विवाह के उद्देश्य - purpose of marriage

 विवाह के उद्देश्य - purpose of marriage


विभिन्न समाजों में विवाह के उद्देश्य यद्यपि समान हैं लेकिन सामाजिक मूल्यों और सांस्कृतिक विशेषताओं में भिन्नता होने के कारण इन उद्देश्यों की प्राथमिकता के क्रम में कुछ अंतर पाया जाता है। विवाह के इन उद्देश्यों में चार उद्देश्यों को प्रमुख महत्व दिया जाता है -


(क) यौनिक इच्छाओं की पूर्ति


(ख) परिवार का निर्माण 


(ग) आर्थिक सहयोग की स्थापना


(घ) बच्चों के पालन पोषण के द्वारा मातृ मूल प्रवृत्ति की संतुष्टि


यद्यपि विवाह के ये चारों ही उद्देश्य समान रूप से महत्वपूर्ण हैं लेकिन इन्हें भिन्न-भिन्न आधारों पर एक दूसरे से अधिक महत्वपूर्ण दिखाने का प्रयत्न किया जाता है। पश्चिमी समाजों की भौतिकवादी संस्कृति में विवाह का सबसे प्रमुख उद्देश्य यौन संबंध स्थापित करने का कानूनी अधिकार प्राप्त करना और बच्चों के जन्म को वैध रूप प्रदान करना है।

इन समाजों में परिवार का महत्व अपेक्षाकृत कम होने और व्यक्तिवाद को प्रोत्साहन मिलने के कारण विवाह जैसी संस्था का संबंध संपत्ति अधिकारों से बहुत कम है। इसके बिल्कुल विपरीत सरल और अदिवासी समुदायों में विवाह का उद्देश्य केवल दो व्यक्तियों के बीच ही संबंध को स्थापित करना नहीं बल्कि दो परिवारों के संबंध को दृढ बनाना होता है। बहुत से आदिवासी समुदाय ऐसे हैं जिनमें यौन संबंधों के बारे में नियम न तो अधिक कठोर है और न ही ऐसे संबंधों पर किसी तरह का नियंत्रण लगाना जरूरी समझा जाता है। इस प्रकार यहां यौन संबंधों का अधिकार देना विवाह का बहुत महत्वपूर्ण उद्देश्य नही समझा जाता है। अनेक अदिवासी समुदायों में बहुपति विवाह का प्रचलन है जिसके कारण यह जानना बहुत कठिन हो जाता है कि बच्चे का वास्तविक पिता कौन व्यक्ति है ऐसी स्थिति में बच्चे के पितृत्व का निर्धारण भी सामाजिक प्रथाओं अथवा सांस्कृतिक रूप से होता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि बच्चों को वैध रूप देना भी विवाह का प्रमुख उद्देश्य नहीं हो सकता क्योंकि सामाजिक प्रथाओं के द्वारा भी बच्चे को वैध रूप दिया जा सकता है। ऐसी स्थिति में केवल परिवार का निर्माण करना ही विवाह का प्रमुख उद्देश्य रह जाता है। इतना अवश्य है कि विवाह के बिना भी व्यक्ति अपनी यौनिक इच्छा को पूरा कर सकता है।

लेकिन ऐसा होने से वैयक्तिक विघटन की सम्भावना अधिक रहती है। इस दृष्टिकोण से विवाह का एक अन्य उद्देश्य हमारे सामने आता है जिसे हम व्यक्तित्व का स्वस्थ रूप से विकास करना अथवा व्यक्ति को मानसिक सुरक्षा प्रदान करना कह सकते हैं।


हमारे समाज में यौन संतुष्टि को विवाह का सबसे गौण उद्देश्य माना गया है। हिंदू जीवन में गृहस्थ जीवन को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है क्योकि व्यक्ति केवल परिवार में रहकर ही विभिन्न व्यक्तियों और समूहों के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन सबसे अच्छे रूप में कर सकता है। इस दृष्टिकोण से परिवार का निर्माण करना और परिवार में धार्मिक क्रियाओं की पूर्ति करना अथवा दूसरे शब्दों में अन्य व्यक्तियों के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा करना ही विवाह का एक सांस्कृतिक विशेषताओं को स्थिर बनाए रखना है ऐसा इस कारण है कि विवाह के प्रमुख उद्देश्य है इसके अतिरिक्त भारतीय समाज में विवाह के एक प्रमुख द्वारा ही बच्चों को सांस्कृतिक विशेषताओं की सीख दी जा सकती है। और उसी संस्था के द्वारा यह सीख वंश परंपरा के माध्यम से एक पीढी से दूसरी पीढ़ी को प्राप्त हो सकती है।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि विवाह के उद्देश्यों को केवल जैविकीय आधार पर नहीं समझा जा सकता बल्कि इन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक आधार पर ही स्पष्ट किया जाना चाहिए।

इस प्रकार विवाह के निम्नांकित उद्देश्य हैं जिन्हें यह संस्था पूरा करती है


1. यौन संबंधो का निर्धारण एवं नियमना


2. परिवार का निर्माण एवं नातेदारी का विस्तार।


3. बच्चों के जन्म को वैधानिकता प्रदान करना।


4. सामाजिक सांस्कृतिक सुरक्षा।


5. आर्थिक सुरक्षा ।


वेस्टरमार्क ने विवाह के पांच उद्देश्य बताए हैं


1. वैध संतानोत्पत्ति


2. परिवार की स्थापना


3. युवावस्था में भावनात्मक स्थिरता


4. आर्थिक उत्तरदायित्व


5. सामाजिक उत्तरदायित्व


इसी प्रकार मुरडॉक ने विवाह के निम्नांकित तीन उद्देश्य बताए हैं. उन्होंने 250 समाजों का अध्ययन कर कहा है कि ये उद्देश्य सभी समाजों में पाए जाते हैं -


1. यौन संतुष्टि


2. आर्थिक सहयोग


3. संतानों का समाजीकरण एवं लालन पालन