अतिरिक्त मूल्य का उत्पादन - production of added value
अतिरिक्त मूल्य का उत्पादन - production of added value
अतिरिक्त मूल्य के उत्पादन की चर्चा करते हुए मार्क्स ने बताया कि पूँजीवादी, सामाजों में श्रमिक, उद्योगपतियों के लिए काम करते हैं। उद्योगपति श्रमिकों से दैनिक मजदूरी पर काम लेते हैं अथवा उनका श्रम खरीदते हैं। जब कोई मजदूर स्वयं को मिलने वाली मजदूरी से अधिक श्रम करता है तब इसे हम मजदूर का (अतिरिक्त श्रम मजदूर द्वारा किया जाने वाला वह कार्य है जो उसे प्राप्त होने वाली मजदूरी की तुलना से अधिक या अतिरिक्त होता है तथा जिसके लिए उसे किसी तरह की मजदूरी नहीं मिलती। दूसरे शब्दों में, श्रमिक द्वारा किए जाने वाले श्रम का मूल्य उसे प्राप्त होने वाली मजदूरी के मूल्य से जितना अधिक होता है उसी को अतिरिक्त श्रम कहा जाता है।
मार्क्स का कथन है कि पूँजीवादी समाजों में पूँजीपति का प्रयत्न मजदूरों से अधिक से अधिक अतिरिक्त श्रम लेना होता है। समाज में जब अतिरिक्त श्रम होने लगता है तब पूँजीपतियों के अतिरिक्त लाभ में भी वृद्धि होने लगती है। मार्क्स का विचार है कि पूँजीपतियों को प्राप्त होने वाला अतिरिक्त मूल्य अथवा लाभ मजदूरी के शोषण से ही संभव होता है तथा धीरे-धीरे यह पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की स्थाई विशेषता बन जाती है।
पूँजीपतियों को प्राप्त होने वाले इस अतिरिक्त मूल्य के फलस्वरूप ही वे अधिक अमीर होते जाते हैं जबकि इसी के कारण मजदूर वर्ग के शोषण और उनकी गरीबी में निरंतर वृद्धि होने लगती है। अतिरिक्त मूल्य के उत्पादन की इस प्रक्रिया को एक विशेष उदाहरण के द्वारा समझा जा सकता है। यदि किसी साड़ी उद्योग में एक श्रमिक दिन में दो साड़ी बना सकता है तो पहली और दूसरी साड़ी के निर्माण पर होने वाला कुल व्यय तथा उससे प्राप्त होने वाला अतिरिक्त लाभ इस प्रकार होगा:
पहली साड़ी के निर्माण पर होने वाला कुल व्यय
कच्चे माल का मूल्य 40.00 रूपये
उद्योग की मशीनों को चलाने, उनकी मरम्मत तथा अन्य व्यय 20.00 रूपये
श्रमिक को दी जाने वाली मजदूरी 20.00 रूपये
कुल लागत मूल्य 80.00 रूपये
साड़ी का विक्रय अथवा विनिमय मूल्य 100.00 रूपये लाभ 20.00 रूपये
दूसरी साड़ी के निर्माण पर होने वाला कुल व्यय
कच्चे माल का मूल्य 40.00 रूपये
उद्योग की मशीनों को चलाने, उनकी मरम्मत तथा अन्य व्यय 20.00 रूपये
कुल लागत मूल्य 60.00 रूपये
साड़ी का विक्रय अथवा विनिमय मूल्य 100.00 रूपये
लाभ 40.00 रूपये
इस उदाहरण से स्पष्ट होता है कि किसी माल के उत्पादन पर कच्चे माल मशीनों की घिसाई. रख-रखाव तथा प्रबंध आदि पर होने वाले व्यय की लागत प्रत्येक इकाई पर समान अथवा लगभग समान होती है। इस स्थिति में पूँजीपति द्वारा श्रमिकों से अतिरिक्त श्रम लेकर ही अपने लाभ को बढ़ाने का प्रयत्न किया जाता है। उपर्युक्त उदाहरण में उद्योगपति द्वारा जिस तरह की साड़ियों का निर्माण किया जाता है, यदि उसका विक्रय-मूल्य प्रति साड़ी 100.00 है तो मजदूर को प्रति साड़ी 20.00 रूपये की