गुणात्मक अनुसंधान - qualitative research

 गुणात्मक अनुसंधान - qualitative research


गुणात्मक अनुसंधान एक गैर-मात्रात्मक विश्लेषण प्रदान करता है अर्थात् इसका संबंध गुणात्मक प्रकृति की घटनाओं अथवा समस्याओं से होता है। इस प्रकार के अनुसंधान का प्रत्यक्ष संबंध उन घटनाओं से होता है जो गुण अथवा भेद प्रकृति की रहती हैं। इसका ज़्यादातर प्रयोग व्यावहारिक विज्ञानों में किया जाता है, क्योंकि इसका उद्देश्य मानवीय व्यवहारों व इच्छाओं का पता लगाना होता है।


गुणात्मक शोध द्वारा अपनाई जाने वाली अवधारणात्मक रूपरेखा में निम्न कारक उल्लेखनीय हैं-


क) अर्थ और व्याख्याएँ


वास्तव में सामाजिक घटनाओं के बारे में अध्ययन करना अत्यंत ही दुष्कर होता है।

प्राकृतिक विज्ञानों द्वारा प्रयोगशाला में अध्ययन कर निष्कर्ष प्राप्त कर लेना अपेक्षाकृत सरल होता है। मानव व्यवहार अथवा किसी सामाजिक घटना को समझने का तात्पर्य यह है कि इसका अवलोकन मानव किस प्रकार से करता है? अथवा उसकी भागीदारी किस प्रकार के क्रियाकलापों से जुड़ी हुई है? 


ख) ज्ञान अर्जित करना अथवा संवर्धित करना


शोधकर्ता और उत्तरदाताओं के मध्य परस्पर वार्तालाप से प्राप्त होने वाली जानकारी से संबंधित परीक्षण को गुणात्मक शोध द्वारा अधिक महत्व दिया जाता है। शोधकर्ता द्वारा किए प्रश्नों के उत्तर उत्तरदाता द्वारा अपनी अनुभूति के अनुरूप दिया जाता है अथवा वे उत्तर उन अर्थों के संदर्भ में देते हैं जिनसे वे अपने कार्यों को सम्बद्ध समझते हैं। इसके अलावा शोधकर्ता और उसके उत्तरदाताओं के मध्य परस्पर वार्तालाप से अधिकतम स्तर की प्रतिक्रियात्मकता और जांच की जाने वाली समस्या से संबंधित अंतर्दृष्टि भी प्राप्त की जाती है। 


ग) सामान्यीकरण


विद्वानों का यह मानना है कि सामान्यीकरण करने की प्रक्रिया में व्यक्तिगत इकाइयों में पाई जाने वाली काफी अर्थपूर्ण जानकारी का निर्धारण सही तरीके से नहीं हो पाता है तथा यही कारण है कि सामान्यीकृत जानकारी वास्तविक अथवा पूर्ण जानकारी को इंगित नहीं करती है। उनके लिए जानकारी निर्मित करने की प्रक्रिया को विशिष्ट स्थितियों में पायी जाने वाली विभिन्नता अथवा वास्तविक प्रमाणों पर विचार अवश्य करना चाहिए। 


घ) बहुवास्तविकताएँ


मान्यता है कि सामाजिक स्थितियों में विभिन्न वास्तविकताएँ उपलब्ध होती हैं जिन्हें देखा और उन पर शोध कार्य किया जा सकता है। इनकी अनुभूति व्यक्तियों द्वारा अलग रूपों में होती है और इसलिए ये अलग व्यक्तियों के लिए अलग मानसिक रचक के तौर पर निर्मित हो जाते हैं। चूँकि समय के अनुरूप सामाजिक स्थितियाँ बदलती रहती हैं तथा इसी रूप में वास्तविकताएँ भी परिवर्तित होती रहती हैं।

इसके अलावा संदर्भ- विशिष्ट होने के कारण वास्तविकताओं को सामान्यीकृत रूप में साकार नहीं किया जा सकता है। 


ङ) मूल्य प्रणालियाँ


सामाजिक अनुसंधानकर्ताओं का मत है कि समस्याओं की पहचान, प्रतिदर्श का निर्धारण, तथ्य संकलन हेतु तकनीकों व प्रविधियों का चयन, उन स्थितियों जिनमें आँकड़ों को संकलित किया गया है और मूल्य प्रणालियों का प्रभाव अनुसंधानकर्ता और साक्षात्कारदाता के मध्य होने वाले संभावित वार्तालाप में भी परिलक्षित होता है। अतः समाजविज्ञानी इस बात पर जोर देते हैं कि शोधकर्त्ता के झुकाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और इसके बारे में शोध रिपोर्ट में विवरण दिया जाना चाहिए।


च) मानव सम्बन्ध


मानव सम्बन्धों के मामले में विभिन्न आंतरिक कारक, घटनाएँ, व्यवहार और प्रक्रियाएँ एक-दूसरे पर निरंतर प्रभाव डालती रहती हैं। अतः गुणात्मक अध्ययनों के इस मसले में व्यक्ति से व्यक्ति कारक और प्रभाव सम्बन्धों की पहचान करना संभव नहीं होता है। सामाजिक और व्यवहारगत अध्ययनों से न केवल पूरी सामाजिक प्रणाली व प्रक्रिया के बारे में जानकारी प्राप्त होती है, अपितु संभावित प्रभावों के पैटर्न की भी जानकारी प्राप्त होती है।