अधिसंरचना अधोसंरचना के उत्पादन के साधन एवं शक्तियों में संबंध - Relationship between the means and powers of production of infrastructure
अधिसंरचना अधोसंरचना के उत्पादन के साधन एवं शक्तियों में संबंध - Relationship between the means and powers of production of infrastructure
स्वयं कार्ल मार्क्स ने लिखा है कि- “मनुष्य सामाजिक उत्पादन का जो कार्य करते हैं उसके दौरान वे आपस में एक निश्चित प्रकार के संबंध कायम कर लेते हैं। इन संबंधों के बिना उनका काम नहीं चल सकता अतः वे अपरिहार्य होते हैं और मनुष्यों की इच्छाओं से स्वतंत्र होते हैं। उत्पादन के ये संबंध उत्पादनों के भौतिक तत्वों के विकास की विशिष्ट अवस्था के अनुरूप होते हैं। इन उत्पादन के संबंधों के संपूर्ण येग से ही समाज का आर्थिक ढाँचा बनता है और वहीं ढाँचा असली नींव होता है जिस पर वैधिक (स्महंस) और राजनीतिक व्यवस्थाओं का निर्माण होता है। भौतिक जीवन में उत्पादन की जो पद्धति होती है उसी से जीवन की सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक प्रक्रियाओं का सामान्य रूप निर्धारित होता है। समाज के विकास में एक ऐसी व्यवस्था आ जाती है जबकि उत्पादन के भौतिक तत्वों और विद्यमान उत्पादन के संबंधों अर्थात् संपति विषयक के संबंधों, जिनके अंतर्गत वे तत्व पहले से कार्य करते आए हैं. के बीच संघर्ष उठ खड़ा होता है। दूसरे शब्दों में ये संबंध उत्पादन के तत्वों के विकास में बाधा डालते हैं, तब सामाजिक क्रांति का युग प्रारंभ होता है।
इस प्रकार आर्थिक नीवं के बदलने से संपूर्ण व्यवस्था शीघ्र ही बदल जाती है।" मार्क्स के सामाजिक परिवर्तन के विचारों को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम मार्क्स के द्वारा प्रयुक्त कुछ अवधारणाओं की व्याख्या थोड़े विस्तार से करें। प्रमुख अवधारणाएँ ये हैं-
(1) श्रम एवं श्रमिक - मार्क्स ने श्रम एवं श्रमिक शब्द का बहुतायत से प्रयोग किया है। (श्रम ( ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से मनुष्य अपने क्रियाकलाप द्वारा स्वयं अपने और प्रकृति के बीच पदार्थों के विनियमय में दखल देना है, उसका नियम और नियंत्रण करता है। मनुष्य प्रकृति की एक शक्ति के रूप में प्रकृति के पदार्थों का विरोध है। मनुष्य प्रकृति के पदार्थों को ऐसे रूप में प्राप्त करने के लिए जो उसकी आवश्यकताओं के उपयुक्त हो, अपने शरीर की प्राकृतिक शक्तियों-हाथ और पैर, मस्तिष्क और उँगलियों को गतिशील बनाता है। (श्रमिक( के रूप में मनुष्य किसी भी उत्पादन प्रक्रिया की अनिवार्य और वस्तुतः पहली मुख्य शर्त है। बढ़ई के बगैर फर्नीचर, किसान के बगैर अनाज, खनिक के बगैर कोयला हो ही नहीं सकता।
यह उल्लेखनीय है कि संजीव श्रम हमेशा एक मूर्त रूप ग्रहण करता है। एक श्रमिक का श्रम, दूसरे के श्रम से श्रम की परिस्थितियों, उससे संबद्ध कौशल और विधियों के स्वरूप, उपयोग में लाई जाने वाली प्रविधि तथा श्रम-यंत्रों के प्रकार भेद की दृष्टि से काफी भिन्न हो सकता है।
(2) उत्पादन मार्क्स के अनुसार (उत्पादन) वह है जो प्रकृति के भौतिक पर्यावरण एवं विभिन्न साधनों या उपकरणों के द्वारा शोषण करके प्राप्त किया जाता है। मनुष्य इन साधनों के द्वारा प्रकृति में प्रदत्त वस्तुओं को प्राप्त करता है उसे ही मार्क्स उत्पादन कहते हैं।
( 3 ) उत्पादन के साधन वे साधन जो उत्पादन को प्राप्त करने के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं (उत्पादन के साधन) के रूपम में जाने जाते हैं। आदिम मानव के धारदार छड़ी, पत्थर की कुदाली जैसी कुल्हाडी, लोहे की कुदाल, लकड़ी का हल और अंत में आधुनिक किसा का फौलाद का हल एवं अत्याधुनिक रूप में ट्रेक्टर आदि उन यंत्रों में से कुछ एक हैं जिनका विविध युगों में जीनम की बुवाई के लिए उसे तैयार करने हेतु उपयोग किया जाता था या किया जाता था।