दर से मजदूरी देकर भी उद्योगपति को प्रति साड़ी 20.00 रूपये का लाभ प्राप्त हो जाता है। इस तरह एक मजदूर यदि चार घंटे में एक साड़ी बनाता है तो इसका तात्पर्य है कि उसने मजदूरी के आधार पर अपना दिनभर का काम पूरा कर लिया है। किंतु अपने काम के शेष चार घंटे में जब वह दूसरी साड़ी बनाता है तो इसके लिए उसे कोई अतिरिक्त मजदूरी प्राप्त नहीं होती। इस प्रकार दूसरी साड़ी के लिए श्रमिक को बिना मजदूरी दिए ही उससे जो कार्य लिया जाता है वह श्रमिक द्वारा किया गया अतिरिक्त कार्य है तथा उसके द्वारा उद्योगपति को जो अतिरिक्त लाभ प्राप्त हो जाता है वह उसे मिलने वाला (अतिरिक्त मूल्य) है। उपर्युक्त उदाहरण में उद्योगपति को पहली साड़ी पर प्राप्त होने वाला शुद्ध लाभ 20.00 रूपया है जबकि दूसरी साड़ी पर वह 40.00 रूपये प्राप्त करता है। इस प्रकार 40-20 या 20 रूपये उद्योगपति को प्राप्त होने वाला अतिरिक्त मूल्य है।
मार्क्स ने बतलाया कि जब मजदूर काम के निश्चित घंटों के आधार पर कार्य करते हैं, जब उद्योवादी समाज में श्रमिकों से अतिरिक्त श्रम करवाने की प्रवृत्ति के आधार पर पूँजीवादी समाज की अधोसंरचना का निर्माण होता है। इसके अंतर्गत श्रमिकों से वे कार्य भी करवाये जाने लगते हैं जिन्हें करने के लिए वे बाध्य नहीं होते। पूँजीपतियों का उद्देश्य कभी श्रमिकों की प्रशंसा करके तो कभी उन्हें कोई सामान्य प्रलोभन देकर उनसे अतिरिक्त श्रम करवाना होता है। इस आधार पर मार्क्स ने अतिरिक्त मूल्य के दो स्वरूपों की से है जिनके द्वारा वे मजदूरों से अतिरिक्त श्रम लेकर अपने अतिरिक्त लाभ को बढ़ाने का प्रयत्न करते हैं।
(1) निरपेक्ष अतिरिक्त मूल्य (Non- relative Surplus Value) - कार्ल्स मार्क्स के अनुसार निरपेक्ष अतिरिक्त मूल्य एक एकसी दशा को स्पष्ट करता है जिसमें उद्योगपति श्रमिक में चेतना का स्तर निम्न होता है तब पूँजीपति श्रमिकों के काम के घंटों को बढ़ाकर जो अतिरिक्त मूल्य उत्पन्न किया जाता है,
उसे मैंने निरपेक्ष अतिरिक्त मूल्य का नाम दिया है।" मार्क्स का कथन है कि पूँजीवाद की प्रारंभिक अवस्था में जब श्रमिकों में चेतना का स्तर निम्न होता है तब पूँजीपति श्रमिकों के काम के घंटों को बढ़ा देते हैं। उदाहरण के लिए. यदि एक कारखाने में श्रमिक की दैनिक कार्यक्षमता 6 घंटे काम करने की है। तो उद्योगपति द्वारा एक दिन में काम के 8 घंटे निर्धारित करके श्रमिकों से अतिरिक्त मूल्य उत्पन्न करने का प्रयत्न किया जाता है। स्पष्ट है कि काम के घंटें बढ़ जाने से उद्योगपति श्रमिकों से अधिक काम ले सकेगा। इस स्थिति में श्रमिक जो अतिरिक्त श्रम करेंगे उससे होने वाले अतिरिक्त लाभ के द्वारा उद्योगपति बिना किसी लगाव के सभी मजदूरों के काम के घंटों को बढ़ा देता है। इसीलिए मार्क्स ने इससे पैदा होने वाले अतिरिक्त मूल्य को निरपेक्ष अतिरिक्त मूल्य का नाम दिया है।
