मात्रात्मक अनुसंधान अभिकल्प - quantitative research design
मात्रात्मक अनुसंधान अभिकल्प - quantitative research design
मात्रात्मक अनुसंधान अभिकल्प के अंतर्गत अध्ययन किए जाने वाले तथ्य संख्यात्मक स्वरूप के होते हैं तथा इसी कारण इस अनुसंधान अभिकल्प को मात्रात्मक अनुसंधान अभिकल्प की संज्ञा प्रदान की गई है। यही कारण है कि तथ्यों के संकलन हेतु मात्रात्मक अनुसंधान अभिकल्प के तहत प्रयोग की जाने वाली विधियाँ व तकनीकें संरचित प्रकार की रहती हैं तथा साथ ही प्रयोग किए गए प्रश्नों की प्रकृति बंद प्रकार की होती है। इस प्रकार के अनुसंधान अभिकल्प में अवलोकन, संरचित साक्षात्कार, सर्वेक्षण, रिपोर्ट आदि की सहायता से तथ्यों को संकलित किया जाता है तथा तथ्यों के विश्लेषण हेतु सांख्यिकीय पद्धति का सहारा लिया जाता है।
मात्रात्मक अनुसंधान अभिकल्प का प्रयोग पूर्व के स्थापित सिद्धांतों की व्यावहारिकता की जांच हेतु किया जाता है।
उदाहरणस्वरूप, यदि हमें 50-60 वर्ष पूर्व निर्मित किसी सिद्धांत की वर्तमान प्रासंगिकता का परीक्षण करना है तथा उसकी व्यावहारिक उपस्थिति को जाँचना हो, यो इस दशा में शोध हेतु मात्रात्मक अनुसंधान अभिकल्प का प्रयोग किया जाता है। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि मात्रात्मक अनुसंधान अभिकल्प की सहायता से नवीन प्राक्कथन निर्मित नहीं होते, वरन ऐसा सामान्यतः दुष्कर होता है। मात्रात्मक अनुसंधान अभिकल्प के अंतर्गत मुख्यतः निगमनात्मक पद्धति का प्रयोग किया जाता है। इसका उपयोग पूर्व के स्थापित सिद्धांतों अथवा अवधारणाओं की जांच के लिए किया जाता है तथा उसकी वर्तमान समय की प्रासंगिकता को जांच कर उसमें संशोधन किया जाता है अथवा उसे अस्वीकृत कर दिया जाता है। मात्रात्मक अनुसंधान अभिकल्प अपेक्षाकृत वस्तुनिष्ठ प्रकृति का होता है तथा इसमें पक्षपात व भावनात्मक जुड़ाव की संभावनाएं कम रहती हैं। अर्थात् यह किसी भी घटना अथवा स्थिति अथवा समस्या के प्रत्यक्ष तौर पर दिखाई देने वाले परिणाम अथवा प्रभाव का वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण होता है।
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