सामाजिक प्रणालियों में आमूल परिवर्तनः विकासात्मक सार्विकीय तत्व - Radical Changes in Social Systems: Developmental Universal Factors
सामाजिक प्रणालियों में आमूल परिवर्तनः विकासात्मक सार्विकीय तत्व - Radical Changes in Social Systems: Developmental Universal Factors
पारसन्स ने सामाजिक परिवर्तन के विकासात्मक सिद्धांत का विस्तृत विवेचन किया। परंतु सामाजिक परिवर्तन के प्रति उसका दृष्टिकोण मुख्यतया प्रकार्यात्मक रहा अर्थात् वह तब भी यही मानता था कि परिवर्तन की सभी प्रक्रियाएँ लंबे समय तक प्रणाली को बनाए रखने के लिए विभेदीकरण और अनुकूलन के प्रति दबावों से पैदा होती है. किंतु पारसन्स ने दो नए कारक भी प्रस्तुत किए, जो इस प्रकार है
(1) उसने “विकासात्मक सार्विकीय की अवधारणा का प्रतिपादन किया, जिसका अर्थ है कि प्रत्येक सामाजिक प्रणाली अथवा समाज की विशिष्ट ऐतिहासिक विशेषताओं के बावजूद (अपनी संस्कृति और भौतिक वातावरण से बंधे होने के कारण) यदि हम समाजों में एक लंबे अंतराल का परिवर्तन देखें तो विकास के कुछ सामान्य दिशाएँ पाई जाती है, जिनसे हर समाज विकसित होने के लिए गुजरता है।
सामाजिक विकास की इस ऐतिहासिक प्रक्रिया के निर्देश और स्वरूप को पारसन्स ने (विकासात्मक सार्विकीय तत्व) कहा है।
(2) सामाजिक परिवर्तन के प्रति पारसन्स के विचारों में इस अवधि में एक और नया विचार सामने आया। इस विचार को इस तथ्य में देखा जा सकता है कि उसने सामाजिक प्रणालियों के विकासात्मक चरणों के प्रमुख प्रकारों का विश्व स्तर पर ऐतिहासिक तथा तुलनात्मक विश्लेषण करने पर बल दिया। इस विश्लेषण के माध्यम से मानव इतिहास के आदिम समाजों से लेकर आधुनिक औद्योगिक समाजों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया।
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