(2) सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य (Relative Surplus Value) - मार्क्स ने लिखा है - "जो अतिरिक्त मूल्य श्रम के घंटों को कम कर देने तथा काम के दिन को दो हिस्सों में विभाजित कर देने के फलस्वरूप उत्पन्न होता है, उसे मैं सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य की संज्ञा देता हूँ।" मार्क्स के इस कथन से स्पष्ट होता है
कि सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य के द्वारा अपने लाभ में वृद्धि करना उद्योगपतियों का दूसरा तरीका है। साधारणतया जब श्रमिकों के कल्याण की बात उठती है अथवा श्रमिक स्वयं काम की दशाओं में सुधार करने की माँग करते हैं तब पूँजीपतियों द्वा उनके काम के कुल घंटे तो कम कर दिए जाते हैं लेकिन एक कार्य- दिवस को दो समान भागों में बाँट दिया जाता है। इससे भी उन्हें अपने अतिरिक्त मूल्य को बढ़ाने का अवसर मिल जाता है। एक उदाहरण के द्वारा सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य की प्रकृति को सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। यदि किसी उद्योग में मजदूर से लगातार आठ घंटे तक काम लिया जाता हो तो श्रमिकों के कार्य-दिवस की अवधि आठ घंटा होगी। इस अवधि में उद्योगपति द्वारा प्रत्येक घंटे में मजदूर के श्रम की उत्पादकता का आकलन किया जाता है। साधारणतया उद्योगपति यह जान लेते हैं कि एक श्रमिक पहले तीन या चार घंटों में जितनी तेजी से काम करता है. बाद के घंटों में उत्पादकता की दर कम होने लगती है। पूँजीपति का उद्देश्य सदैव श्रम की उत्पादकता के बढ़ाना होता है। इस दशा में पूँजीपति श्रमिक द्वारा किए जाने वाले काम के घंटों को कम करके कार्य दिवस को दो भागों में बाँट देता है। इसका तात्पर्य है कि वह आठ घंटे के स्थान पर कार्य-दिवस सात घंटे का निर्धारित करके पहले चार घंटे का काम लेने के बाद एक घंटे का अवकाश देकर बाद में पुनः तीन घंटे का काम ले सकता है। इस एक घंटे में श्रमिक अपनी सारी थकान मिटा लेता है।
इसके फलस्वरूप अवकाश के बाद दिन के दूसरे भाग में भी श्रमिक उतनी ही तेजी से काम करता है जितनी तेजी से वह दिन के पहले घंटों में काम कर सकता था। इस प्रकार पूँजीपति द्वारा जब काम के कुल घंटों को कम करके परिस्थितियों में ऐसा गुणात्मक परिवर्तन किया जाता है जिससे श्रमिक के अतिरिक्त श्रम में वृद्धि हो सके तब इस प्रकार बढ़ने वाले अतिरिक्त मूल्य को हम सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य कहते हैं।
मार्क्स ने यह स्पष्ट किया कि सापेक्ष और निपेक्ष अतिरिक्त मूल्य के आधार पर ही पूँजीपति श्रमिक वर्ग का निरंतर शोषण करते रहते हैं। मार्क्स का कथन है कि जिस दिन दुनियाँ के मजदूर इस बात को जान लेंगे कि पूँजीपति किस प्रकार उनसे अतिरिक्त मूल्य पैदा करते हैं. उस दिन श्रमिकों के लिए क्रांति का रास्ता खुल जाएगा। स्पष्ट है कि अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत के द्वारा मार्क्स ने जहाँ एक ओर श्रमिकों के शोषण की प्रक्रिया को बहुत गहराई से समझाने का प्रकाश डाला जो उन्हें श्रमिकों का शोषण करने की प्रेरणा देती है।
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