जैसे पूँजीपतियों के पास संपत्ति का एकत्रीकरण बढ़ता है, वैसे ही वैसे समाज में दरिद्रता बढ़ने लगती है। इसके अतिरिक्त, छोटे पूँजीपतियों द्वारा बड़े पूँजीपतियों से प्रतियोगिता न कर सकने के कारण वे भी निर्धन बनने लगते हैं। इससे भी समाज में दरिद्रता में वृद्धि होती है। इस संबंध में मार्क्स ने लिखा है - “उत्पादन का कोई भी वह तरीका जिसमें मनुष्य के द्वारा मनुष्य का शोषण निहित होता है, उसमें सामाजिक उत्पादन का इस तरह वितरण किया जाता है कि समाज के अधिकांश लोग अर्थात् शारीरिक श्रम करने वाले लोग, जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं कर पाते।”

मार्क्स का कथन है कि कुछ परिस्थितियाँ ऐसी हो सकती है जिनमें श्रमिकों को कुछ सुविधाएँ मिलने लगें लेकिन साधारणतया पूँजीवादी व्यवस्था श्रमिकों को उनकी अनिवार्य आवश्यकताओं से ही वंचित कर देती है और इस प्रकार संपूर्ण समाज धनी और निर्धन जैसे दो भागों में विभाजित हो जाता है। मार्क्स के अनुसार समाज की दरिद्रता शोषण का परिणाम है। पूँजीवादी समाज में दरिद्रता इसलिए नहीं पाई जाती कि वहाँ वस्तुओं की कभी है बल्कि ऐसे समाज में गरीब लोग वस्तुएँ इसलिए प्राप्त नहीं कर पाते क्योंकि पूँजीपति अपनी विलासिता के लिए अधिकांश वस्तुओं का उपयोग स्वयं कर लेते हैं। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि करोड़ों लोगों को सोने के लिए स्थान इसलिए नहीं मिल पाता क्योंकि धनी लोग बहुत बड़ी भूमि पर अपने लिए बड़े-बड़े भवनों का निर्माण कर लेते हैं। यह भी शोषण का एक विशेष रूप है जो दरिद्रता के लिए उत्तरदाई होता है।


(6) अलगाव (Alienation) शोषण तथा कार्य की अमानवीय दशाओं के कारण श्रमिकों तथा जन साधारण में जिस मानसिक दशा का निर्माण होता है, मार्क्स ने (अलगाव ( का नाम दिया है।

अलगाव की दशा का निर्माण होता है, उसे मार्क्स ने बतलाय कि पूँजीवादी अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए एक ओर श्रमिक को उसके काम के लिए बहुत कम मजदूरी देता है तो दूसरी ओर श्रमिक द्वारा जिन मशीनों पर काम किया जाता है, उनके रख-रखव पर भी पूँजीवति अधिक ध्यान नहीं देते। इंग्लैंड की औद्यौगिक क्रांति की चर्चा करते हुए मार्क्स ने अनेक ऐसे उद्योगों का उल्लेख किया जिनमें मशीनों की स्थिति बहुत खराब थी। इस प्रकार मार्क्स ने मजदुरों में बढ़ते हुए अलगाव के लिए काम करने की उन सभी दशाओं को उत्तरदाई माना है जो मजदूरों में शारीरिक और मानसिक थकान पैदा करती है। औद्यौगिक समाजशास्त्र से संबंधित अध्ययनों से भी स्पष्ट हे चुका है कि जब मशीनें खराब होती है अथवा मजदूरों के काम करने की दशाएँ असुरक्षा से भरी हुई होती है तब मजदूरों में अपने काम के प्रति एक तरह कि विमूखता तथा निराशा उत्पन्न होने लगती है। अलगाव की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए मार्क्स का कथन है कि पूंजीवादी व्यवस्था में सभी पद्धतियों को इस तरह उपयोग में लाया जाता है जिससे व्यक्तिगत श्रम के द्वारा सामाजिक उत्पादकता को बढ़ाया जा सके। इस प्रक्रिया में उत्पादन के समस्त साधनों का काम पूँजीपतियों के प्रभुत्व को बढ़ाना ही होता है। उत्पादन की इस प्रक्रिया में श्रमिक स्वयं एक मशीन बन जाता है। इसके फलस्वरूप अपने मशीनों जीवन में श्रमिकों का अपने काम के प्रति लगाव कम होने लगता है।

जब उसकी दशाओं में कोई सुधार नहीं हो पाता तब धीरे-धीरे वह उत्पादन की व्यवस्था में अपने आपको असहाय और असमर्थ समझने लगता है। उसमें यह धारण प्रबल होने लगती है कि वह अपनी दशाओं से परिवर्तन नहीं कर सकता। इसी प्रक्रिया को मार्क्स ने (अलगाव ( के नाम से संबंधित कि है।