(4) उत्पादन की शक्तियाँ - मनुष्य उत्पादन के साधनों का प्रयोग अपने वर्तमान उत्पादन अनुभव तथा श्रम-कौशन के आधार पर ही करके भौतिक वस्तुओं का उत्पादन करता है। ये सब तत्व एक साथ मिलकर ही उत्पादन-शक्तियों का निर्माण करते हैं और भी स्पष्ट रूप से हम कह सकते हैं कि किसी समाज-विशेष की उत्पादक शक्ति के तीन तत्व का अंग होते हैं। मनुष्य, उत्पादन के साधन तथा उत्पादन अनुभव व श्रम-क शल।
(5) उत्पादन-संबंध अपने आप में उत्पादन नहीं बल्कि उत्पादन संबंध किसी भी समाज की विशेषता होते हैं। मार्क्स के अनुसार किसी भौतिक उत्पादन की प्रक्रिया के दौरान विकसित होने वाले सामाजिक संबंध ही उत्पादन के संबंध कहे जाते हैं। उत्पादन के इन्हीं संबंधों से संपत्ति संबंधों का निर्माण होता है जो कालान्तर में वर्गों को जन्म देते हैं।
मार्क्स के अनुसार उत्पादन- शक्तियाँ या उत्पादन-संबंधों के संपूर्ण योग से ही समाज की आर्थिक संरचना का निर्माण होता है।
इसी को अधोसंरचना कहा गया है, क्योंकि यही वास्तविक नीव है जिस पर कि समाज की अधिसंरचना खड़ी होती है। अधिसंरचना के अंतर्गत सामाजिक जीवन के अन्य पक्ष, जैसे सामाजिक राजनीतिक, बौद्धिक, वैधानिक, सांस्कृतिक आदि आते हैं। मार्क्स के मतानुसार अधोसंरचना के अनुरूप ही अधिसंरचना की प्रकृति निश्चित होती है।
मार्क्स के अनुसार सामाजिक परिवर्तन कुछ निश्चित वस्तुगत नियमों (Objective Rules) के अंतर्गत ही होते हैं। किसी काल्पनिक विश्वात्मा अथवा आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा नहीं होते। इन्हीं निमयों के अनुसार एक सामाजिक आर्थिक व्यवस्था दूसरी का स्थान लेती है। मार्क्स के अनुसार अपन जीवन की आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति के लिए मनुष्य निरंत संघर्ष करता रहता है। अपने जन्म के समय मनुष्य जिस प्रकार के उत्पादन के साधन समाज से विरासत में पाता है. उन्हें प्रयोग में लाते हुए ही वह उनमें इसलिए परिवर्तन करता है जिससे उसका श्रम अधिक उत्पादक और कम कष्टप्रद हो सके। इसके लिए वह अपने उत्पादन के साधनों में निरंतर सुधार और परिवर्तन करता रहता है।
जैसे-जैसे उत्पादन के साधन परिवर्तित होते जाते हैं, सामाजिक-आर्थिक ढाँचे में भी परिवर्तन होता जाता है। उत्पादन के साधनों में परिवर्तन के साथ ही उत्पादन के संबंध में भी परिवर्तन आ जाते हैं और पूरा सामाजिक ढाँचा बदल जाता है। इसीलिए मार्क्स के अनुसार सामाजिक परिवर्तन और विकास का मुख्य और अंतिम कारण उत्पादन की भौतिक परिस्थितियाँ होती है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि मार्क्स के अनुसार सभी परिवर्तन उत्पादन प्रणाली में होने वाले परिवर्तन परिणामस्वरूप ही होते हैं। भौतिक परिस्थितियाँ, जनसंख्या वृद्धि एवं अन्य कारकों का मनुष्य के जीवन पर प्रभाव अवश्य पड़ता है लेकिन ये कारक सामाजिक परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। सामाजिक परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण कारक उत्पादन प्रणाली ही है।
मनुष्य को अपनी दिन-प्रतिदिन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उत्पादन करना होता है और उत्पादन करने के लिए उत्पादन-शक्तियों की आवश्यकता होती है और उत्पादन के सिलसिले में वह अन्य व्यक्तियों के साथ उत्पादन-संबंध (Producation Relation) स्थापित करता है।
