विविध शिक्षा आयोग एवं समिति की परिप्रेक्ष्य में धर्म एवं शिक्षा - Religion and Education in the Perspective of Miscellaneous Education Commission and Committee
विविध शिक्षा आयोग एवं समिति की परिप्रेक्ष्य में धर्म एवं शिक्षा - Religion and Education in the Perspective of Miscellaneous Education Commission and Committee
स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व एवं उपरांत गठित विविध शिक्षा आयोग एवं समितियों ने धर्म, धार्मिक शिक्षा, धर्मनिरपेक्षता पर अपने विचार प्रस्तुत किये है। भारतीय संविधान में 1976 के 42 वे संशोधन के अनुसार संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता का स्वीकार किया गया। धार्मिक शिक्षा का स्वरूप क्या होना चाहिए? क्या धार्मिक शिक्षा को नैतिक शिक्षा में परिवर्तित करना चाहिए? आदि प्रश्नों के उत्तर हमें विविध समिति एवं आयोग द्वारा सुझाओं से हमें मिलता है। धर्मनिरपेक्षता के क्रियान्वयन हेतु जो महत्वपूर्ण सुझाव दिए है वह निम्नांकित है
• वुड का घोषनापत्र ( 1854)
स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व 1854 में चार्ल्स वुड का घोषणापत्र प्रसिद्द हुआ।
तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था तथा भविष्यकालीन पुनर्निर्माण के लिए कार्ययोजना प्रस्तुत करना समिति का कार्य था। चार्ल्स वुड के घोषनापत्र को भारत में अंग्रेजी शिक्षा के महाधिकार पत्र के रूप में जाना जाता है। चार्ल्स वुड महोदय ने धार्मिक शिक्षा के संदर्भ में तटस्थ भूमिका स्वीकार की थी। धार्मिक शिक्षा देनेवाली शिक्षण संस्थानों की सहायता देना बंद किया।
• हंटर आयोग (1882)
धार्मिक शिक्षा संबंधी सरकार की तटस्थ भूमिका एवं शिक्षा में सरकार का हस्तक्षेप के कारण इंग्लंड एवं भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असंतोष निर्माण हुआ था। लार्ड रिपन उदारवादी विचारक था। गवर्नर जनरल के कार्यकारिणी के सदस्य सर विलियम हंटर की अध्यक्षता में 3 फरवरी 1882 में भारतीय शिक्षा आयोग का गठन किया।
जी हंटर आयोग के नाम से भी जाना जाता है। हंटर आयोग ने भी शिक्षा को धर्म से अलग रखने के नीति का समर्थन किया। सभी धर्मो के मुख्य सिद्धांतों के आधार पर नैतिक शिक्षा देने की शिफरिश की।
• विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (1902)
भारत में कलकत्ता, मुंबई, मद्रास में प्रथमतः विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई। किन्तु विश्वविद्यालय के पुनर्गठन का करी प्रलंबित था। 27 जनवरी 1902 को सर थॉमस रिले की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय आयोग का गठन किया गया। भारतीय विश्वविद्यालय के पुनर्बलन एवं पुनर्प्रतिष्ठाण के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ने धार्मिक शिक्षा के संदर्भ में पूर्व नीति का ही समर्थन किया है।
• केंद्रीय सलाहगार समिति (194546)
द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरांत गठित केन्द्रीय सलाहगार समिति ने धार्मिक शिक्षा को नैतिक शिक्षा के रूप में स्विकृत करते हुए विद्यालयों में नैतिक शिक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही नैतिक शिक्षा देने की जबाबदेही विद्यालयों को सौंपी।
• विश्वविद्यालय आयोग (1948-49)
उच्च शिक्षा में गुणवत्ता विकास के लिए कार्ययोजना प्रस्तुत करने हेतु स्वतंत्र प्राप्ति के उपरांत 4 नवंबर 1948 को डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय आयोग (1948-49) का गठन हुआ। उन्होंने अध्यात्मिक जीवन को शिक्षा का अभिन्न अंग माना है। राधाकृष्णन जी के धर्मनिरपेक्ष तात्पर्य अधार्मिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक होना है।
• माध्यमिक शिक्षा आयोग (1952-53)
विश्वविद्यालय आयोग द्वारा भारत के उच्च शिक्षा का पर्याप्त विचार किया गया था किन्तु माध्यमिक शिक्षा के लिए आयोग की आवश्यकता महसूस हुई। माध्यमिक शिक्षा को अधिक प्रभावशाली बनाने की आवश्यकता केन्द्रीय शिक्षा सलाहगार परिषद ने जताई। 23 सितंबर 1952 को डॉ.ए. लक्ष्मण स्वामी मुदलियार की अध्यक्षता में माध्यमिक शिक्षा आयोग का गठन किया गया। माध्यमिक शिक्षा आयोग ने धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा का स्वीकार किया।
• धार्मिक तथा नैतिक शिक्षा समिति (1959-60)
धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा विद्यालयों में देने पर 1959 में श्री प्रकाशजी की अध्यक्षता में गठित धार्मिक तथा नैतिक शिक्षा समिति ने 1960 में प्रेषित अपने प्रतिवेदन में बल दिया है।
समिति के प्रतिवेदन के अनुसार वर्तमान में धर्म पर कम होनेवाले विश्वास के कारण समाज को विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। धार्मिक तथा नैतिक शिक्षा समिति (1959-60) ने निम्नांकित सुझाव दिए है -
i. जनशिक्षा के द्वारा परिवार से संबंधित समस्याओं को दूर करना चाहिए। मनोवैज्ञानिक दृष्टी से परिवार में समाहित विभिन्न दोषों को दूर करने की शिक्षा दी जाए।
ii. विद्यालयों की दिनचर्या शांत या मौन प्रार्थना से प्रारंभ करने का विद्यापीठ आयोग का सुझाव समितीने स्वीकृत किया है।
iii. सभी धर्मो के मूल सिद्धांतो एवं प्रवर्तकों की जीवनगाथा पर आधारित पुस्तकों का निर्माण शिक्षा के विभिन्न स्तर के विद्यार्थियों के लिए किया जाए।
iv. सभी धर्मों के प्रति आदर, आदर्श आचरण एवं शिष्टाचार के गुणों को प्रोत्साहित करने के लिए शिक्षा देने पर विशेष बल दिया जाए।
V. शारीरिक शिक्षा अनिवार्य रूप से देना चाहिए।
vi. भाषा एवं सामाजिक विज्ञान के विषयों द्वारा नैतिक एवं धार्मिक शिक्षा देना चाहिए।
vii. सामूहिक गान, धर्म प्रवर्तकों की कहानियाँ, धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा से संबंधित प्रदर्शनियाँ, शारीरिक शिक्षा सेवा शिक्षा आदि स्वरुप में प्राथमिक स्तर पर शिक्षा देनी चाहिए।
viii. प्रातः कालीन सभा सभी धर्मो के सिद्धांतों पर चर्चा, समाज सेवा आदि स्वरूप में माध्यमिक स्तर पर शिक्षा देनी चाहिए।
ix. विभिन्न धर्मों का सामान्य अध्ययन, विभिन्न धर्मो का तुलनात्मक अध्ययन आदि स्वरूप में विश्वविद्यालय स्तर पर शिक्षा देनी चाहिए।
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