(7) वर्ग-एकता एवं विरोध ( Class Solidarity and Antagonism) मार्क्स का कथन है कि औद्योगिक विकास के अगले स्तर में न केवल सर्वहारा वर्ग की सदस्य संख्या बहुत बढ़ जाती है बल्कि यह वर्ग एक बहुत बड़े जनसमूह के रूप में परिवर्तित होने लगता है। जब इस वर्ग की सदस्य-संख्या बढ़ती है तब वह अपने आपको अधिक शक्तिशाली अनुभव करने लगता है। इस ख में श्रमिक अपने ही वर्ग से दूसरे लोगों से घनिष्ठ संबंध स्थापित करने लगते हैं तथा समान परिस्थितियों में काम करने के कारण सर्वहारा वर्ग के सभी लोगों के हित समान हो जाते हैं। यह दशा सर्वहारा पर्ग में एक नई चेतना उत्पन्न करती है तथा इस प्रकार सर्वहारा वर्ग में एकता स्थापित होने लगती है। दूसरी बुर्जुआ वर्ग के बीच प्रतियोगिता बढ़ने के कारण बड़े उद्योगपति छोटे उद्योगपतियों को नष्ट करने का प्रयत्न करने लगते हैं। इसके परिणामस्वरूप पूँजीवादी समाज में व्यावसायिक संकट की दशा उप्तन्न हो जाती है। संकट की इस दशा में मजदूरों की मजदूरी कभी घटती है तो कभी बढ़ती है। मार्क्स के अनुसार यही वह दशा है जब श्रमिक संगठित होकर समूचित मजदूरी की माँग करने के लिए पूँजीपतियों का विरोध करना आरंभ कर देते हैं। यह क्रांति की प्रारंभिक अवस्था है जिसमें मजदूर आगे होने वाली क्रांति के लिए अपने को तैयार करना आरंभ कर देते हैं।


(8) क्रांति (Revolution) मार्क्स का कथन है कि क्रांति वर्ग संघर्ष की चरम स्थिति है। यह उस दशा को स्पष्ट करती है जिसमें श्रमिक संगठित होकर पूँजीपतियों के विरूद्ध हिंसक संघर्ष आरंभ करते हैं तथा समाज की संपूर्ण आर्थिक संरचना को बलद देते हैं। क्रांति आर्थिक संकट की उस दशा में उत्पन्न होती है जिसमें पूँजीवादी व्यवस्था के दोष अपनी चरम सीमा पर स्पष्ट होने लगते हैं। इसका तात्पर्य है कि जब पूँजीपति अधिकाधिक लाभ कमाने के लिए शोषण को अमानवीय स्तर तक पहुँचा देते हैं तथा प्रत्येक अनुचित साधन के द्वारा धन का संचय करना आरंभ कर देते हैं तब सर्वहारा वर्ग की क्रांति का होना आवश्यक हो जाता है। क्रांति की दशा का गहन विवेचन करते हुए मार्क्स ने लिखा है कि जब क्रांति अपने निर्णायक स्तर पर होती है तब सत्ता में भी विघटन की स्थितियों का जन्म होने लगता है। उस समय सत्ता वर्ग का एक छोटा हिस्सा भी अपने आपको सत्ता से अलग कर लेता है और क्रांति करने वाले सर्वहारा वर्ग से मिल जाता है। मार्क्स का कथन है कि क्रांतिकारी वर्ग के हाथों में ही संपूर्ण समाज का भविष्य होता है। यही वर्ग पूँजीबादी सामाजिक ढाँचे को नष्ट करके एक नई वैचारिकी के आधार पर सामाजिक संरचना का नए सिरे से निर्माण करता है।


(9) सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद (Dictatorship of the proletariate) - मार्क्स के अनुसारा सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व वर्ग संघर्ष का अंतिम स्तर है। उनका कथन है कि सर्वहारा वर्ग द्वारा जब क्रांति की जाती है तो इससे पूँजीवादी व्यवस्था नष्ट होकर समाज की संपूर्ण शक्ति सर्वहारा वर्ग को प्राप्त हो जरूरी नहीं होता कि समस्त पूँजीपतियों को समाप्त कर दिया जाए। क्रांति का प्रमुख उद्देश्य सर्वहारा वर्ग द्वारा समाज की संपूर्ण संपत्ति, उत्पादन के साधनों तथा सत्ता पर अपना अधिकार कर लेना है। जब उत्पादन के साधनों तथा सत्ता पर श्रमिकों का अधिकार हो जाएगा तब किसी के द्वारा किसी का शोषण करने का प्रश्न ही नहीं उठेगा। मार्क्स ने यह भी स्पष्ट किया कि इस क्रांति से सामान्य लोगों को भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है यह तो श्रमिकों का शोषण करने वाले पूँजीपतियों को ही समाप्त करने के लिए होगी, अपने (साम्यवादी घोषणा-पत्र ( के अंत में मार्क्स ने लिखा है - "साम्रवादी क्रांति के भय से शासको (पूँजीपतियों) को काँपने दो... सर्वहारा वर्ग के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं है जबकि जीतने के लिए उनके सामने पूरी दुनिया पड़ी है।” इस प्रकार अंतिम परिणति के रूप में स्पष्ट किया।