बहुपति विवाह के कारण - reasons for polyandry

 बहुपति विवाह के कारण - reasons for polyandry


सर्वप्रथम समूह में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों के अनुपात में कमी होने से इस प्रथा को प्रोत्साहन मिलता है। कुछ जनजातियों में एक पुरुष को विवाह करने के लिए लड़की के पिता को कन्या मूल्य देना पड़ता है। इसके फलस्वरूप अनेक निर्धन पुरूष मिलकर एक स्त्री से विवाह कर लेते हैं। इस प्रथा का एक प्रमुख कारण जनजातियों का संघर्ष से भरा हुआ प्राकृतिक जीवन है। जनजातियाँ परिवार के आकार को छोटा रखने और परिवार में मेहनत करने वाले सदस्यों की संख्या अधिक रखने के लिए भी बहुपति विवाह का समर्थन करती हैं। कपाडिया का विचार है कि जनजातियों में पुरूष साधारणतया घर से दूर ही रहते हैं। ऐसी स्थिति में स्त्री की सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी बहुपति विवाह को प्रोत्साहन मिला होगा अंत में, बहुपति विवाह का एक मुख्य कारण पैतृक संपत्ति को विभाजन से बचाने की इच्छा भी है। जब अनेक भाइयों की एक ही पत्नी होगी तो उनके बीच संपत्ति के विभाजन का कभी प्रश्न ही नहीं उठ सकता।


बहुपति विवाह के गुण - इस प्रथा ने जनजातियों के सामाजिक जीवन को संगठित रखने में अनेक प्रकार से सहयोग दिया है।

जिन जनजातियों में बहुपति विवाह का प्रचलन है वहाँ सामाजिक संघर्षो की मात्रा बहुत कम है क्योंकि वहाँ यौन के आधार पर संघर्षो की सम्भावना बहुत ही कम रह जाती है। ऐसे विवाहों ने परिवार के आर्थिक साधनों को भी कम नहीं होने दिया है। बहुपति विवाहों के फलस्वरूप परिवार में बच्चों की संख्या बहुत सीमित रहती हैं। इसके फलस्वरूप जनजातियाँ निर्धनता के बाद भी अपने आर्थिक संतुलन को बनाए रखती है। जनजातियों में भूमि, पशु और थोडे से औजार ही उनकी संपत्ति होती है। इस प्रथा ने इस संपत्ति को अनेक पीढ़ियों तक सुरक्षित बनाए रखने में जनजातियों की सहायता की है।


बहुपति विवाह के दोष - इस प्रथा के मुख्य दोष सामाजिक और जैविकीय आधार पर देखे जा सकते हैं। बहुपति विवाह के फलस्वरूप स्त्रियाँ शारीरिक रूप से दुर्बल हो जाती हैं। बहुत से उदाहरण ऐसे भी मिलते है जबकि स्त्रियों में अनेक बीमारियाँ ही नही बढ़ जाती बल्कि उनमें धीरे-धीरे बॉझपन की समस्या भी बढ़ने लगती है। इस प्रथा के कारण स्त्रियों को आवश्यकता से कहीं अधिक स्वतंत्रता प्राप्त हो जाती है जिसका परिणाम यह होता है

कि समूह में कभी-कभी अनैतिकता और कामाचार की समस्या गम्भीर रूप ले लेती है। ऐसे विवाह पुरूषों के लिए संघर्ष की एक खुली चुनौती देते हैं जिसके परिणामस्वरूप परिवार और समूह में ही पारस्परिक मतभेद अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाते हैं। पारिवारिक विघटन इसका स्वाभाविक परिणाम होता है। बहुपति विवाह के कारण लडकियों की अपेक्षा लडकी का जन्म अधिक संख्या में होता है और इस प्रकार स्त्रियों का अनुपात पुरूषों से कम हो जाने के कारण यह प्रथा स्थाई रूप ले लेती है। इन्हीं सब दोषों का परिणाम है कि वर्तमान युग में सभ्यता के संपर्क में आने वाली कोई भी जनजाति बहुपति विवाह की प्रथा को अच्छा नहीं समझती।


3. समूह विवाह (Group Marriage ) समूह विवाह में, पुरूषों का एक समूह स्त्रियों के एक समूह से विवाह करता है, इस प्रकार समूह का प्रत्येक पुरुष प्रत्येक स्त्री का पति एवं समूह की प्रत्येक स्त्री, प्रत्येक पुरूष की पत्नि होती है। यह विवाह भी दो प्रकार का होता है- समवृत्त एवं विवृत्त समूह विवाह


वर्तमान में समूह विवाह प्रचलन में नहीं है यद्यपि टोडा जनजाति में बहुपति एवं बहुपत्नी विवाह के सम्मिश्रण को कुछ विद्वान समूह विवाह का ही प्रकार मानते हैं।


4. अधिमान्य विवाह (Preferential Marriage) - विवाह का एक अन्य स्वरूप अधिमान्य विवाह भी है। इस प्रकार के विवाह के लिए किसी एक समूह विशेष को प्राथमिकता (वरीयता दी जाती है। अर्थात व्यक्ति को पूर्व से ही ज्ञात होता है

कि उसे किस समूह से जीवन साथी प्राप्त होगा। इस प्रकार के विवाह को मुख्यतः तीन प्रकारों में बांटा जा सकता है -


1. सहोदर विवाह (Cousin Marriage ) भाई भाई एवं भाई बहिन तथा बहिन बहिन की संतानों के बीच होने वाला विवाह सहोदर विवाह कहलाता है। इस प्रकार का विवाह मुस्लिम समुदाय में पाया जाता है। जम्मू-कश्मीर एवं राजस्थान की कुछ जनजातियों में भी इस प्रकार के विवाह का प्रचलन है।


2. देवर विवाह / भाभी विवाह (Levirate) इस प्रकार के विवाह में मृतक व्यक्ति के छोटे भाई से उसकी पत्नी का विवाह होता है। भारतीय समाज की जाति संरचना में बहुत सी जातियों में इस प्रकार के विवाह प्रचलित हैं। इसके अतिरिक्त गोंड, संथाल एवं खरिया जनजाति में भी विवाह का यह स्वरूप प्रचलित है। 


3. साली विवाह (Sororate) - जब किसी पुरूष पत्नी का देहांत हो जाता है, तो उसकी पत्नी की बहिन से विवाह होता है। अपवाद स्वरूप पत्नी के जीवित रहते हुए भी उसकी बहिन से विवाह होता है, संतान प्राप्ति इसका प्रमुख कारण होता है। गोंड एवं खरिया जनजाति में विवाह का यह स्वरूप प्रचलित है।