दूसरे शब्दों में. उत्पादन की प्रणाली उत्पादन के कुछ निश्चित संबंधों (जैसे, जीमंदार और किसान, स्वामी और दास, पूँजीपति और मजदूर के बीच पाए जाए वाले उत्पादन संबंध) को उत्पन्न करती है। ये उत्पादन के संबंध व्यक्ति की स्वेच्छा पर आश्रित नहीं होते, वरन् उत्पादन-शक्तियों के अनुसार अनिवार्य होते हैं। ये उत्पादन संबंध किसी भी युग की सांस्कृतिक व्यवस्था. उसके नैतिक, धार्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विचार एवं संस्थाओं का मुख्यतः निर्धारण करते हैं। जब समाज की उत्पादक शक्ति में काई परिवर्तन होता है. तो उसी के साथ-साथ उत्पादन संबंध बदलता है और उत्पादन के संबंधों में परिवर्तन होने से सामाजिक परिवर्तन घटित होता है। मार्क्स की उत्पादन प्रणाली को तीन भागों में बाँट कर समझा जा सकता है -
(1) उत्पादन प्रणाली की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह किसी भी अवस्था में अधिक समय तक स्थिर नहीं रहती, अपितु सदा परिवर्तन तथा विकास की दिशा में उन्मुख रहती है। साथ ही, उत्पादन प्रणाली में परिवर्तन होने से संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था, विचारों में परिवर्तन आता है। क्योंकि उत्पादन प्रणाली में परिवर्तन होने से समग्र सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था का भी पुननिर्माण (Reconstruction) अनिवार्य होता है।
(2) उत्पादन प्रणाली की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें परिवर्तन और विकास तभी होता है जब उत्पादन- शक्तियों (Productin Forces) में परिवर्तन वे विकास होता है और इससे भी पहले उत्पादन के साधनों (Means of Production) औजार, यंत्र आदि में परिवर्तन व विकास होता है। इस प्रकार उत्पादन के साधनों में परिवर्तन व विकास सबसे पहले होता है, जिसके फलस्वरूप उत्पादन शक्तियों में भी परिवर्तन व विकास होता है। समाज की उत्पादक-शक्तियों में परिवर्तन का परिणाम यह होता है कि इन उत्पादक-शक्तियों से संबंधित और इन पर आधारित मनुष्यों के उत्पादन-संबंधों में भी परिवर्तन हो जाता है परंतु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि उत्पादन-संबंध का कोई प्रभाव उत्पादक-शक्ति उत्पादन-संबंधों पर निर्भर नहीं है। यद्यपि उत्पादन-संबंधे का विकास उत्पादन-शक्ति के विकास पर ही निर्भर है. फिर भी उत्पादन-संबंध उत्पादक-शक्ति के विकास की गति को धीमी या तीव्र करते हैं। ये दोनों एक-दूसरे से एक निश्चित ढंग से जुड़े हुए है और इनसे जुड़ा हुआ है मनुष्य का संपूर्ण सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन और संबंध। मार्क्स ने स्पष्ट ही लिखा है कि “सामाजिक संबंध उत्पादक शक्तियों से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए है।
नई उत्पादक-शक्तियों के प्राप्त होने पर मनुष्य अपनी अत्पादन प्रणाली बदल देते हैं और अपनी उत्पादन प्रणाली तथा अपनी जीविका उर्पाजन की प्रणाली बदलने से वे अपने समस्त सामाजिक संबंध को परिवर्तित करते हैं। जब हाथ ही चक्की (Hand Mill) थी तथा तब सामंतवादी समाज था. भाव से चलने वाली चक्की (Steam Mill) वह समाज बनाती है जिसमें प्रभुत्व औद्योगिक पूँजीपति का होता है।'' अतः उत्पादन प्रणाली में ही सामाजिक परिवर्तन का रहस्य छिपा हुआ है।
(3) उत्पादन प्रणाली की तीसरी विशेषता यह है कि नवीन उत्पादक शक्तियों तथा उनसे संबंधित उत्पादन के संबंधों का उद्भव पुरानी व्यवस्था से पृथक या पुरानी व्यवस्था के लोप (Disapperance) हो जाने के बाद नहीं बल्कि पुरानी व्यवस्था के अंतर्गत ही होता है। दूसरे शब्दों में, नवीन व्यवस्था का बीज पुरानी व्यवस्था में ही अंतर्विहिन या छिपा होता है अतः सामाजिक परिवर्तन एक अनोखी नहीं, वरन् एक स्वाभाविक घटना है, यही प्रकृति का नियम है कि सब कुद अपने आतंरिक स्वभाव द्वारा विकसित व परिवर्तित होगा। इतना ही नहीं, नवीन उत्पादक शक्तियों का जन्म मनुष्य की विचारपूर्वक तथा सचेत क्रिया के फलस्वरूप नहीं, बल्कि आपसे आप या स्वतः अचेत रूप में तथा मानव इच्छा से स्वतंत्र रहकर होता है।
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